बिहार में बाढ़ से पहले तैयारी में जुटी सरकार,बाढ़ प्रबंधन को लेकर होगा बड़ा काम
अब बिहार सरकार ने बाढ़ सीजन की शुरुआत मान ली है, जो कि 31 अक्टूबर तक रहेगा. इस दौरान जल संसाधन विभाग के अधिकारी और अभियंताओं की छुट्टी भी रद्द रहेगी और उन्हें विशेष जिम्मेवारी भी दी गयी है.इस बार सरकार की तरफ से 447.36 करोड़ की लागत से 216 कटाव विरोधी कार्य कराए गए हैं. 3808 किलोमीटर तटबंधों की निगरानी के लिए प्रति किलोमीटर पर तटबंध श्रमिक की तैनाती की गई है. 1 जून से ही सहायता केंद्र की शुरुआत कर दी गई है.24 घंटे टोल फ्री नंबर और मोबाइल नंबर एक्टिव रहेंगे. इसके साथ ही बक्सर से कहलगांव तक गंगा में 7 स्थान, कोसी, बागमती, महानंदा, गंडक, घाघरा सहित विभिन्न नदियों पर 42 स्थान पर 72 घंटे पूर्व बाढ़ पूर्वानुमान देना भी शुरू कर दिया गया है.बिहार के 38 जिलों में से 28 जिले बाढ़ की चपेट में हर साल आते हैं और इसमें से अधिकांश 21 जिले उत्तर बिहार में हैं. वहीं 7 जिले दक्षिण बिहार में हैं. 28 जिलों में 15 जिले बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं और यह सभी उत्तर बिहार में हैं.सरकार की ओर से हर साल बाढ़ से बचाव के नाम पर बड़ी राशि खर्च की जाती है. 2020 से अब तक यानी 6 सालों में ही 5100 करोड़ से अधिक की राशि बाढ़ से बचाव के लिये खर्च की गई है. इस साल भी 450 करोड़ के करीब राशि बाढ़ बचाव के नाम पर खर्च की गयी है. 2020 में 1061 करोड़, 2021 में 1121 करोड़, 2022 में 898 करोड़, 2023 में 748 करोड़, 2024 में 350 करोड़ और 2025 में 500 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.बाढ़ के कारण हर साल हजारों करोड़ का नुकसान बिहार को झेलना पड़ रहा है. 2025 में 17 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे और बाढ़ से हुए नुकसान को लेकर बिहार सरकार ने केंद्र से 3600 करोड़ देने की मांग की. वहीं 2024 में भी बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 3638 करोड़ से अधिक की राशि बिहार सरकार ने केंद्र से मांगी थी. बिहार सरकार की ओर से बाढ़ के बाद बाढ़ राहत के नाम पर जो राशि खर्च की जाती है और बाढ़ से जो नुकसान पहुंचता है उसको लेकर केंद्र से डिमांड की जाती है.बिहार के उपमुख्यमंत्री सह जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी का कहना है कि बाढ़ को लेकर इस बार हम लोगों की पूरी तैयारी की है. विजय चौधरी का यह भी कहना है मानव जनित उपाय से बाढ़ को नहीं रोका जा सकता है. नेपाल में अधिक बारिश हुई तो बिहार में बाढ़ आएगी. बिहार में जब बारिश होती है उससे प्रदेश को नुकसान नहीं बल्कि फायदा होता है. लेकिन नेपाल में अधिक बारिश होने पर उत्तर बिहार में और झारखंड में ज्यादा बारिश होने पर दक्षिण बिहार में बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है.उत्तर बिहार में नदियों पर लंबे समय से काम कर रहे महेंद्र यादव का कहना है, उत्तर बिहार में नेपाल से आने वाली पानी ही बाढ़ की बड़ी समस्या है. बाढ़ के समय हर बार नेपाल के साथ बाढ़ प्रबंधन की बात कही जाती है. पिछले साल केंद्र सरकार की ओर से 11000 करोड़ से अधिक बाढ़ प्रबंधन पर देने की बात भी हुई है, लेकिन जमीन पर अब तक कोई बड़ा काम नहीं हुआ है.महेंद्र यादव आगे कहते हैं कि नदियों को जोड़ने की योजना पर कुछ जगह काम जरूर शुरू हुआ है. कोसी मेची प्रोजेक्ट पर भी काम कुछ जगह शुरू हुआ है, लेकिन डैम बनाने को लेकर अभी तक कोई पहल नहीं हुई है.

