पाकिस्तान सरकार की प्राथमिकता में ‘भूख’ नहीं बल्कि सिर्फ ‘युद्ध’ है,दाने-दाने के लिए तरस रहे है पाकिस्तानी

 पाकिस्तान सरकार की प्राथमिकता में ‘भूख’ नहीं बल्कि सिर्फ ‘युद्ध’ है,दाने-दाने के लिए तरस रहे है पाकिस्तानी
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कहते हैं कि दुनिया के हर देश के पास अपनी एक सेना होती है, लेकिन पाकिस्तान में सेना के हाथ में एक पूरा देश है. पूरे देश की भूख है और उसकी प्यास है. इसी सेना के हाथ में पाकिस्तानी आवाम की तकदीर भी है. संयुक्त राष्ट्र (UN) की ताजा रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड’ इसी कड़वी सच्चाई पर मुहर लगाती नजर आ रही है. एक तरफ भारत अपनी कल्याणकारी नीतियों से करोड़ों लोगों की थाली तक खाना पहुंचा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना की सनक ने देश की एक बड़ी आबादी को दाने-दाने के लिए मोहताज कर दिया है.1947 में एक साथ आजाद हुए दो देशों की राहें आज इतनी अलग हो चुकी हैं कि भारत जहां भुखमरी को खत्म करने में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर एक बेहद चिंताजनक अपवाद बनता जा रहा है.संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में भुखमरी के आंकड़ों में लगातार तीसरे साल गिरावट दर्ज की गई है.

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साल 2022 में जहां दुनिया की 8.6% आबादी भुखमरी का शिकार थी, वहीं 2025 में यह घटकर 7.8% (लगभग 64.5 करोड़ लोग) रह गई है.भारत ने अपनी बड़ी आबादी के बावजूद भुखमरी के खिलाफ जंग में शानदार प्रदर्शन किया है. रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि साल 2004-2006 के दौरान भारत में 24.39 करोड़ लोग कुपोषित थे. 2023-2025 तक यह संख्या घटकर 14.25 करोड़ पर आ गई. यानी भारत ने कुपोषण में 41.6% की बड़ी कटौती की है.2017 में भारत के 81.3 करोड़ लोग स्वस्थ और पौष्टिक खाना खाने में असमर्थ थे, लेकिन 2025 तक यह आंकड़ा घटकर 52 करोड़ रह गया. भारत सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) इस सफलता की रीढ़ साबित हुई है.इस योजना के तहत देश की करीब 57% आबादी को मुफ्त राशन दिया जा रहा है. पात्र लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति 5 किग्रा गेहूं या चावल और अंत्योदय अन्न योजना के तहत परिवारों को 35 किग्रा खाद्यान्न हर महीने मिलता है. सरकार ने इस योजना को दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया है.विशेषज्ञों का भी मानना है कि चीन के बाद अब भारत अपनी कृषि उत्पादकता और मजबूत सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दम पर भुखमरी की समस्या को जड़ से मिटाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है.भारत से बिल्कुल उलट, पाकिस्तान का रुख पूरी तरह निराशाजनक रहा है. यूएन रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान में स्थिति सुधरने की बजाय बेहद खराब हुई है.साल 2004-2006 में पाकिस्तान में 2.96 करोड़ लोग कुपोषित थे, जो 2023-2025 के दौरान बढ़कर 4.04 करोड़ हो गए. यानी भुखमरी में 36.5% (लगभग 37%) का उछाल आया है. स्वस्थ आहार न जुटा पाने वाले पाकिस्तानियों की संख्या 2017 में 13.24 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 16 करोड़ पहुंच गई.ईरान के साथ मिसाइल हमले, अफगानिस्तान के साथ लगातार तनाव, भारत के साथ सैन्य टकराव और अमेरिकी-ईरानी युद्ध के बीच मध्यस्थता की वैश्विक राजनीति, इन सबमें उलझे पाकिस्तान ने अपने नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया. नतीजा यह हुआ कि देश आर्थिक रूप से कंगाल होता गया और लोग भूख से तड़पने लगे.रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “यह सिर्फ दिखावे का विरोधाभास नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति की बुनियादी समस्या है. विदेशों में पाकिस्तान युद्धविराम, बातचीत और मध्यस्थता की बात करता है, लेकिन अपने देश में दबाव, प्रतिबंध, गिरफ्तारियां, लोगों के गायब होने की घटनाएं, सैन्य अभियान और सामूहिक सजा जैसे तरीके अपनाता है. जो नेतृत्व अमेरिका और ईरान के बीच अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत करने की कोशिश करता है, वही अपने बलूच, पश्तून और कश्मीरी नागरिकों (कब्जे वाले कश्मीर) के लिए राजनीतिक जगह नहीं बना पाया.रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने यही सख्त रवैया पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में भी अपनाया. यहां रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में जून महीने में हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए. राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की मांग करने वाले नागरिक संगठन जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया.रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “हर बड़ी नाकामी को विदेशी साजिश बताया जाता है, हर प्रदर्शन को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है और सेना की हर कार्रवाई को राष्ट्रीय संकल्प के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन केवल कहानी गढ़ने से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती. ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान की सरकार ने मीडिया की आजादी, राजनीतिक विरोधियों और नागरिक संगठनों पर कार्रवाई तेज करने के लिए अस्पष्ट और बहुत व्यापक कानूनों का इस्तेमाल किया. इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार आतंकवाद की जड़ खत्म करने के बजाय आलोचना को दबाने में ज्यादा सख्ती दिखा रही है।

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