अपने मिशन में कामयाब हुई बीजेपी,कांग्रेस में TMC का जल्द होगा विलय!

 अपने मिशन में कामयाब हुई बीजेपी,कांग्रेस में TMC का जल्द होगा विलय!
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जिस कांग्रेस से 1998 में ममता बनर्जी ने नाता तोड़ा था, उसी कांग्रेस की शरण में आने को अब वे आतुर हैं. पिछले 29 साल के अलगाव के बाद अब ममता फिर से कांग्रेस में अपनी सुरक्षित वापसी का रास्ता तलाश रही हैं. अभी 8 जून को इंडिया ब्लॉक की बैठक के पहले ममता और सोनिया जिस तरह से मिलीं, उससे इस बात की संभावना प्रबल है कि ममता बनर्जी की बची-खुची तृणमूल सारे गिले-शिकवे दूर कर कांग्रेस में मिल जाए! साल 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस को बॉय-बॉय किया और एक जनवरी 1998 को अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई. यह वही ममता थीं जो राजीव गांधी को अपना आदर्श बताती थीं और उन्हीं के समय 1984 में जादवपुर लोकसभा सीट से माकपा के दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को हराकर लोकसभा में पहुंची थीं. वे नरसिंह राव सरकार में मंत्री भी रहीं. पर सोनिया ने जब कांग्रेस की कमान संभाली तो कांग्रेस से संबंध तोड़ लिए.जब तृणमूल कांग्रेस बनाई तो ममता ने कहा था, असली कांग्रेस हम हैं क्योंकि हमने कांग्रेस को जमीन से जोड़ने की कोशिश शुरू की है. तृणमूल का अर्थ होता है, घास की जड़. यानी हम ही हैं जड़ों वाली कांग्रेस. ममता अपने दावे पर खरी उतरीं. उन्होंने पश्चिम बंगाल में हताश और निराश बैठी कांग्रेस को तोड़ दिया. इसमें उनके सहयोगी रहे मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी जैसे कांग्रेस के नेता. चूंकि पश्चिम बंगाल में 1977 से सत्ता के बाहर थी और उसे इस पूर्वी राज्य में पुनः सत्ता पाने की कोई उम्मीद नहीं थी. प्रणब मुखर्जी केंद्र में सत्ता सुख भोगते रहे और राज्य इकाई कुछ पार्षदों या गिनती के विधायकों तक सीमित थी. जो प्रदेश स्तर के नेता थे, उनमें परस्पर जूतम पैजार थी. प्रियरंजन दास मुंशी, सोमेंद्र नाथ मित्र और अब्दुल गनी खान चौधरी में पट नहीं रही थी. जब ममता ने कांग्रेस छोड़ी तब सोमेन्द्र बाबू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे. इसके बाद गनी ख़ान चौधरी हुए.मजे की बात है कि 1980 के दशक में जब ममता बनर्जी कांग्रेस में एंट्री ले रही थीं तब वे सोमेंद्र मित्रा गुट से जुड़ी थीं और जब पार्टी छोड़ी तब सोमेंद्र दा ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे. 1998 आते-आते ममता की किसी गुट से पट नहीं रही थी. सोमेन दा (सोमेंद्र मित्र) लेफ्ट फ्रंट सरकार के प्रति कतई आक्रामक नहीं थे और अब्दुल गनी ख़ान चौधरी भी नहीं. सच बात तो यह कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार इतनी ताकतवर थी कि कांग्रेस के सभी क्षत्रप केंद्र में भागने को आतुर थे. इसके विपरीत ममता बनर्जी का पूराफोकस पश्चिम बंगाल था. वे प्रदेश नेताओं की गुटबाज़ी और भितरघात से दुखी थीं. उनका लक्ष्य था किसी तरह पश्चिम बंगाल से वाम के वर्चस्व को ख़त्म करना. पर इसके लिए प्रदेश में कांग्रेस के पैरेलल एक नई पार्टी खड़ा करना. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई लेकिन फिर उन्हें बीजेपी से समझौता करना पड़ा.किसी भी क्षेत्रीय पार्टी के लिए किसी न किसी राष्ट्रीय पार्टी से अपने संबंध मधुर रखने होते हैं. ममता ने उस समय बीजेपी के उदारवादी नेता अटल बिहारी वाजपेयी की छांव ली. तृणमूल बनने के अगले ही बरस वे बीजेपी की अगुआई वाली NDA गठबंधन में शामिल हो गईं. अपने सपोर्ट की कीमत भी वसूली.

