बिहार में फिर से छिड़ी EBC पर राजनीति,सम्राट के बयान से राजद में भय
बिहार में नीतीश कुमार ने अति पिछड़ा वोट बैंक को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. यह वोट बैंक लालू प्रसाद यादव के 14% यादव वोट बैंक के खिलाफ तैयार किया था, जिसका उनको लाभ मिला और 21 सालों तक मुख्यमंत्री बने रहे. अब सम्राट चौधरी की नजर भी इसी वोट बैंक पर है. हालांकि आरजेडी का कहना है कि ईबीसी समाज अब लालू-तेजस्वी के पास लौट रहा है, इसलिए सीएम बेचैन दिख रहे हैं. वहीं जेडीयू का दावा है कि अभी भी यह वर्ग हमारे साथ है.बिहार की सत्ता से नीतीश कुमार के हटने के बाद एनडीए के सामने अति पिछड़ा वोट बैंक को संभालकर रखना बड़ी चुनौती है. शायद यही वजह है कि सम्राट चौधरी ने मोर्चा संभाला है. वह ने केवल अति पिछड़ा सम्मेलन करने लगे हैं, बल्कि लालू यादव पर काफी आक्रामक रूप अख्तियार कर रहे हैं.अति पिछड़ा सम्मेलन के दौरान सम्राट चौधरी ने कहा कि वह 36 फीसदी अति पिछड़ों का अंगरक्षक हैं. केंद्र और राज्य सरकार लगातार ईबीसी समाज के उत्थान के लिए काम कर रही है. इस दौरान उन्होंने लालू यादव को बिहार का ‘खलनायक’ करार देते हुए कहा कि आम लोगों की सुरक्षा की गारंटी हमारी है. किसी के साथ अन्याय होने नहीं देंगे.मुख्यमंत्री ने ये भी दावा किया है कि अति पिछड़ा समाज एनडीए के साथ है. उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी यादव पर तंज कसते हुए कहा कि आज की तारीख में आरजेडी की जितनी हैसियत है, उतने विधायक तो पिछले चुनाव में उनके अति पिछड़े विधायक जीतकर आए हैं.लालू यादव और राष्ट्रीय जनता दल के लोगों ने सबसे ज्यादा अति पिछड़ा समाज को ही तंग किया. इसलिए अगले 20 सालों तक अति पिछड़ा समाज राजद को सत्ता में नहीं आने देगा. आपका भाई सम्राट चौधरी यहां बैठा है, कोई आपको छू भी नहीं सकता.”- सम्राट चौधरी, मुख्यमंत्री, बिहारसम्राट चौधरी के दावों में कितना दम है और क्यों सूबे की सियासत में अति पिछड़ा समाज की अहमियत सबसे अधिक है? इसे आंकड़ों के जरिये विस्तार से समझने की जरूरत है. 2023 की जाति आधारित गणना के मुताबिक बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार 310 है. इसमें सबसे अधिक 36.01 फीसदी आबादी अति पिछड़ा समाज की है. इसके बाद 27.12% पिछड़ा वर्ग, 19.65 % अनुसूचित जाति, 15.52% सामान्य (हिंदू-मुस्लिम सवर्ण) वर्ग और 1.68% अनुसूचित जनजाति हैं.राजनीतिक विशेषज्ञ प्रिय रंजन भारती का कहना है कि 2025 विधानसभा चुनाव में एनडीए को 47% वोट मिला था और इसके कारण 202 सीटों पर जीत हुई थी, जबकि महागठबंधन को 38% वोट मिला था लेकिन केवल 35 सीटों पर ही जीत मिली थी. महागठबंधन को जो वोट मिला था, उसमें सबसे बड़ा हिस्सा यादव और मुस्लिम का था. वही, एनडीए को सबसे ज्यादा समर्थन अति पिछड़ा और एससी एसटी समुदायों से मिला.एससी-एसटी मतदाताओं ने एनडीए को 13% वोट दिए, जबकि महागठबंधन को केवल 4% वोट मिले. महागठबंधन को मिले 38% वोटों में से 60% वोट अकेले मुस्लिम और यादव समुदायों से आए थे. महागठबंधन को मिले कुल वोटों में यादवों का योगदान 10% था, जबकि मुस्लिम वोटों का हिस्सा 13% था.

