ममता के साथ आखिर कौन खेल रहा है खेल,अलग गुट बना चुके विधायकों को कैसे मनाएंगी पूर्व सीएम?
पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. अब ममता की पार्टी भी टूटने की कगार पर है. ममता जिस पार्टी को 28 वर्ष पहले बनाया था, अब वो उनसे छिन सकती है. बुधवार को बंगाल विधानसभा के सचिवालय में इसका ट्रेलर भी सभी ने देखा. दरअसल, एक महीने पहले तक मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी आज अपनी पार्टी बचाने के लिए जूझ रही हैं. लेकिन उनके हाथ में अब बहुत ज्यादा कंट्रोल नजर नहीं आ रहा है. आइए इस रिपोर्ट में ममता बनर्जी की पार्टी टूटने की कहानी को विस्तार से बताते हैं.बुधवार को जब TMC के बागी विधायक स्पीकर रथिंद्र बोस से मिलने पहुंचे. उस वक्त इस कक्ष में TMC के करीब 58 विधायक मौजूद थे, जिन्होंने पार्टी से निकाले जा चुके ऋतब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष चुनने के लिए समर्थन पत्र सौंपा. सूत्रों के अनुसार, ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन वाली इस चिट्ठी में 58 विधायकों के हस्ताक्षर हैं. ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता और अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक बनाए जाने के लिए कहा गया. जबकि जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उप नेता बनाने का पत्र सौंपा गया. खास बात ये है कि विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र में तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी को अपनी चेयरपर्सन बताया है.इससे संकेत ये मिल रहे हैं कि अभी बागियों का विद्रोह ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, बल्कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता विपक्ष बनाने के खिलाफ है. इसलिए उन्होंने शोभनदेव की जगह अपना LOP चुन लिया. जिसे स्पीकर ने स्वीकर कर लिया और ऋतब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष घोषित कर दिया. ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष का कमरा भी आवंटित कर दिया गया.नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि वो जिस गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वही असली तृणमूल है. उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी की पार्टी में कोई भूमिका नहीं रहेगी. विधायकों की बगावत के बीच तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभी संगठनात्मक समितियों और अग्रिम संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है. पार्टी ने कहा कि संगठन के हर स्तर पर आत्ममंथन, प्रदर्शन समीक्षा और व्यापक मूल्यांकन किया जाएगा, जिसके बाद नए सिरे से संगठन का पुनर्गठन होगा.अब सवाल है कि क्या ममता बनर्जी की पार्टी टूट जाएगी? क्या विधायकों के विद्रोह से ममता का पार्टी पर कंट्रोल खत्म हो जाएगा.

इसे आंकड़ों से समझने की जरूरत है. दरसअल, विधानसभा चुनाव में TMC के 80 विधायक जीते थे, अलग गुट बनाने के लिए इन्हें नियमों के अनुसार कम से कम दो तिहाई यानी कि 54 विधायक चाहिए. इस गुट ने अपने समर्थन में 58 विधायकों के हस्ताक्षर का दावा किया है. यानी विधानसभा के अंदर तो ममता बनर्जी की बात नहीं चल पाई. लेकिन एक सच ये भी है कि बागियों ने अपनी चिट्ठी में ममता बनर्जी को अपना अध्यक्ष माना है. हालांकि तृणमूल नेतृत्व ने इस पूरी कवायद को विश्वासघात कह रहा है.TMC विधायक मुस्तफिजुर रहमान का कहना है कि मैं बाहर से सुन रहा हूं. 59 हस्ताक्षर मिले हैं. मैंने भी हस्ताक्षर किए हैं हम पार्टी के खिलाफ नहीं हैं. विधानसभा में 5 वर्ष गुजारने हैं LOP वरिष्ठ होना चाहिए. TMC विधायक मोहम्मद नजरुल इस्लाम का कहना है कि “हम सभी लोग ममता बनर्जी के साथ हैं. LOP कोई भी हो सकता है जिसे विधायक लोग चुनेंगे. पार्टी तो ममता बनर्जी की है. हम लोग उनके साथ हैं.सवाल ये है कि विधायक दल टूट चुका है, ऐसे में क्या ममता बनर्जी की पार्टी टूट जाएगी? अगर कोई राजनीतिक दल दो गुटों में बंट जाता है, तो असली पार्टी नाम और चुनाव चिह्न पर फैसला चुनाव आयोग करता है. दावेदार गुट को ये साबित करना होता है कि उसके पास पार्टी के ज्यादा सांसद और विधायक हैं. इसके लिए सांसदों और विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र आयोग को दिए जाते हैं. दावेदार को ये भी दिखाना होता है कि पार्टी के ज्यादातर पदाधिकारी और संगठन उसके साथ हैं. राष्ट्रीय कार्यकारिणी, कोर कमेटी और अन्य प्रमुख नेताओं का समर्थन भी महत्वपूर्ण माना जाता है. अभी ममता बनर्जी की पार्टी का सिर्फ विधायक दल टूटा है. संसदीय दल और संगठन में कोई टूट नहीं दिख रही है. इस हिसाब से ममता के हाथ से पार्टी का निकलना इतना आसान नहीं है।