नदियों को जोड़ने की योजना से सिंचाई क्षेत्र बढ़ेगा, लेकिन बाढ़ से निजात के लिए नेपाल और भारत सरकार को बड़े प्रोजेक्ट पर काम करना होगा.कोसी-मेची लिंक परियोजना भारत की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य परियोजना है. इसके तहत कोसी को महानंदा की सहायक नदी मेची से जोड़ने की योजना है. इसकी कुल लंबाई 117.50 किमी और 41.3 किमी लंबा पूर्वी कोसी मुख्य नहर है. प्रोजेक्ट की कुल लंबाई 76.2 किमी है. कोसी-मेची लिंक परियोजना के निर्माण के तहत 9 नहर साइफन, 28 हेड रेगुलेटर, 14 साइफन एक्वाडक्ट, 42 सड़क पुल, नौ पाइप कल्वर्ट और नौ क्रॉस रेगुलेटर बनना है.447.36 करोड़ की लागत से 216 बाढ़ रोधी कार्य कराए गए. 1 जून से ही अधिकारियों और अभियंताओं की छुट्टी रद्द कर दी गई है. भारत नेपाल कोसी एवं गंडक परियोजना की संयुक्त समिति बैठक हो चुकी है, दोनों देश के बीच बाढ़ की सूचना आदान प्रदान पर चर्चा हुई. गंगा, कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला बलान, महानंदा जैसी नदियों के बेसिन में 216 जगह बाढ़ निरोधी कार्य कराए गए हैं.3808 किलोमीटर लंबे तटबंध की निगरानी के लिए तटबंध श्रमिक तैनात किए गए हैं. बाढ़ सहायता केंद्र शुरू हो गया है जो 24 घंटे कार्य कर रहा है. टोल फ्री नंबर 1800 3456145 जारी कर दिया गया है. दो मोबाइल नंबर 7463 889706 और 74638 897 07 जारी किया गया है. गंगा, कोसी, महानंदा, बागमती , गंडक, अधवारा, घाघरा जैसी नदियों के 42 स्थान का पूर्वानुमान 72 घंटे पहले देना शुरू हो गया है.बाढ़ से सर्वाधिक खतरा उत्तर बिहार के जिलों को होती है. कोसी सबसे अधिक तबाही मचाती है. कोसी बेसिन का क्षेत्र हर साल बढ़ रहा है और बाढ़ के समय प्रतिवर्ष एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो रहा है. 2015 से 2020 के बीच इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ कि 2015 में 815.12 किलोमीटर क्षेत्र जल मग्न हुआ था.कोसी बेसिन के बढ़ते जल मग्न क्षेत्र का सबसे ज्यादा असर भागलपुर, खगड़िया, कटिहार, दरभंगा और समस्तीपुर जिले पर पड़ रहा है. 2016 में 1553.75 किलोमीटर क्षेत्र जल मग्न हुआ, वहीं 2017 में 3596.49 किलोमीटर, 2018 में 16507 किलोमीटर और 2019 में 481.5 किलोमीटर क्षेत्र जल मग्न हुआ.नेपाल से आने वाला पानी सबसे बड़ी समस्या है. केंद्र सरकार ने पिछले बजट में बाढ़ प्रबंधन के लिए बिहार को 11500 करोड़ की राशि देने की घोषणा की थी. इस राशि का उपयोग नेपाल से आने वाली पानी को ध्यान में रखकर भी बाढ़ प्रबंध करना है. कोसी और गंडक परियोजनाओं की संयुक्त समिति की 11वीं बैठक नेपाल के साथ इस बार की गई है.बैठक काठमांडू में 30 अप्रैल और 1 मई को हुई थी, जिसमें दोनों परियोजना से जुड़ी हुई समस्याओं पर चर्चा हुई है. जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव संतोष कुमार मल्ल और नेपाल के तरफ से जल स्रोत एवं सिंचाई विभाग के महानिदेशक मित्र बराल ने भारत और नेपाल के महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता की है.जल संसाधन विभाग के अनुसार बैठक में पश्चिमी कोसी मुख्य नहर के 35 किलोमीटर नेपाल भाग, कोसी बराज सहित पूर्वी और पश्चिमी तटबंध के बांध, बाल्मीकि नगर स्थित गंडक बाराज क्षेत्र और मुख्य पश्चिमी नहर के भागों को अतिक्रमण मुक्त करने पर नेपाल ने सहमति दे दी है. और भी जो समस्याएं थी उस पर भी सहमति बनी है. जैसे बिजली के खम्भों को हटाने की सहमति भी नेपाल के तरफ से मिल गई है.इस बैठक के बाद इसपर भी सहमति बनी है कि नेपाल से बाढ़ के समय सूचनाएं भी पहले दी जाएंगी।
