सिनेमाघरों में दिखेगा कंगना और मनोज बाजपेयी का जलवा,12 जून को रिलीज़ होगी फिल्म ‘गवर्नर’

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सिनेमाघरों में 12 जून को पहले से ही तीन फिल्में रिलीज होने के लिए तय थीं. पहल फिल्म मनोज बाजपेयी की ‘गवर्नर’, दूसरी दिलजीत दोसांझ की ‘मैं वापस आऊंगा’ और तीसरी कंगना रनौत की ‘भारत भाग्य विधाता’. अब जब एक ही दिन तीन फिल्में रिलीज होंगी तो बॉक्स ऑफिस पर तीनों के बीच क्लैश तो होगा. हालांकि, अब इस लिस्ट में और फिल्म का नाम जुड़ गया है. आमिर खान की भी एक पिक्चर 12 जून को थिएटर्स में दस्तक देने वाली है.दरअसल, आमिर खान की कोई नई फिल्म नहीं आ रही है बल्कि उनकी एक 25 साल पुरानी पिक्चर री-रिलीज हो रही है. वो फिल्म है ‘लगान’, जो साल 2001 में आई थी. आशुतोष गोवारिकर ने उसका डायरेक्शन किया था. 15 जून को इस पिक्चर को रिलीज हुए 25 साल पूरे हो जाएंगे. इसी को लेकर मेकर्स तीन दिनों के लिए इस पिक्चर को री-रिलीज कर रहे हैं.लगान’ 12, 13 और 14 जून को सिनेमाघरों में दोबारा से दिखाई जाएगी. ऐसे में उस समय जो फिल्में थिएटर्स में लगी हैं, थोड़ा ही सही उनका नुकसान तो होगा. यानी आमिर की ‘लगान’ की वजह से मनोज बाजेपयी की ‘गवर्नर’, दिलजीत दोसांझ की ‘मैं वापस आऊंगा’ और कंगना की ‘भारत भाग्य विधाता’ की कमाई पर असर पड़ सकता है.लगान’ की गिनती आमिर खान के करियर की बेहतरीन फिल्मों में होती है. इस पिक्चर की खूब तारीफ हुई थी. ये फिल्म ऑस्कर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट भी हुई थी. बॉक्स ऑफिस पर भी ‘लगान’ हिट रही थी. इस फिल्म ने कितनी कमाई की थी और कौन-कौन से स्टार्स इस फिल्म में थे, वो आप नीचे देख सकते हैं।मनोज बाजपेयी की फिल्म गवर्नर आजकल खूब चर्चा में है. कुछ दिन पहले फिल्म का ट्रेलर आया था, जिसकी कहानी ने दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ा दी है. दो साल बाद मनोज के लीड रोल वाली फिल्म थिएटर्स में पहुंच रही है. गवर्नर की कहानी भारत के पूर्व गवर्नर एस वेंकटरामनन पर बेस्ड है जिन्होंने 1991 के बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस से उबरने में बड़ा रोल निभाया था.

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फिल्म में मनोज बाजपेयी उनका रोल निभा रहे हैं. लेकिन गवर्नर में जनता की दिलचस्पी की एक और बड़ी वजह है— ट्रेलर में नजर आ रही कहानी और आज भारत की आर्थिक सिचुएशन में समानताएं. रुपये के गिरने, क्रूड ऑयल के बढ़ते दाम और भारत पर आर्थिक संकट की चिंता गवर्नर की कहानी में दिख रही है. दरअसल, फिल्म में भारत पर आए आर्थिक संकट की एक ऐसी कहानी है, जो कभी बड़े पर्दे पर नहीं उतरी.बैलेंस ऑफ पेमेंट को एकदम साधारण तरीके से ऐसे समझ सकते हैं— भारत की करेंसी रुपया है लेकिन विदेशों से आयात-निर्यात डॉलर में होता है. भारत जब विदेश में प्रोडक्ट या सेवाएं बेचता है (निर्यात) तो डॉलर कमाता है. और जब क्रूड ऑयल और सोना वगैरह खरीदता है तो डॉलर खर्च करता है (आयात).निर्यात कम होने और रुपये की कीमत गिरने पर भी विदेशी खरीद की पेमेंट न रुके, ये बैलेंस बनाने के लिए एक खजाना (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व) मेंटेन किया जाता है. इसलिए जब डॉलर्स आते कम हैं और खर्च ज्यादा होते हैं, तो खजाने पर लोड बढ़ने लगता है. और पेट्रोलियम या सोने जैसी चीजें तो हर हाल में खरीदनी ही हैं, इसलिए लोड बढ़ता चला जाता है. इसी को बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस बोलते हैं. इस क्राइसिस का तगड़ा असर भारत ने 1991 में झेला था.वेंकटरामनन 1990 से 1992 तक गवर्नर रहे और ये वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा. इसलिए कई लोग उन्हें बेहतरीन क्राइसिस मैनेजर मानते हैं. मगर बाद में 1992 के स्टॉक मार्केट स्कैम (हर्षद मेहता स्कैम) के लिए उन्हें आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं. वेंकटरामनन की जिंदगी के ये दो साल भारत के इतिहास के बहुत दिलचस्प चैप्टर हैं और गवर्नर में जनता इन्हीं को देखने के लिए एक्साइटेड है. देखना है कि 12 जून को आ रही गवर्नर इन उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है।

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