सामाजिक न्याय के असली महानायक थे जननायक कर्पूरी ठाकुर,जानें उनकी सादगी से सत्ता तक का सफर
24 जनवरी 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले के एक छोटे से गांव पितौंझिया में एक ऐसे बच्चे का जन्म हुआ, जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की एक नई इबारत लिखी। यह बच्चा था जननायक कर्पूरी ठाकुर। एक साधारण परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर ने बचपन से ही गरीबी, सामाजिक असमानता और वंचित समाज की पीड़ा को बहुत करीब से देखा था। शायद यही कारण था कि उनका पूरा जीवन गरीबों, पिछड़ों, दलितों और शोषितों के अधिकारों के लिए समर्पित हो गया।जब देश अंग्रेजों की गुलामी से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब युवा कर्पूरी ठाकुर भी इस संघर्ष में कूद पड़े। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी थी। कर्पूरी ठाकुर भी इस आंदोलन का हिस्सा बने और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की। उनकी सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने लगभग दो साल तक कारावास की सजा काटी। जेल की कठिन परिस्थितियों ने उनके इरादों को कमजोर नहीं किया बल्कि उन्हें और अधिक मजबूत बनाया। उन्होंने समझ लिया था कि केवल राजनीतिक आजादी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को भी उनके अधिकार दिलाने होंगे।आजादी के बाद कर्पूरी ठाकुर समाजवादी राजनीति से जुड़े और राम मनोहर लोहिया के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए। लोहिया का मानना था कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। कर्पूरी ठाकुर ने इसी विचारधारा को अपना जीवन दर्शन बना लिया। उन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। यही वजह थी कि वे हमेशा गरीबों, किसानों, मजदूरों और पिछड़े वर्गों की आवाज बनकर खड़े रहे।उस समय समाज के पिछड़े वर्गों की स्थिति बेहद कमजोर थी। सरकारी नौकरियों, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी बहुत कम थी। कर्पूरी ठाकुर ने महसूस किया कि सदियों से वंचित समाज को केवल समान अवसर देने की बात काफी नहीं है, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने के लिए विशेष अवसर और संरक्षण की आवश्यकता है। उन्होंने विधानसभा से लेकर सड़क तक पिछड़ों और गरीबों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उनके भाषणों में हमेशा सामाजिक न्याय, समानता और अवसरों की बराबरी की बात होती थी।

वर्ष 1977 में कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वह ऐतिहासिक फैसला लिया जिसने बिहार की राजनीति और सामाजिक संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया। वर्ष 1978 में उन्होंने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू किया, जिसे आज भी “कर्पूरी फार्मूला” के नाम से जाना जाता है। इस फैसले के तहत पिछड़े वर्गों के भीतर भी अत्यंत पिछड़े वर्गों को अलग पहचान देकर आरक्षण का लाभ सुनिश्चित किया गया। उनका मानना था कि पिछड़े समाज के भीतर भी कुछ वर्ग ऐसे हैं जो और अधिक वंचित हैं, इसलिए उन्हें अलग से अवसर मिलना चाहिए। यह फैसला उस समय बेहद साहसिक माना गया क्योंकि इसका कई प्रभावशाली वर्गों ने विरोध किया। लेकिन कर्पूरी ठाकुर पीछे नहीं हटे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सामाजिक न्याय के लिए यदि संघर्ष करना पड़े तो वह संघर्ष भी स्वीकार है।कर्पूरी ठाकुर केवल आरक्षण के पक्षधर नेता नहीं थे, बल्कि शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार मानते थे। उन्होंने गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। मैट्रिक परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने का उनका फैसला आज भी चर्चा का विषय है। उनका मानना था कि अंग्रेजी भाषा की बाध्यता के कारण गांवों और गरीब परिवारों के लाखों छात्र आगे नहीं बढ़ पाते हैं। इसलिए शिक्षा का दरवाजा सभी के लिए खुला होना चाहिए। इस फैसले ने हजारों-लाखों छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर दिया।राजनीति में जहां अक्सर सत्ता और सुविधाओं का आकर्षण दिखाई देता है, वहीं कर्पूरी ठाकुर अपनी सादगी के लिए पूरे देश में जाने जाते थे। दो-दो बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उन्होंने कभी वैभव और दिखावे की जिंदगी नहीं अपनाई। उनके जीवन में सादगी, ईमानदारी और जनता के प्रति समर्पण सबसे बड़ी पहचान थी। वे आम लोगों के बीच बैठते थे, उनकी समस्याएं सुनते थे और खुद को जनता का सेवक मानते थे। यही कारण है कि बिहार की जनता ने उन्हें केवल नेता नहीं बल्कि जननायक का दर्जा दिया।कर्पूरी ठाकुर का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति को एक मजबूत आधार दिया। उन्होंने उन लोगों को आवाज दी जिन्हें लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में नजरअंदाज किया गया था। उन्होंने यह साबित किया कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब समाज के हर वर्ग को बराबरी का अवसर मिलेगा। आज देश में पिछड़े वर्गों की जो राजनीतिक भागीदारी दिखाई देती है और सामाजिक न्याय की जो चर्चा होती है, उसमें कर्पूरी ठाकुर के संघर्ष की गूंज साफ सुनाई देती है।