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अटल जी ने उन्हें रेल मंत्री बना दिया. इसके बाद 2000 में पेट्रोल कीमतों की वृद्धि के विरोध में ममता और उनकी पार्टी के अजित कुमार पांजा ने वाजपेयी सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया और तत्काल बाद इस्तीफ़ा वापस भी ले लिया. फिर 2001 में ऑपरेशन वेस्ट एंड के खुलासे के बाद पुनः इस्तीफा दिया औरउसी साल पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव में कांग्रेस से समझौता किया. उस समय प्रणब मुखर्जी पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष थे. इस समझौते का लाभ ममता बनर्जी को मिला उन्हें विधान सभा में 60 सीटें मिलीं और कांग्रेस को सिर्फ़ 26 सीटें मिल सकीं.2003 में ममता बनर्जी फिर से NDA में आ गईं. इसके बाद वे फिर NDA से जुदा हो लीं. इस बार सुदीप वंद्योपाध्याय उनके साथ वाजपेयी सरकार में मंत्री बने. उन्हें कोयला और खान मंत्रालय मिला. उनके कार्यकाल में नेशनल एल्युमिनियम कंपनी की बिक्री पर रोक लगी. इसकी बहुत चर्चा हुई और उनकी धाक राष्ट्रीय स्तर पर पहुंची. 2004 के लोकसभा चुनाव में वे NDA के सहयोगी दल के रूप में चुनावी समर में उतरीं लेकिन इस बार NDA भी हारी और ममता बनर्जी की पार्टी को भी बहुत नुक़सान हुआ. अकेले ममता ही चुनाव जीत सकीं. 2005 में ममताबनर्जी की पार्टी TMC कोलकाता नगर निगम को गंवा बैठी. मेयर अजय मुखर्जी ने भी TMC छोड़ दी. इसके बाद 2006 के विधानसभा चुनाव में भी ममता NDA के साथ उतरीं. बहुत बुरी हार हुई और विधानसभा में उनकी पार्टी 60 से 30 पर आ गई.इसके बाद वे लोकसभा में वाम दलों पर आक्रामक हो गईं. लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी चूंकि माकपा के थे इसलिए ममता बनर्जी हर मुद्दे पर उनसे भिड़ने लगीं. चार अगस्त 2006 को उन्होंने लोकसभा में डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल पर अपना इस्तीफ़ा फ़ेक दिया. वे स्पीकर सोमनाथ चटर्जी द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों के मामले पर उनके स्थगन प्रस्ताव को ख़ारिज किए जाने पर भड़की थीं. इसी बीच पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य नई औद्यगिक विकास नीति ले कर आए और किसानों की ज़मीन काअधिग्रहण करना शुरू किया. इंडोनेशिया स्थित सलीम ग्रुप के सीईओ बेनी संतोषो ने पश्चिम बंगाल में भारी निवेश का भरोसा दिया था. इसके लिए उन्हें हावड़ा में कृषि ज़मीन दी गई थी. तृणमूल ने बेनी संतोषो के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू किए. इस वजह से बेनी संतोषो पीछे हट गए.फिर सिंगूर में टाटा समूह की नैनो गाड़ी के कारखाने के लिए जमीन अधिग्रहण पर भी TMC ने सिंगूर और नंदीग्राम में प्रदर्शन किए. यहां भी कारखाना नहीं लग सका. नंदीग्राम में SEZ (विशेष आर्थिक क्षेत्र) विकसित करने की परियोजना लटक गई लेकिन ममता बनर्जी शेरनी की तरह बुद्धदेब भट्टाचार्य की औद्योगिक विकास नीति पर हमला करने पर उतारू थीं. इससे बुद्धदेब बाबू डिफेंसिव होते गए. उधर केंद्र में भी मनमोहन सिंह की परमाणु नीति के विरोध में वाम दल सरकार से अलग हो गए. इस वजह से कांग्रेस की UPA सरकार परोक्ष रूप से ममता बनर्जी को उकसा रही थी. इसीलिए ममता ने 2009 कालोकसभा चुनाव UPA गठबंधन के साथ मिलकर लड़ा. इस गठबंधन के हिस्से में 26 सीटें आईं. ममता को UPA-2 सरकार में रेल मंत्री का पद मिला. केंद्र में प्रणब मुखर्जी और मनमोहन का टकराव उनके लिए मुफ़ीद रहा. अगले ही साल कोलकाता नगर निगम में भी TMC ने जीत दर्ज की.2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को भारी जीत मिली और उन्होंने 34 साल के वाम शासन को उखाड़ फेका. यह चुनाव उन्होंने UPA से मिलकर लड़ा था लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को अपने साथ कर लिया था. नतीजा ममता को 184 सीटें मिलीं और कांग्रेस के 42 विधायक चुने गए. बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है. अगले साल FDI को लेकर ममता बनर्जी ने केंद्र की UPA-2 सरकार से नाता तोड़ लिया. अब वे पश्चिम बंगाल की अकेली शेरनी थीं. ममताखुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की घोर विरोधी थीं. इसी साल प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बनाए गए. पहली बार कोई बंगाली राष्ट्रपति बना. यह बंगाल के लिए गौरव की बात थी फिर भी 2014 में कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में सिर्फ़ 4 लोकसभा सीटें मिलीं. सीपीएम और बीजेपी को दो और टीएमसी को 34 सीटें मिलीं. यहां कुल सीटें 42 हैं.राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार की वजह सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को बताया था. उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई उनकी आत्मकथा द प्रेसिडेंशियल ईयर्स में उन्होंने इस बात का खुलासा भी किया था. इसमें उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाता तो शायद कांग्रेस इतनी बुरी गत को न प्राप्त होती. उन्होंने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की कार्य प्रणाली पर भी अंगुली उठाई थी. हालांकि, जिन सोनिया गांधी की वजह से ममता बनर्जी ने पहले कांग्रेस छोड़ी, तृणमूल बनाई और UPA से दगाबाजी की औरदगा खाई भी उन्हीं के साथ नजदीकियां चौंकाती हैं. पर अब TMC का भविष्य जिस तरह से त्रिशंकु बना है उसमें ममता फिर से कांग्रेस में विलय को आतुर हैं. पर क्या लंबे समय तक यह तालमेल चल पाएगा! क्योंकि यह तो केर-बेर का संबंध है.

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