इस मामले में बुरी तरह फंस चुका है पाकिस्तान,बंद हो सकती है विदेशी आर्थिक मदद!

 इस मामले में बुरी तरह फंस चुका है पाकिस्तान,बंद हो सकती है विदेशी आर्थिक मदद!
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अमेरिका का खासमखास बनने के चक्कर में पाकिस्तान अब एक ऐसी मुसीबत में पड़ चुका है, जिससे बाहर निकल पाना उसके फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए आसान नहीं होने वाला है. खासकर तब जबकि पाकिस्तान के सामने अब्राहम अकॉर्ड वाला ये संकट खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पैदा किया हो. पाकिस्तान प्रशासन ट्रंप के इस प्रस्ताव पर या कहें कि प्रेशर पर इस्लामाबाद से लेकर वॉशिंगटन डीसी तक घिरता ही जा रहा है.खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध वाला तनाव है. दोनों के बीच समझौता कराने के लिए पाकिस्तान ने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है. पाकिस्तान इस बहाने एक साथ दो निशाने साधने में लगा है. पहला निशाना है- अमेरिकी राष्ट्रपति को कैसे भी करके एक बार फिर से खुश किया जाए. बदले में अपने लिए और ज्यादा कर्ज का इंतजाम हो पाए. अमेरिकी रहमोकरम पर कंगाल मुल्क की दाल रोटी चल पाए. दूसरा निशाना है- इस बहाने आतंकी मुल्क वाली छवि का दाग मिटाकर खुद को वैश्विक शांतिदूत के तौर पर स्थापित किया जाए.लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसी बीच एक ऐसा ‘ट्रंप कार्ड’ चल दिया है, जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह फंस चुका है और कूटनीतिक तौर पर चारों खाने चित हो सकता है. इस ट्रंप कार्ड का नाम है- अब्राहम अकॉर्ड. जिसमें ट्रंप की ओर से सऊदी अरब और पाकिस्तान पर शामिल होने का भारी दबाव है. सऊदी और पाकिस्तान दोनों भले ही ये कह चुके हों कि वो इसमें शामिल नहीं होंगे, लेकिन सऊदी से ज्यादा पाकिस्तान इस वक्त ट्रंप के प्रेशर में है. पाकिस्तान की हुकूमत से इस्लामाबाद से लेकर अमेरिका तक सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं.पाकिस्तान के डिप्टी पीएम इशाक डार के सामने ये अजीबोगरीब स्थिति तब बनी, जब वो वॉशिगंटन डीसी में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मिले. उनके साथ द्विपक्षीय वार्ता की. मीटिंग रूम से बाहर निकलकर मीडिया से रूबरू हुए. वहां तो इस चुभते सवाल पर वो कोई जवाब नहीं दे पाए. लेकिन बाद में जब पाकिस्तानी मीडिया से मिले, तब देश का पक्ष रखने की कोशिश की.डार ने कहा कि 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और अल-कुद्स अल-शरीफ को उसकी राजधानी बनाए बिना, तो ये पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी रही है. पहले से लेकर अभी की सरकार और साल दर साल हमारी यही सोच रही है. उसमें कोई बदलाव नहीं है.अब्राहम अकॉर्ड असल में पाकिस्तान के लिए किसी दोधारी तलवार की तरह है, जिसमें शामिल होने का मतलब होगा- मुनीर और शहबाज के लिए राजनीतिक आत्महत्या करना. क्योंकि ऐसा करने पर पाकिस्तान को फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी इस्लामिक विचारधारा का कत्ल करना होगा. हार्ड लाइन से पीछे हटते हुए फिलिस्तीन देश के वजूद को नकारना होगा. पाकिस्तान ने जिस इजराइल को गाजा से लेकर लेबनान और ईरान तक कई लोगों की मौत का गुनहगार माना है, उसे ही एक देश के तौर पर मान्यता देनी होगी.पाकिस्तान को अपने घर में भी इसका भारी विरोध झेलना होगा. पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठनों का गुस्सा मुनीर की सेना और शहबाज की सरकार पर उतर सकता है. लेकिन पाकिस्तान ने अगर अब्राहम अकॉर्ड से दूरी बनाए रखी, तो फिर उसे ट्रंप के क्रोध का सामना करना पड़ेगा. जिसके बाद अमेरिका के सहयोग से मिल रही आर्थिक मदद बंद हो सकती है. कंगाली में पाकिस्तान का आटा गीला हो सकता है. पाकिस्तान में हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों का खुले आम घूमना मुश्किल हो जाएगा. आतंक की दुकान पर हर तरह का हंटर चल सकता है.

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वहीं ट्रंप दो दिन पहले कह भी चुके हैं कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देश ये महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने के लिए अमेरिका के कर्जदार हैं. उन्होंने कहा कि हमारे पास ऐसे देश हैं, जो ईरान को लेकर बात कर रहे हैं, सऊदी अरब, यूएई कतर और दूसरे देशों को तुरंत इस समझौते में शामिल हो जाना चाहिए. विटकॉफ, जेरेड और दूसरे लोग इस पर काम कर रहे हैं. ये ऐतिहासिक होगा. मुझे लगता है कि वो देश हमारे प्रति ये जिम्मेदारी निभाने के कर्जदार हैं.पाकिस्तान के सामने संकट यही है, वो ट्रंप का कर्ज चुकाए या फिर अमेरिका से दुश्मनी मोल ले. तीन दिन पहले इसका संकेत ट्रंप के करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम पाकिस्तान को दे भी चुके हैं. उन्होंने पाकिस्तान की मध्यस्थ वाली भूमिका को समस्याग्रस्त बताया था. उनकी ये प्रतिक्रिया ख्वाजा आसिफ के उस बयान पर थी, जिसमें उन्होंने कहा था- कि पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड को लेकर अपनी विचारधारा से समझौता नहीं करेगा.पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर मैं नहीं मानता कि हमें किसी भी ऐसे समझौते का हिस्सा बनना चाहिए जो हमारी मूल विचारधारा से टकराता हो, और दूसरे, हमारे पासपोर्ट पर लिखा है कि ये इजराइल की यात्रा के लिए वैध नहीं है.यहां पर ये भी जानना चाहिए कि आखिर जिस अब्राहम अकॉर्ड ने पाकिस्तान की चिंता बढ़ा दी है, वो है क्या. दरअसल अपने पहले कार्यकाल में वर्ष 2020 में ट्रंप ने ये प्रस्ताव दुनिया के सामने रखा था. इस समझौते के मुख्य उद्देश्य था इजराइल के साथ खाड़ी देशों के रिश्ते को सामान्य करना. पहले यूएई और बहरीन शामिल हुए, फिर मोरक्को और सूडान ने भी हामी भर दी. फिर इन देशों ने इजराइल के साथ राजनयिक संबंधों की शुरुआत की.लेकिन ट्रंप अब सऊदी और पाकिस्तान को इसमें शामिल करवाकर विस्तार चाहते हैं, ताकि खाड़ी में अमेरिका का सैन्य खर्च कम हो और टकराव की संभावना खत्म हो. देखा जाए तो इस समझौते के विस्तार से इजराइल को ये फायदा होगा कि उसे अरब वर्ल्ड में स्वीकृति मिल जाएगी लेकिन सवाल फिर से पाकिस्तान का है, जो इस मुद्दे पर हर तरफ से फंसा हुआ है.

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