SC,ST व OBC की तरह EWS वाले नहीं कर सकते है आरक्षण पर दावा,जानिए कोर्ट ने आयु सीमा को लेकर क्या कहा?

 SC,ST व OBC की तरह EWS वाले नहीं कर सकते है आरक्षण पर दावा,जानिए कोर्ट ने आयु सीमा को लेकर क्या कहा?
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के अभ्यर्थी, केंद्र सरकार की नौकरियों में SC, ST और OBC वर्ग के अभ्यर्थियों की तरह आयु सीमा में छूट या अतिरिक्त मौके (अटेम्प्ट्स) पाने की मांग नहीं कर सकते हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि EWS श्रेणी के लोगों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, वह जाति आधारित भेदभाव के बराबर नहीं हैं और उन दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। इसके साथ ही जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने EWS वर्ग के कुछ लोगों द्वारा दायर इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि EWS वर्ग को उम्र और मौकों में छूट न देने की सरकार की नीति बदनीयत, मनमानी या असंवैधानिक नहीं है, फिर चाहे भले ही वह अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों को अलग-अलग छूट देती हो।हाई कोर्ट में दायर इस याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र सरकार के तहत सीधी भर्ती या रोजगार में EWS वर्ग के लोगों को भी अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवारों की तरह ऊपरी उम्र सीमा और मौकों की संख्या में छूट मिलनी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इस मांग को मानने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।यह याचिका UPSC की 2019 की परीक्षा अधिसूचना से जुड़ाी थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि जिस तरह SC/ST को आयु सीमा में 5 साल और OBC को 3 साल की छूट और अतिरिक्त मौके मिलते हैं, उसी तरह की छूट EWS अभ्यर्थियों को भी दी जानी चाहिए।16 अप्रैल को सुनाए गए फैसले में, अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि चूंकि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों को जिन तकलीफों का सामना करना पड़ता है, वे एक जैसी नहीं हैं, इसलिए दोनों श्रेणियों को अलग-अलग रियायतें और छूट दी जानी चाहिए। अदालत ने समझाया कि SC/ST और OBC श्रेणियों का पिछड़ापन बहुत गहरा और सदियों से चला आ रहा सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है, जबकि EWS की समस्या केवल वित्तीय संसाधनों की कमी है।

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कोर्ट ने कहा कि एक वंचित जाति में पैदा हुआ व्यक्ति जीवन भर, यहां तक कि कई पीढ़ियों तक उसके परिणामों का सामना करता रहता है। जबकि दूसरी ओर इंसान की आर्थिक स्थिति बदलती रहती है। यह समय के साथ अथवा कुछ सालों में या पीढ़ियों के दौरान बदल सकती है। कोर्ट ने आगे कहा कि हालात के आधार पर कोई व्यक्ति गरीबी से बाहर आ सकता है या उसमें जा सकता है, लेकिन जाति के मामले में ऐसा नहीं कर सकता।कोर्ट ने आगे कहा कि कानून बनाने वालों को EWS श्रेणी के उम्मीदवारों की मुश्किलों का पूरा अंदाजा था, और इसीलिए उन्होंने संविधान (103वां संशोधन) अधिनियम, 2019 बनाकर उनके लिए आरक्षण लागू किया।फैसला सुनाते हुए अदालन ने कहा कि ‘इसी वजह से EWS लोगों को जिस तरह की कमी का सामना करना पड़ता है, उसकी तुलना जाति-आधारित भेदभाव से नहीं की जा सकती। जाति-आधारित भेदभाव में कुछ हद तक लंबे समय तक चलने वाला सामाजिक कलंक जुड़ा होता है। इसी वजह से EWS श्रेणी के लोग उम्र में छूट या ज्यादा मौके जैसी दूसरी बातों में SC/ST/OBC के बराबर अधिकारों का दावा नहीं कर सकते।’कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि कुछ राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) ने ऐसी छूटें देने का फैसला किया है, इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्र सरकार पर भी वैसी ही नीति अपनाने की कोई बाध्यता या जिम्मेदारी आ जाती है।कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान की मूल संरचना में ही EWS और SC/ST/OBC श्रेणियों के बीच एक अंतर को मान्यता दी गई है, ऐसे में, अगर किसी एक श्रेणी को कुछ रियायतें दी जाती हैं, तो इसे भेदभाव नहीं माना जा सकता, खासकर तब, जब यह बात सबको पता है कि उन सभी श्रेणियों को आरक्षण पहले से ही दिया गया है।

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