ईरान पर ट्रंप का सबसे बड़ा साइलेंट वार!समझिए कैसे जीत की ओर बढ़ने लगा है अमेरिका?

 ईरान पर ट्रंप का सबसे बड़ा साइलेंट वार!समझिए कैसे जीत की ओर बढ़ने लगा है अमेरिका?
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अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर एक और बड़ा कदम उठाते हुए 344 मिलियन डॉलर (करीब 2800 करोड़ रुपये) की क्रिप्टोकरेंसी फ्रीज कर दी है. यह रकम कथित तौर पर ईरान से जुड़ी बताई जा रही है. इस कार्रवाई को ऐसे समय में अंजाम दिया गया है जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है और युद्ध खत्म करने को लेकर चल रही बातचीत को कोई खास सफलता मिलती नहीं दिख रही है. माना जा रहा है कि यह कदम बिना सैन्य कार्रवाई किए ईरान की आर्थिक रीढ़ पर चोट करने की रणनीति का हिस्सा है.सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने साफ कहा कि अमेरिका ईरान के हर उस वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाएगा, जिसके जरिए वह पैसा देश से बाहर भेजने की कोशिश कर रहा है. उनके मुताबिक, ‘हम तेहरान के उन सभी आर्थिक रास्तों को बंद करेंगे जो उसकी सरकार को सहारा देते हैं. ‘ यह बयान इस बात का संकेत है कि अब जंग सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि पैसे के रास्ते रोककर भी लड़ी जा रही है।यह कार्रवाई तब सामने आई जब डिजिटल करेंसी कंपनी टेथर ने पुष्टि की कि उसने अमेरिकी सरकार की मदद से दो वॉलेट्स में मौजूद 344 मिलियन डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी फ्रीज की है. कंपनी के अनुसार, यह कदम अमेरिकी एजेंसियों की तरफ से मिली जानकारी के आधार पर उठाया गया, जिसमें इन फंड्स के अवैध गतिविधियों से जुड़े होने का शक जताया गया था.रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ब्लॉकचेन विश्लेषण के जरिए उन्हें ऐसे सबूत मिले हैं, जो इन वॉलेट्स को ईरानी नेटवर्क से जोड़ते हैं. जांच में यह भी सामने आया कि इन ट्रांजैक्शन्स का संबंध सेंट्रल बैंक ऑफ ईरान से जुड़े डिजिटल वॉलेट्स से था. हालांकि, स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है.दरअसल, ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए नए-नए तरीके अपना रहा है. पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम पर पाबंदियों के चलते उसने क्रिप्टोकरेंसी को एक वैकल्पिक रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान डिजिटल एसेट्स के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अपनी मुद्रा ‘रियाल’ को स्थिर रखने की कोशिश करता रहा है.रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2025 तक ईरान में क्रिप्टोकरेंसी होल्डिंग्स करीब 7.8 अरब डॉलर तक पहुंच गई थीं. इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी ईरान की ताकतवर सैन्य इकाई इस्लामिक रिव्योलूशनरी गॉर्ड कॉर्प्स की बताई जाती है, जो देश की अर्थव्यवस्था में भी अहम भूमिका निभाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के फंड्स का इस्तेमाल हथियार खरीदने और सैन्य गतिविधियों को जारी रखने में किया जाता है.

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अमेरिका की यह रणनीति साफ तौर पर ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है. खास बात यह है कि यह हमला बिना किसी मिसाइल या बम के किया जा रहा है. पहले होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दबाव बनाया गया और अब सीधे आर्थिक नसों पर प्रहार किया जा रहा है.विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की कार्रवाई ‘साइलेंट वार’ यानी छुपी हुई जंग का हिस्सा है. विश्लेषकों का कहना है कि भले ही यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन ईरान लंबे समय से प्रतिबंधों के बीच खुद को ढाल चुका है. इसलिए इसका असर तुरंत बड़ा दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है. हालांकि, अमेरिका अब सिर्फ ईरान ही नहीं बल्कि देश और कंपनियों को भी निशाना बना रहा है जो अप्रत्यक्ष रूप से तेहरान की मदद कर रहे हैं. इसी कड़ी में अमेरिका ने चीन स्थित एक रिफाइनरी पर भी प्रतिबंध लगाया है, जो ईरानी तेल खरीद रही थी. इससे साफ है कि वॉशिंगटन अब ‘ थर्ड पार्टी नेटवर्क’ को भी तोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है.दिलचस्प बात यह भी है कि पिछले साल ईरान के सबसे बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज से करीब 90 मिलियन डॉलर की चोरी हुई थी, जिसके पीछे इजरायल समर्थित हैकर्स का हाथ बताया गया था. इससे यह साफ हो जाता है कि साइबर और डिजिटल फाइनेंस अब इस टकराव का अहम हिस्सा बन चुके हैं. कुल मिलाकर, अमेरिका की यह नई रणनीति पारंपरिक युद्ध से हटकर आर्थिक और डिजिटल मोर्चे पर लड़ाई को आगे बढ़ाने की है. होर्मुज की नाकेबंदी से लेकर क्रिप्टो फंड्स फ्रीज करने तक, हर कदम का मकसद ईरान को बिना सीधे सैन्य टकराव के कमजोर करना है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या इस ‘ इकॉनमिक वार’ से ईरान पर दबाव बढ़ता है या वह नए रास्ते खोजकर इसका जवाब देता है.

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