धूमधाम से आज मनाया जा रहा है बकरीद,देशभर में जश्न का माहौल
आज देशभर में ईद-उल अजहा यानी बकरीद का त्योहार मनाया जा रहा है. ये पाक त्योहार हर साल साल जुल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. इस्लाम धर्म में ये दिन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन मुसलमान नमाज अदा करते हैं. गरीबों में दान करते हैं और एक जानवर (बकरे, बकरी भेड़, भैंस, बैल या ऊंट) की कुर्बानी दिया करते हैं. बकरीद का त्योहार सच्ची श्रद्धा और अल्लाह के प्रति समर्पण का प्रतीक है. कुर्बानी इस त्योहार की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है.इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन कुर्बानी इसलिए दी जाती है, ताकि दुनिया को इंसानियत और बराबरी का संदेश दिया जा सके. बकरीद पर कुर्बानी की परंपरा हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से संबंधित है. इस्लाम के अनुसार, कुर्बानी करना हजरत इब्राहिम की सुन्नत है. ईद-उल-अजहा का जश्न 3 दिनों तक मनाया जाता है. इसी हिसाब से कुर्बानी का सिलसिला भी बकरीद के दिन को मिलाकर तीन दिनों तक जारी रहता है.इस्लाम धर्म में कुर्बानी का महत्व बहुत अधिक है. कुरान में कई स्थानों पर ये जिक्र मिलता है कि अल्लाह ने तीन दिनों तक हजरत इब्राहिम को सपने दिखाए थे और इसी के माध्यम से अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का हुक्म दिया था. ये परंपरा इसलिए तीन दिनों तक चलती है, ताकि सभी हाजी और मुसलमान अपनी इस इबादत को बिना किसी हड़बड़ी के पूरा कर सकें. इस्लामिक मान्यताओंं के अनुसार, अल्लाह जानते थे कि हजरत इब्राहिम को सबसे ज्यादा प्यार अनके बेटे से है.

जब हजरत इब्राहिम ने अपनेसपने के बारे में अपने बेटे हजरत इस्माइल को बताया तो उनके बेटे ने उन्हें अल्लाह के हुक्म का पालन करने को कहा और कुर्बान होने के लिए तैयार हो गए.जब हजरत इस्माइल पिता के हाथों कुर्बान होने के लिए राजी हुए तो उनकी आयु 13-14 साल थी. हजरत इब्राहिम के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देना एक बड़ा इम्तिहान था, लेकिन उनको अपने अल्लाह पर पूरा यकीन था. वो जैसे ही कुर्बानी देने लगे तो अल्लाह ने उनके बेटे की जगह एक दुम्बा रख दिया. इस तरह से हजरत इस्माइल की जगह दुम्बा कुर्बान हो गया और तभी से ये परंपरा शुरू हो गई.मुसलमानों में कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का रिवाज है. एक हिस्सा कुर्बानी करने वाले रख लेते हैं. एक हिस्सा रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के लिए निकाला जाता है और एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए. हर जानवर की कुर्बानी के लिए एक तय उम्र जरूरी है. इस त्योहार में कम से कम एक साल बकरे या बकरी की कुर्बानी दी जा सकती है. कुर्बानी के लिए भेड़ या दुम्बा कम से कम 6 माह का होना चाहिए. भैंस या बैल की उम्र कम से कम दो साल और ऊंट पांच साल का होना चाहिए.
