ईरान को मदद पहुंचाने में क्या रूस-चीन की है बड़ी भूमिका!अमेरिका को आखिर कैसे दे रहा है टक्कर?

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अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध को अब चार हफ्ते हो गए हैं। जहां पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे थे कि अमेरिकी सेना की ताकत के आगे ईरान नहीं टिक पाएगा और यह युद्ध एक हफ्ते या कुछ और दिनों में खत्म हो जाएगा, तो वहीं संघर्ष के तीसरे हफ्ते तक उन्होंने अमेरिका को इस जंग में जीता भी घोषित कर दिया। हालांकि, अब कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ट्रंप ने रक्षा मंत्रालय के अपने शीर्ष अधिकारियों से साफ कर दिया है कि इस युद्ध को जितना जल्दी हो सके, खत्म करने का रास्ता देखना चाहिए। जहां अमेरिकी राष्ट्रपति के बदलते बयानों को लेकर दुनियाभर में यह चर्चाएं हैं कि अमेरिका का इस संघर्ष में लक्ष्य तय नहीं था, तो वहीं विश्लेषकों ने ईरान की सैन्य क्षमताओं और अमेरिका-इस्राइल जैसे दो शक्तिशाली देशों के खिलाफ खड़े रहने की क्षमताओं पर भी चर्चा की है। आइये जानते हैं कि ईरान किस तरह अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियानों के खिलाफ संघर्ष में बीते चार हफ्तों से टिका हुआ है? क्यों ट्रंप के ईरान को नेस्तनाबूत कर देने जैसे दावों के बावजूद अमेरिका अब तक अपने लक्ष्यों में सफल नहीं हो सका है?क्या इस संघर्ष में किस तरह रूस और चीन ने ईरान को मदद पहुंचाई है?ईरान की सेना को अमेरिका या इस्राइल जैसे देश के खिलाफ पारंपरिक युद्ध जीतने के लिए नहीं, बल्कि हमलों को झेलने, लचीले बने रहने और लंबे समय तक युद्ध जारी रखने के हिसाब से तैयार किया गया है। इसका असर यह हुआ है कि ईरान के पास भले ही हथियार लगातार कम हुए हैं, लेकिन उसने अमेरिका-इस्राइल के हमलों का बराबरी से जवाब देने के बजाय चुनिंदा तरह से हमले जारी रखे हैं।ईरान की सबसे प्रभावी कूटनीतिक और रणनीतिक चाल होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद करने की रही है। इस रास्ते से दुनिया की 20% तेल आपूर्ति होती है। इसे बंद करने से वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिससे वैश्विक आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो गया है और अमेरिका पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया है। अमेरिका और इस्राइल की तरफ से तेज होते हमलों के बाद ईरान ने युद्ध के पांचवें दिन ही होर्मुज जलडमरूमध्य को नियंत्रित करना शुरू कर दिया और दुनियाभर के व्यापार को बाधित कर दिया। इसकी वजह से ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इस आर्थिक दबाव बढ़ती तेल कीमतों को कम करने के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल के शिपमेंट पर से प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से निलंबित करना पड़ा और ईरान पर भी लगे तेल प्रतिबंधों में ढील देनी पड़ी है। इससे ईरानी अर्थव्यवस्था को एक बार फिर युद्ध से जुड़ी रकम जुटाने में मदद मिली है, जिससे उन्हें युद्ध जारी रखने के लिए पैसा मिल रहा है।

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हफ्तों के हवाई हमलों के बाद भी ईरान शांत नहीं बैठा है। उसने इस्राइल और खाड़ी देशों पर बड़े पैमाने पर जवाबी हमले किए हैं। ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी संपत्तियों और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाते हुए सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं। अलजजीरा से बातचीत में विश्लेषकों के एक पैनल ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने युद्ध में जाने से पहले ईरान की ताकत और क्षमताओं पर ठीक से विचार नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका ने बिना किसी स्पष्ट लक्ष्य के युद्ध शुरू कर दिया और इस बात का पूरी तरह से गलत अनुमान लगाया कि तेहरान अमेरिकी हमलों पर कैसी प्रतिक्रिया देगा। तैयारी में यह चूक उन पर भारी पड़ी है।यूरोपीय खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, रूस ईरान को विस्फोटक ड्रोनों, भोजन और दवाओं की खेप भेजने के अंतिम चरण में है। इसके अलावा, रूस ईरानी ड्रोनों को ‘कोमेटा-बी’ जैसे एंटी-जैमिंग नेविगेशन शील्ड से अपग्रेड कर रहा है और हवाई सुरक्षा को भेदने (चकमा देने) की रणनीतियां भी ईरान के साथ साझा कर रहा है। रूस ने ईरान को कई सारे असली और नकली ड्रोन एक साथ भेजकर दुश्मन के हवाई रक्षा तंत्र को थकाने की रणनीति भी सिखा रहा है, जिसे रूस ने यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल किया है। ब्रिटिश रक्षा सचिव जॉन हीली के अनुसार, युद्ध शुरू होने से पहले रूस ने ईरानी बलों को प्रशिक्षण भी दिया था।

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