भारत की सबसे पुरानी सामाजिक बीमारी ऊंच-नीच,जाति ने देश को कितना बांटा?

 भारत की सबसे पुरानी सामाजिक बीमारी ऊंच-नीच,जाति ने देश को कितना बांटा?
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“भारत… दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। एक ऐसा देश जहां अलग-अलग धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां साथ रहती हैं। लेकिन इसी देश में एक ऐसी समस्या भी है जो सदियों से समाज को बांटती आ रही है — जातिवाद और छुआछूत। आज भी कई जगह लोगों को उनकी जाति से पहचाना जाता है। कहीं ऊंच-नीच का भेदभाव होता है, कहीं शादी-ब्याह में जाति देखी जाती है, तो कहीं आज भी छुआछूत जैसी घटनाएं सामने आ जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर जातिवाद कब खत्म होगा? क्या आने वाले समय में भारत पूरी तरह इससे मुक्त हो पाएगा? आज इस वीडियो में हम इसी विषय को समझने की कोशिश करेंगे।जातिवाद की जड़ें भारत के इतिहास में बहुत पुरानी मानी जाती हैं। शुरुआत में समाज को काम के आधार पर बांटा गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह जन्म के आधार पर तय होने लगा। समय के साथ ऊंच-नीच और भेदभाव बढ़ता गया। कई लोगों को शिक्षा, मंदिर और समाज के कई अधिकारों से दूर रखा गया। यही भेदभाव आगे चलकर छुआछूत जैसी बुराइयों में बदल गया।भारत के संविधान ने सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार दिया। संविधान निर्माता B. R. Ambedkar ने छुआछूत को खत्म करने के लिए कानून बनाए। संविधान में साफ लिखा गया कि किसी भी व्यक्ति के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। लेकिन कानून बनने के बावजूद समाज की सोच बदलने में समय लगता है।आज भारत पहले से काफी बदल चुका है। शहरों में लोग अलग-अलग जातियों के साथ काम करते हैं, पढ़ते हैं और दोस्ती करते हैं। नई पीढ़ी पहले के मुकाबले जाति को कम महत्व देती दिखाई देती है। सोशल मीडिया और शिक्षा ने भी लोगों की सोच बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है। अब कई लोग खुलकर जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाते हैं।लेकिन दूसरी तरफ सच्चाई यह भी है कि जातिवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आज भी कई गांवों में जाति के आधार पर भेदभाव देखने को मिलता है। कई बार दलितों और पिछड़े वर्गों के खिलाफ हिंसा की खबरें सामने आती हैं। राजनीति में भी जाति एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। चुनावों में अक्सर जातीय समीकरण की चर्चा होती है। यानी जाति सिर्फ सामाजिक नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा भी बन चुकी है।अब सवाल उठता है कि जातिवाद खत्म क्यों नहीं हो पा रहा? इसका सबसे बड़ा कारण है लोगों की सोच।

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जब बच्चे बचपन से ही जाति के नाम पर फर्क देखना सीख जाते हैं, तो वही सोच आगे बढ़ती रहती है। कई परिवार आज भी शादी के लिए जाति को सबसे जरूरी मानते हैं। समाज में सम्मान और पहचान को भी कई लोग जाति से जोड़कर देखते हैं।हालांकि उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आज देश में लाखों लोग ऐसे हैं जो बराबरी की बात करते हैं। इंटरकास्ट मैरिज यानी अलग-अलग जातियों में शादी धीरे-धीरे बढ़ रही है। शिक्षा और इंटरनेट ने लोगों को नए विचार दिए हैं। नई पीढ़ी नौकरी, टैलेंट और इंसानियत को ज्यादा महत्व देने लगी है।जातिवाद खत्म करने में सरकार और कानून के साथ-साथ समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी है। सिर्फ कानून से सोच नहीं बदलती। जब तक लोग खुद यह नहीं समझेंगे कि इंसान की पहचान उसकी मेहनत और व्यवहार से होती है, तब तक पूरी तरह बदलाव मुश्किल रहेगा।इतिहास में कई महान लोगों ने जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई।ज्योतिराव फुले,पेरियार,जगदेव प्रसाद कुशवाहा और डॉ. आंबेडकर जैसे लोगों ने समाज में बराबरी के लिए लंबा संघर्ष किया। उनकी लड़ाई सिर्फ एक जाति के लिए नहीं बल्कि इंसानियत और समान अधिकारों के लिए थी।आज जरूरत है कि हम सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने के बजाय जागरूकता फैलाएं। स्कूलों में बच्चों को बराबरी और सम्मान की शिक्षा दी जाए। किसी की जाति पूछने से पहले उसे इंसान समझा जाए। क्योंकि जब समाज की सोच बदलेगी तभी असली बदलाव आएगा।

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