ईरान के सामने हारते हुए दिख रहा अमेरिका!खुफिया रिपोर्ट में ट्रंप की दावे की खुली पोल
ईरान के खिलाफ जंग को लेकर क्या अमेरिका खुद अपने बुने झूठ के जाल में फंस गया है. अमेरिकी सत्ता के भीतर ही अब यह सवाल उठने लगे हैं. खबर है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को इस जंग को लेकर एक बड़ा डर सता रहा. पता चला है उन्होंने बंद कमरे की बैठकों में पेंटागन की तरफ से दी जा रही जानकारियों पर चिंता जताई है. उनका मुख्य सवाल यह है कि क्या युद्ध के दौरान अमेरिका के मिसाइल भंडार में आई कमी की पूरी जानकारी सरकार को दी जा रही है या नहीं।अमेरिकी समाचार वेबसाइट दी अटलांटिक की रिपोर्ट के अनुसार, वेंस ने कई बार पेंटागन से युद्ध की स्थिति और हथियारों के स्टॉक को लेकर साफ-साफ जानकारी मांगी है. इतना ही नहीं, उन्होंने इस मुद्दे पर सीधे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्र्ंप से बात भी की है. हालांकि वेंस ने खुलकर किसी पर गलत जानकारी देने का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन उनके सवालों ने अंदरूनी स्तर पर हलचल जरूर बढ़ा दी है.रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका तेजी से अपने अहम हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है. इसमें मिसाइल इंटरसेप्टर और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार शामिल हैं. कुछ आंतरिक आकलनों के मुताबिक, अमेरिका अपने कुछ महत्वपूर्ण हथियारों के आधे से ज्यादा भंडार का इस्तेमाल पहले ही कर चुका है.विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति रही, तो इसका असर सिर्फ ईरान युद्ध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ताइवान, दक्षिण कोरिया या यूरोप के किसी देश पर हमला होता है, तो वह मदद के लिए ठीक ढंग से जवाबी हमला भी नहीं सकेगा. अमेरिकी एजेंसी सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने भी हालिया रिपोर्ट में अमेरिकी हथियार भंडार पर बढ़ते दबाव की बात कही है.एक और जहां पेंटागन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ लगातार यह कह रहे हैं कि अमेरिका का सैन्य भंडार मजबूत है और ईरान को भारी नुकसान पहुंचा है, वहीं दूसरी ओर कुछ अधिकारी मानते हैं कि सार्वजनिक बयान और अंदरूनी आकलन में अंतर हो सकता है.

राष्ट्रपति ट्रंप भी कई बार अमेरिका की सैन्य क्षमता को ‘लगभग असीमित’ बता चुके हैं और शुरुआती सफलता का दावा कर चुके हैं. लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है. कुछ इसे स्वस्थ बहस मानते हैं, तो कुछ इसे रणनीतिक चिंता का संकेत.उधर अमेरिकी खुफिया विभाग के आकलनों के मुताबिक, लगातार हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. उसके पास अब भी मिसाइल लॉन्च करने की ताकत और नौसैनिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा मौजूद है. खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग पर उसका प्रभाव बना हुआ है, जहां तनाव लगातार बढ़ रहा है.इतना ही नहीं, युद्धविराम के बाद ईरान ने अपने मिसाइल ढांचे के कुछ हिस्सों को फिर से सक्रिय कर लिया है, जिससे इस संघर्ष के लंबा खिंचने की आशंका और बढ़ गई है.इस पूरे घटनाक्रम का असर अब राजनीतिक स्तर पर भी दिखने लगा है. वेंस पहले से ही लंबे विदेशी युद्धों को लेकर संदेह जताते रहे हैं. हालांकि अब वह एक संतुलित भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं. वहीं ट्रंप के बेहद करीबी माने जाने वाले रक्षा मंत्री हेगसेथ ने इस युद्ध को लेकर आक्रामक रुख अपनाया है.हालांकि शुरुआती अनुमान था कि यह संघर्ष जल्दी खत्म हो जाएगा, लेकिन अब यह एक लंबी और अनिश्चित स्थिति में बदल चुका है. बातचीत की कोशिशें भी फिलहाल ठप हैं और क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है.कुल मिलाकर, अमेरिका-ईरान युद्ध अब सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वॉशिंगटन के भीतर भी रणनीति, पारदर्शिता और भविष्य की तैयारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
