चैत्र नवरात्रि का आज है सातवां दिन,इस मंत्र और आरती के साथ करें मां कालरात्रि की पूजा

 चैत्र नवरात्रि का आज है सातवां दिन,इस मंत्र और आरती के साथ करें मां कालरात्रि की पूजा
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चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन आज घरों में एक अलग तरह की ऊर्जा महसूस होने लगती है. सुबह की आरती, धूप की खुशबू और मन में श्रद्धा सब कुछ एक साथ मिलकर एक खास माहौल बना देते हैं. इस दिन मां दुर्गा के उग्र लेकिन कल्याणकारी स्वरूप, मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. उनका रूप भले ही डरावना हो, लेकिन भक्तों के लिए वह सुरक्षा कवच की तरह हैं. कहा जाता है कि मां कालरात्रि अंधकार, भय और नकारात्मक शक्तियों को खत्म कर जीवन में नई रोशनी लाती हैं. यही वजह है कि इस दिन की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है और लोग पूरे विधि-विधान से मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं।

नवरात्रि के सातवें दिन का मंत्र:

1. ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

2. जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि।


जय सार्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥

मां कालरात्रि माता की आरती:

कालरात्रि जय जय महाकाली
काल के मुंह से बचाने वाली
दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा
महा चंडी तेरा अवतारा
पृथ्वी और आकाश पर सारा
महाकाली है तेरा पसारा
खंडा खप्पर रखने वाली
दुष्टों का लहू चखने वाली
कलकत्ता स्थान तुम्हारा
सब जगह देखूं तेरा नजारा
सभी देवता सब नर नारी
गावे स्तुति सभी तुम्हारी
रक्तदंता और अन्नपूर्णा
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी
ना कोई गम ना संकट भारी
उस पर कभी कष्ट ना आवे
महाकाली मां जिसे बचावे
तू भी ‘भक्त’ प्रेम से कह
कालरात्रि मां तेरी जय.

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नवरात्रि के सातवें दिन की व्रत कथा:

नवरात्रि के सातवें दिन की कथा देवी कालरात्रि से जुड़ी है, जिन्होंने रक्तबीज नामक राक्षस का वध किया था. माता कालरात्रि की पौराणिक कथा के अनुसार,असुरों के राजा शुंभ और निशुंभ के शक्तिशाली साथी रक्तबीज को एक वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की एक भी बूंद जमीन पर गिरने से उसी का एक और रूप जन्म लेगा. ऐसे में रक्त की एक बूंद भी जमीन पर गिरने से उसके जैसे कई और दैत्य पैदा हो जाते थे. जब रक्तबीज के इस अजेय रूप ने देवी-देवताओं को परेशान किया, तो उन्होंने मां दुर्गा से प्रार्थना की.तब मां दुर्गा ने क्रोधित होकर अपने तेज से देवी कालरात्रि को उत्पन्न किया, जिनकी सांस से आग निकलती थी और जिनका रूप अत्यंत भयंकर था. मां कालरात्रि ने युद्ध में रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया. ऐसे में रक्तबीज की एक भी बूंद जमीन पर नहीं गिरी और इस तरह सभी रक्तबीजों का अंत हो गया. इसके बाद मां कालरात्रि ने रक्तबीज के साथ-साथ चंड, मुंड और शुंभ-निशुंभ जैसे राक्षसों का भी वध किया था और तीनों लोकों में शांति की स्थापना की।

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