मोदी-नीतीश में पहले खूब होती थी खटपट,अब दोनों में हो गई है गहरी दोस्ती,जानिए क्या थी दुश्मनी की वजह?

 मोदी-नीतीश में पहले खूब होती थी खटपट,अब दोनों में हो गई है गहरी दोस्ती,जानिए क्या थी दुश्मनी की वजह?
Sharing Is Caring:

नरेंद्र मोदी ने बतौर पीएम पिछले 12 सालों में भारतीय जनता पार्टी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. 10 जून को वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के 4398 दिनों के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए लगातार सबसे लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाएंगे. इन 12 वर्षों में उनका बिहार से विशेष लगाव रहा है, जबकि पूर्व सीएम नीतीश कुमार के साथ खट्टा-मीठा अनुभव रहा है. पहली बार जब वह पीएम कैंडिडेट थे, तब इसी बिहार में नीतीश ने मोर्चा खोल दिया था.साल 2013 में नीतीश कुमार ने एनडीए में रहते हुए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने का सबसे पहले विरोध किया था. उस वक्त वह इतने नाराज थे कि बीजेपी के साथ डेढ़ दशक पुराना नाता तोड़ लिया. 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा लेकिन करारी हार का सामना करना पड़ा. जिसके बाद 2015 में लालू यादव से गठबंधन किया. महागठबंधन बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ा. उस चुनाव में उनको जबरदस्त जीत मिली.आज भले ही पीएम मोदी और नीतीश कुमार के बीच रिश्ते बहुत मधुर हैं लेकिन वास्तविकता ये भी है कि दोनों के रिश्ते कभी भी बहुत सहज नहीं रहे हैं. नीतीश रेल मंत्री थे और मोदी गुजरात के सीएम थे. फिर नीतीश भी बिहार के सीएम बने लेकिन दोनों के बीच खटास बनी रही.जून 2010 में पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. जहां सभी बीजेपी के दिग्गज नेताओं के लिए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री आवास में भोज का आयोजन किया था लेकिन नरेंद्र मोदी के भोज में शामिल होने की बात से नीतीश असहज थे. जिसका नतीजा ये हुआ कि उन्होंने आखिरी वक्त पर भोज को ही कैंसिल कर दिया. आज भी उस भोज की खूब चर्चा होती है.वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडे बताते हैं, ‘उस समय सुशील मोदी डिप्टी सीएम थे. पटना में जब 2010 में बीजेपी की बड़ी बैठक हो रही थी तो उसमें पोस्टर लगा था. इसमें दावा किया गया था बीजेपी मुसलमानों के लिए गुजरात में सबसे ज्यादा काम कर रही है. नीतीश कुमार उस पोस्टर से इतना नाराज हुए कि भाजपा नेताओं को दी गई भोज कैंसिल कर दिया. शर्त लगा दिया कि भोज तभी होगी, जब नरेंद्र मोदी शामिल नहीं होंगे.’इतना ही नहीं, उसी समय नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी की तरफ से भेजी गई उस 5 करोड़ की राशि भी लौटा दी, जो उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने गुजरात सरकार की तरफ से बाढ़ राहत कार्य के लिए मदद के तौर पर बिहार को भेजी दी.बात भोज रद्द और मदद राशि लौटाने तक ही नहीं रुकी. जब 2010 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ तो नीतीश कुमार ने प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी को आने नहीं दिया. पत्रकारों के पूछने पर उस समय नीतीश कुमार कहते थे, ‘मेरे पास तो पहले से मोदी है.’ उनका इशारा बीजेपी नेता और तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की तरफ था.2013 में जब साफ हो गया कि नरेंद्र मोदी अब केंद्र की राजनीति करेंगे और 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पीएम कैंडिडेट होंगे, तब नीतीश कुमार भड़क उठे. आनन-फानन में उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया. नीतीश इतने गुस्से में थे कि अपने मंत्रिमंडल से बीजेपी कोटे के मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया.राजनीतिक विश्लेषक अरुण पांडे कहते हैं कि नीतीश कुमार को यह उम्मीद नहीं थी कि आडवाणी की जगह नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा. गुजरात दंगे को लेकर अपनी सेकुलर छवि खराब ना हो जाए, विरोध का यह भी एक बड़ा कारण रहा.2014 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने बीजेपी और मोदी के खिलाफ जबरदस्त मोर्चा खोला लेकिन सफलता नहीं मिली. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए. जनता दल यूनाइटेड की हार के बाद नैतिकता के नाम पर उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. हालांकि इसके बावजूद राजनीतिक लड़ाई बहुत मुश्किल हो रही थी. आखिरकार उन्होंने बड़े भाई लालू यादव से दोस्ती का हाथ बढ़ाया. महागठबंधन ने 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी शिकस्त दी.बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने नीतीश कुमार के पाला बदलने पर उनके राजनीतिक डीएनए पर सवाल उठाए थे. तब नीतीश ने इसे अपने डीएनए से जोड़कर बड़ा मुद्दा बना दिया था. बिहार के लोगों से बाल और नाखून के लाखों सैंपल मंगवाए थे.नीतीश कुमार का उस समय का एक भाषण खूब वायरल होता है, जिसमें विधानसभा सत्र के दौरान बीजेपी नेताओं से बहस के बाद उन्होंने कहा था, ‘मिट्टी में मिल जाएंगे, भाजपा के साथ अब कभी नहीं जाएंगे.’हालाकि बाद में परिस्थितियां बदली और नीतीश ने 2017 में आरजेडी से नाता तोड़ लिया. ‘मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन भाजपा के साथ कभी नहीं जाएंगे’ का दावा करने वाले नीतीश रातों-रात एनडीए में चले गए. बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और पीएम मोदी को नेता मानकर उनकी वाहवाही शुरू कर दी.

