किराए पर सेना देने के बदले पाकिस्तान को कितने मिले पैसे?ईरान के साथ किया धोखा?
फौज की भी कोई कीमत होती है क्या? इस सवाल का जवाब ना में देने से पहले पाकिस्तान से एक बार पूछिए, वह आपको डॉलर में बता देगा. ईरान और उसके सहयोगी हूती विद्रोहियों के खिलाफ मोर्चा संभालने का जो दाम लगा, वह अब सबके सामने है. खरीददार रियाद था और माल थी पाकिस्तान की फौज.हिसाब बहुत सीधा है, बस तारीखें मिलाकर देख लीजिए. 11 अप्रैल को पाकिस्तानी लड़ाकू विमान सऊदी अरब के किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर उतरे. उसी दिन इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच अमन की बातचीत चल रही थी और पाकिस्तान बीच-बचाव करने वाला बना बैठा था.हफ्ता भी नहीं गुजरा था कि 16 अप्रैल को रियाद ने पाकिस्तान के स्टेट बैंक में तीन अरब डॉलर और जमा कराने का ऐलान कर दिया. साथ में पहले से रखे पांच अरब डॉलर की मियाद भी बढ़ा दी गई. इधर जहाज उतरे, उधर तिजोरी खुल गई. इसे कोई इत्तफाक कहना चाहे तो कहे, पर आम आदमी की जबान में इसे सौदा कहते हैं.फिर मई में रिपोर्ट आई और रही-सही कसर भी पूरी हो गई. पता चला कि आठ हजार पाकिस्तानी फौजी, जेएफ-17 विमानों का पूरा स्क्वाड्रन, ड्रोन और एचक्यू-9 एयर डिफ़ेंस सिस्टम सऊदी जमीन पर बैठा दिए गए हैं और इस पूरी तैनाती का खर्च कौन उठा रहा है?

सऊदी अरब.यानी वर्दी पाकिस्तान की, जवान पाकिस्तान के, हथियार चलाने वाले हाथ पाकिस्तान के, और खर्चा रियाद का. जिस फौज का बिल कोई और भरे और जो उसी के लिए मोर्चा संभाले, उसे दुनिया की हर जबान में किराए की फौज ही कहा जाता है.समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक पहले पाकिस्तान ने 8 हजार फौज भेजे, अब उसकी संख्या बढ़कर 40 हजार हो गई है. पाकिस्तान ने सऊदी को स्ट्राइक के लिए फाइटर जेट देने का वादा भी किया है.और यह किराये की फ़ौज खड़ी किसके सामने है? ईरान के सामने. उसी ईरान के सामने जिसके साथ पाकिस्तान की 900 किलोमीटर लंबी सरहद लगती है.जिस वक्त ईरान पर अमेरिका और इजराइल के बम बरस रहे थे, उसके सुप्रीम लीडर तक को मार दिया गया था, उस वक़्त पड़ोसी ने मुंह से अफसोस जताया और बंदूक की नाल उसी की तरफ घुमा दी. इसके पीछे न कोई उसूल था, न कोई बड़ा मकसद. बस रकम थी.बात यहीं नहीं रुकी. जुलाई आते-आते पाकिस्तान में सऊदी जमा रकम 8 अरब डॉलर तक पहुंच गई. महीने के आखिर में 5 अरब डॉलर की वापसी तीन साल के लिए टाल दी गई. ऊपर से इस्लामाबाद ने 6.7 अरब डॉलर का तेल उधार मांग लिया, वह भी एक फीसदी ब्याज पर, पंद्रह साल के लिए. फौज जाती रही, रकम आती रही.असल में सौदे की नींव तो सितंबर 2025 में ही पड़ गई थी, जब रियाद के साथ रक्षा समझौते पर दस्तखत हुए. उस समझौते की पूरी शर्तें आज तक सामने नहीं आने दी गईं. खबरों के मुताबिक उसमें 80 तक फौजी भेजने की गुंजाइश है, और जंगी जहाजों की बात भी है.अब ज़रा उस “मध्यस्थता” को देखिए जिसका इतना ढोल पीटा गया. जो मुल्क ईरान के सामने खड़े खेमे से अरबों डॉलर ले रहा हो और उसी की हिफाजत में अपनी फौज बैठा चुका हो, वह ईरान के लिए इंसाफ की बात किस मुंह से करेगा? कहावत पुरानी है, जिसका खाओ, उसी का गाओ.पाकिस्तान रियाद का खा रहा था, तो तेहरान के हक में कैसे गाता? नतीजा वही हुआ जो होना था. अप्रैल की बातचीत बेनतीजा रही, जून का समझौता कुछ ही हफ्तों में बिखर गया, और ईरान के हाथ सिर्फ खोखले वादे आए.और यह धंधा कोई नया भी नहीं है. पाकिस्तानी फौजी बरसों से सऊदी अरब में बैठे हैं. इस जंग से पहले भी वहां डेढ़-दो हजार जवान तैनात थे. 2017 में तो पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ ख़ुद सऊदी अगुवाई वाले फौजी गठबंधन के मुखिया बनकर रियाद पहुंच गए थे, और ईरान तब भी इस पर एतराज जता चुका था.फर्क बस इतना है कि पहले यह काम छोटे पैमाने पर होता था. अब दुकान खुलेआम सज गई है, बोली अरबों में लग रही है, और बंदूक का रुख सीधे ईरान की तरफ है.इसलिए तेहरान को अब कोई गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए. जो पड़ोसी एक बार बिक चुका है, वह कल ज्यादा दाम मिलने पर और आगे भी जाएगा. आज 40,000 फौजी हैं, कल 80,000 भी हो सकते हैं, क्योंकि कागज पर इसकी गुंजाइश पहले से लिखी है.पाकिस्तान ने अपना पाला चुन लिया है और उसकी रसीद भी कटवा ली है. ईरान के लिए वह मध्यस्थ न कभी था, न हो सकता है. वह सामने वाले खेमे का भाड़े का सिपाही है, और रिश्तों का खाता उसने खुद अपने हाथ से बंद किया है।
