CAG के रडार पर आया Bihar का ये 5 विभाग,कर्ज बढ़ा पर केंद्र पर निर्भरता कायम

 CAG के रडार पर आया Bihar का ये 5 विभाग,कर्ज बढ़ा पर केंद्र पर निर्भरता कायम
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बिहार सरकार का कुल बजट 2020-21 में 2.45 लाख करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 3.64 लाख करोड़ रुपये हो गया. लेकिन हर साल बजट का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हो पाया. 2024-25 में सरकार ने 3.64 लाख करोड़ रुपये का बजट बनाया, जबकि खर्च सिर्फ 2.87 लाख करोड़ रुपये हुआ. यानी 77,340 करोड़ रुपये (21.22%) बिना खर्च किए ही बच गए. CAG का कहना है कि इससे पता चलता है कि सरकार ने जरूरत से ज्यादा बजट बनाया और बजट का सही आकलन नहीं किया.रिपोर्ट बताती है कि सरकार को न केवल मिले हुए पैसों को खर्च करने में संघर्ष करना पड़ रहा है, बल्कि जो पैसा खर्च हो चुका है, उसका हिसाब देने में भी सिस्टम पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है. स्थिति यह है कि बिहार सरकार मार्च 2025 तक 92,132.75 करोड़ रुपये के खर्च से जुड़े 62,632 यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट (UCs) जमा करने में विफल रही है. आइए समझते हैं पूरी कहानीसरकारी कामकाज में जब किसी विभाग को विकास कार्यों के लिए पैसा दिया जाता है, तो काम पूरा होने के बाद उसे ‘यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट’ यानी उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा करना होता है.

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यह इस बात का सबूत होता है कि पैसा उसी काम पर खर्च हुआ है, जिसके लिए आवंटित किया गया था. CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, कुल लंबित राशि 92,132.75 करोड़ रुपये में से 78,811.86 करोड़ रुपये (करीब 85.5%) का हिसाब सिर्फ 5 बड़े विभागों के पास अटका हुआ है.एक तरफ जहां खर्च किए गए पैसों का हिसाब नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार अपने ही बनाए गए बजट को खर्च नहीं कर पा रही है.आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्तीय वर्ष 2020-21 में बिहार सरकार का कुल बजट 2.45 लाख करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 3.64 लाख करोड़ रुपये हो गया. लेकिन हर साल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल के रह जाता है.सरकार ने कुल 3,64,518.87 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया था, लेकिन वास्तविक खर्च केवल 2,87,178.49 करोड़ रुपये ही हो सका. कुल मिलाकर 77,340.38 करोड़ रुपये (बजट का 21.22%) बिना खर्च किए ही बच गए.सबसे बड़ी और हैरान करने वाली बात यह है कि इस 77,340 करोड़ रुपये की भारी-भरकम बचत में से 66,952 करोड़ रुपये (कुल बचत का 86.57%) वित्तीय वर्ष खत्म होने से पहले सरकार द्वारा सरेंडर (वापस) भी नहीं किए गए. सरकारी खजाने के नियम कहते हैं कि अगर पैसा खर्च नहीं हो रहा है, तो उसे समय पर वापस किया जाना चाहिए ताकि उसे किसी अन्य जरूरी मद में आवंटित किया जा सके.राज्य की वित्तीय सेहत के दो सबसे अहम पैमाने होते हैं- राजकोषीय घाटा और राज्य की अपनी कमाई. दोनों ही मोर्चों पर बिहार की स्थिति चिंताजनक है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में बिहार का राजकोषीय घाटा 41,222.50 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो राज्य के कुल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 4.16% है. जबकि FRBM एक्ट के तहत इसे 3.50% की सीमा के भीतर रखने का लक्ष्य तय किया गया था. बिहार अपनी कमाई के लिए आज भी बड़े पैमाने पर केंद्र सरकार पर आश्रित है. राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों में से 59.20% हिस्सा अकेले केंद्र से मिलने वाले टैक्स का है. वहीं, अपनी कमाई कुल राजस्व प्राप्तियों का केवल 24.50% ही है. यह दर्शाता है कि राज्य अपनी वित्तीय स्वतंत्रता हासिल करने से अभी कोसों दूर है.UC के अलावा, सरकारी धन निकालने का एक और तरीका एडवांस/आकस्मिक बिल होता है, जिसके बदले बाद में विस्तृत बिल जमा करने होते हैं. 31 मार्च 2025 तक, 10,361.74 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि के 19,487 AC बिल पेंडिंग हैं. इनमें से 5,513.69 करोड़ रुपये तो सिर्फ पूंजीगत व्यय के लिए निकाले गए थे. इन बिलों का पेंडिंग रहना सीधे तौर पर सरकारी खजाने को नुकसान और धन के गबन के जोखिम को बढ़ाता है.पिछले कुछ वर्षों में बेहतर स्थिति में रहने के बावजूद, वित्तीय वर्ष 2024-25 में बिहार 357.38 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे में दर्ज किया गया है. इसका मुख्य कारण सैलरी, पेंशन और ब्याज में 19.84% की भारी बढ़ोतरी होना है.

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