1000053922

अरुण पांडे कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी का सबसे अधिक विरोध किया है लेकिन समर्थन में जाने के पीछे बड़ी वजह मजबूरी कह सकते हैं. बिहार में तो लालू के खिलाफ ही राजनीति करनी है.’कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, उसके बाद फिर से नीतीश पलटे. 2022 में उन्होंने बीजेपी पर जेडीयू को खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाकर लालू से दोबारा गठबंधन कर लिया. इस बार उनका मकसद सिर्फ मुख्यमंत्री बनना नहीं था, उनका लक्ष्य बड़ा था. उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को हराने का ‘सौगंध’ लेकर राष्ट्रीय स्तर पर काम करना शुरू कर दिया. तमाम विपक्षी दलों के नेताओं को एकजुट करने की कोशिश की और इंडिया गठबंधन का गठन किया.जानकार कहते हैं कि 2014 में नीतीश कुमार जिन मोदी को पीएम बनने से नहीं रोक पाए, उस इरादे को इस बार कामयाब करना चाहते हैं. वैसे भी सियासी गलियारों में इस बात की भी चर्चा होती है कि नीतीश के मन में ‘प्रधानमंत्री बनने की लालसा’ हमेशा से रही है. ऐसे में उनको लगा कि ये अच्छा मौका है, जब वह कांग्रेस और अन्य दलों के सहयोग से मोदी विरोध का चेहरा बन सकते हैं.इसी कोशिश में विपक्षी दलों की पहली बैठक जून 2023 में नीतीश कुमार के सीएम आवास पर हुई. जिसमें उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम के राज्यों की पार्टियों के सुप्रीमो शामिल हुए. सभी नेताओं ने एक सुर में मोदी को हटाने का संकल्प लिया. हालांकि ये मुहिम लोकसभा चुनाव आने से पहले ही नाकाम हो गई. पीएम की उम्मीदवारी और गठबंधन के संयोजक को लेकर सहमति नहीं बनी और नीतीश कुमार ने जनवरी 2024 में फिर से एनडीए में वापसी कर ली. लोकसभा चुनाव में क्या हुआ, सभी को पता है. सीट भले ही घटी लेकिन फिर से मोदी प्रधानमंत्री बने.नीतीश कुमार और मोदी के रिश्ते लगातार बनते-बिगड़ते रहे. हालांकि 2020 के बाद कई बार ऐसे मौके आए, जब नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ भी की. 2024 लोकसभा चुनाव और 2025 विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की सभा में हमेशा कहते रहे कि अब कभी भी साथ नहीं छोड़ेंगे. बिहार के विकास में नरेंद्र मोदी की मदद के लिए बार-बार आभार भी जताते रहे हैं.बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री हो, यह बीजेपी का सपना था लेकिन नीतीश कुमार के रहते एक तरह से असंभव सा हो गया था लेकिन स्थितियां ऐसी बदली कि नीतीश कुमार ने ही सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी के उस सपने को पूरा कर दिया. आज नीतीश कुमार प्रधानमंत्री की तारीफ करते थकते नहीं हैं. वहीं, नरेंद्र मोदी भी नीतीश कुमार को ‘लाडला मुख्यमंत्री’ तक कहने लगे हैं.क्या नरेंद्र मोदी की सफलता में नीतीश कुमार का विरोध भी काम किया है? इस पर राजनीतिक विश्लेषक अरुण पांडे कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफलता में नीतीश कुमार के विरोध की भी बड़ी भूमिका रही है. नरेंद्र मोदी का सबसे ज्यादा विरोध नीतीश कुमार ने ही किया. आज भले ही सबसे अधिक सपोर्ट कर रहे हैं. नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी का रोचक प्रसंग है. नरेंद्र मोदी इतिहास रचने जा रहे हैं लेकिन बीजेपी में जब नरेंद्र मोदी का अवतार हुआ, तब नरेंद्र मोदी का सबसे मुखर विरोधी नीतीश ही थे.जानकार कहते हैं कि 12 सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच अदावत की कई घटनाएं देखने को मिली लेकिन आज की सच्चाई यही है कि मोदी और नीतीश में रिश्ते बहुत मधुर हैं. जिस तरह नीतीश कुमार ने आसानी से सीएम पद छोड़ दिया और सत्ता का हस्तांतरण हो गया, उससे भी पता चलता है कि दोनों शीर्ष नेताओं में संबंध कितने सहज हैं.

Comments
Sharing Is Caring:

Related post