किस दिन मनाई जाएगी बकरीद?जानें सही तारीख और इतिहास!
इस्लाम धर्म में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद को बेहद पाक और अहम त्योहार माना जाता है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ बकरे की कुर्बानी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन असल में यह त्योहार त्याग, सब्र और अल्लाह के हुक्म के आगे पूरी तरह सिर झुका देने की एक महान मिसाल के रूप में मनाया जाता है. इस साल बकरीद की तारीख को लेकर थोड़ा कंफ्यूजन हैं कि यह 27 मई को होगी या 28 मई को. आइए जानते हैं इस साल की सही तारीख और इस दिन को कुर्बानी और त्याग के दिन के रूप में क्यों याद किया जाता है.इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी कैलेंडर) के अनुसार, साल के 12वें और आखिरी महीने ज़ु अल-हज्जा की 10वीं तारीख को ईद-उल-अजहा का पर्व मनाया जाता है. इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, इस साल ज़ु अल-हज्जा का महीना 30 दिनों का है. इसी आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल बकरीद 27 मई या फिर 28 मई 2026 को मनाई जा सकती है. दरअसल, इस्लामिक महीनों की शुरुआत चांद दिखने पर निर्भर करती है, इसलिए बकरीद की सही तारीख चांद दिखने के बाद ही तय होगी. ज़ु अल-हज्जा का चांद जिस दिन दिखाई देगा, उसके ठीक 10वें दिन देश और दुनिया भर में बकरीद का त्योहार मनाया जाएगा.ईद-उल-अजहा को इस्लाम में त्याग, आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जाता है.

यह त्योहार सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि इंसान को अपने भीतर की सच्ची श्रद्धा और अल्लाह के प्रति समर्पण को समझाने का संदेश देता है. इस दिन दुनियाभर के मुसलमान नमाज अदा करते हैं, गरीबों में दान करते हैं और कुर्बानी देकर इंसानियत और बराबरी का संदेश फैलाते हैं.बकरीद पर कुर्बानी देने की परंपरा पैगंबर हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से जुड़ी हुई है. इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने उनकी आस्था की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनके सबसे प्रिय बेटे हजरत इस्माईल की कुर्बानी मांगी. इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने बिना किसी संदेह के अल्लाह के इस आदेश को स्वीकार कर लिया और अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए. लेकिन जब वे ऐसा करने वाले थे, तब अल्लाह ने उनकी नीयत और विश्वास को देखते हुए इस्माईल की जगह एक दुम्बा (मेमना) भेज दिया. यही घटना इस्लाम में कुर्बानी की परंपरा की नींव मानी जाती है. तब से हर साल मुसलमान इस दिन बकरी, भेड़, ऊंट या बैल की कुर्बानी देते हैं, ताकि वे इब्राहिम की आस्था और अल्लाह के प्रति अपने समर्पण को याद रख सकें.बकरीद का असली मतलब सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना नहीं है, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों, अहंकार और लालच को त्यागना भी है. यह त्योहार सिखाता है कि इंसान को अल्लाह की राह में अपने सबसे प्रिय चीज़ का त्याग करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. इसके साथ ही कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है, एक हिस्सा जरूरतमंदों के लिए, दूसरा रिश्तेदारों के लिए और तीसरा अपने परिवार के लिए होता है.
