समुद्र मंथन से कैसे हुई धनतेरस की शुरुआत?जानिए भगवान धन्वंतरि की कथा
हर साल कार्तिक माह में दिवाली का त्योहार बेहद उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है. दीपावली के पांच दिवसीय पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है. पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है. इस साल धनतेरस का पर्व 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जा रहा है. धनतेरस को धनत्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन और अन्य शुभ वस्तुएं खरीदने से घर में सुख-समृद्धि आती है. धनतेरस के दिन पूजा के दौरान इसकी कथा पढ़ना भी शुभ माना जाता है. आइए जानते हैं धनतेरस से जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथाओं के बारे मेंं.पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस का संबंध समुद्र मंथन की घटना से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं की शक्ति कमजोर हो गई थी. इसका लाभ उठाकर असुरों ने देवताओं को पराजित करना शुरू कर दिया.

तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे इस संकट से बाहर निकलने का उपाय पूछा. भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त होगा, जिसका सेवन करने से देवता फिर से शक्तिशाली हो जाएंगे.इसके बाद देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन शुरू किया. इस मंथन से एक के बाद एक कई दिव्य वस्तुएं और रत्न प्रकट हुए. मान्यता है कि इसी समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है. उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था. इसी वजह से धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन उनकी आराधना करने से आरोग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.धनतेरस से जुड़ी एक अन्य बेहद प्रचलित पौराणिक कथा राजा हेम और उनके पुत्र से संबंधित है. मान्यता के अनुसार, एक बार राजा हेम के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. ज्योतिषियों ने बच्चे की कुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के चार दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी. यह बात सुनकर राजा और रानी बहुत दुखी हुए. उन्होंने अपने पुत्र को हर तरह के संकट से बचाने की कोशिश की. जब राजकुमार बड़ा हुआ तो उसका विवाह एक सुंदर और गुणवान कन्या से कर दिया गया.विवाह के बाद जब मृत्यु की भविष्यवाणी का समय नजदीक आया, तो राजकुमार की पत्नी को इस बात का पता चला. उसने अपने पति की जान बचाने का निश्चय किया. जिस रात राजकुमार की मृत्यु होने वाली थी, उसकी पत्नी ने एक विशेष उपाय किया.कहा जाता है कि उसने घर के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और बहुत सारे धन के सिक्के रख दिए. इसके साथ ही पूरे महल में दीपक जला दिए. वह रातभर अपने पति को जगाए रखने के लिए गीत और कहानियां सुनाती रही.धार्मिक कथा के अनुसार, जब यमराज सर्प का रूप धारण करके राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे, तो घर के बाहर रखे सोने-चांदी के आभूषणों और दीपकों की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं. यमराज राजकुमार के कक्ष तक नहीं पहुंच सके. वह आभूषणों के ढेर पर बैठकर उसकी पत्नी के गीत सुनने लगे. इसी तरह पूरी रात बीत गई और राजकुमार की मृत्यु का निर्धारित समय निकल गया.कहा जाता है कि सुबह होते ही यमराज को वहां से वापस लौटना पड़ा और राजकुमार की जान बच गई. इस तरह उसकी पत्नी की समझदारी और प्रेम ने उसके पति को मृत्यु के मुंह से बाहर निकाल लिया. मान्यता है कि इसी घटना के बाद धनतेरस की रात घर के बाहर दीपक जलाने की परंपरा शुरू हुई. इस दिन यमराज के नाम से दीपदान करने को यम दीपदान कहा जाता है. इसे अकाल मृत्यु के भय से बचने की कामना से जोड़ा जाता है.