वहीं, एनडीए की बात करें तो 47% में केवल 3 % यादवों का और 2% मुसलमान का वोट मिला था.एनडीए के कुल वोट शेयर का 7% सामान्य वर्ग से आया, जबकि महागठबंधन को केवल 2% वोट मिले. गैर-यादव ओबीसी ने भी एनडीए का अच्छा-खासा समर्थन किया. एनडीए को इस वर्ग से 7% वोट मिले, जबकि महागठबंधन को केवल 3% वोट मिले.हालांकि लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने कई प्रयोग भी किए थे. कुशवाहा को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी वैश्य समाज को भी अपने साथ लाने का प्रयास किया था और सामान्य वर्ग में भी राजपूत को भी लुभाने की कोशिश की गई थी लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली.2025 में जिस प्रकार से एनडीए को अति पिछड़ा यानी ईबीसी का वोट मिला, सीट भी उसी के हिसाब से बंपर मिली लेकिन अब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं हैं. ऐसे में 36% अति पिछड़ा वोट बैंक अब किधर शिफ्ट होगा? इस पर विशेषज्ञ भी मंथन करने में लगे हैं.पटना कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर रणधीर कुमार का कहना है नीतीश कुमार और जब लालू प्रसाद एक साथ थे तो पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट इन्हीं दोनों के पास था. जब नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़ दिया तो अति पिछड़ा वोट बैंक भी नीतीश कुमार के साथ हो गया और इसकी बड़ी वजह यह है कि अति पिछड़ा समाज के लोग यादवो से काफी प्रताड़ित होते रहे हैं.नीतीश कुमार ने अति पिछड़ा समाज को राजनीति की मुख्य धारा से जोड़ा. न केवल आरक्षण दिलाया बल्कि जातीय गणना के बाद आरक्षण बढ़ाने की अनुशंसा भी की. हालांकि कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण यह लागू नहीं हो पाया लेकिन नीतीश कुमार अति पिछड़ों के लिए एक कदम आगे बढ़कर काम करते रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है.वे कहते हैं, ‘अब जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं हैं तो अति पिछड़ा वोट कुछ बीजेपी के साथ जाएगा और कुछ राजद के साथ भी जा सकता है लेकिन यह तभी होगा, जब जेडीयू नेताओं पर उन्हें भरोसा नहीं हो. हालांकि निशांत कुमार को इसी के लिए राजनीति में उतारा गया है. जेडीयू के नेता दावा भी करते हैं कि अति पिछड़ा समाज पहले भी हमारे साथ था और आगे भी हमारे ही साथ रहेगा.सम्राट चौधरी अति पिछड़ा वोट बैंक को लेकर काफी एक्टिव हैं. बीजेपी के ईबीसी प्रकोष्ठ के माध्यम से अति पिछड़ा का सम्मेलन का आयोजन करवा रहे हैं. खुद को 36% अधिक पिछड़ा वोट बैंक का संरक्षक बता रहे हैं. साथ ही लालू यादव को अति पिछड़ा का ‘खलनायक’ बताने की कोशिश में जुटे हैं.सम्राट के दावों पर आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद का कहते हैं कि अति पिछड़ा वोट बैंक को तो नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी ने ठगा है. वे कहते हैं कि बिहार में जब तेजस्वी यादव के सहयोग से महागठबंधन की सरकार बनी थी, तब उन्होंने अति पिछड़ा का आरक्षण बढ़ाने का फैसला किया लेकिन बीजेपी के लोगों ने आरक्षण बढ़ने नहीं दिया. अब अति पिछड़ा समाज हमारे पास लौट रहा है तो मुख्यमंत्री और बीजेपी के लोग परेशान हो रहे हैं.
