ईरान में महिलाओं की शिक्षा का दिखा असर,6 बच्चे पैदा करने वाली मुस्लिम महिला अब 2 से अधिक बच्चों को नहीं दे रही जन्म!

 ईरान में महिलाओं की शिक्षा का दिखा असर,6 बच्चे पैदा करने वाली मुस्लिम महिला अब 2 से अधिक बच्चों को नहीं दे रही जन्म!
Sharing Is Caring:

कभी ऐसा दौर था जब ईरान में बड़े परिवार आम बात थे. इस्लामिक क्रांति से पहले तक यहां औसतन एक महिला के 6 से 7 बच्चे होते थे. लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट हैं. ईरान की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) घटकर 2 से भी नीचे पहुंच चुकी है. सवाल उठता है कि आखिर इस्लामिक क्रांति के बाद ऐसा क्या हुआ कि देश में बच्चों की संख्या तेजी से कम होने लगी?आगे बढ़े इससे पहले जान लेते हैं कि प्रजनन दर आखिर होती क्या है. तो कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) एक अहम पैमाना है. यह बताता है कि अगर किसी साल की उम्र-विशेष जन्मदर पूरी जिंदगी वैसी ही बनी रहे तो एक महिला औसतन कितने बच्चों को जन्म देगी. वैश्विक स्तर पर 1950 के दशक में यह दर करीब 4.9 थी, जो 2023 में घटकर लगभग 2.3 रह गई है. यानी दुनिया भर में परिवार छोटे हो रहे हैं. ईरान भी इसी वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है. हालांकि यहां गिरावट बहुत तेज रही. 1980 के दशक में जहां औसतन 6 के आसपास बच्चे होते थे, वहीं 2000 के दशक तक यह दर तेजी से गिरकर करीब 2 पर आ गई.1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शुरुआती वर्षों में ईरान में ज्यादा बच्चे पैदा करने को बढ़ावा दिया गया. उस समय नेतृत्व का मानना था कि बड़ी आबादी देश की ताकत होगी. इसी बीच 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध ने भी जनसंख्या बढ़ाने की सोच को मजबूत किया. नतीजा यह हुआ कि 1980 के दशक में जन्मदर ऊंची रही. लेकिन जैसे-जैसे युद्ध खत्म हुआ और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा, सरकार ने अपनी नीति पूरी तरह बदल दी.1990 के दशक में ईरान ने दुनिया के सबसे सफल परिवार नियोजन कार्यक्रमों में से एक शुरू किया. मुफ्त गर्भनिरोधक साधन, विवाह से पहले परिवार नियोजन की अनिवार्य कक्षाएं और ग्रामीण इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार इन सबने जन्मदर को तेजी से नीचे ला दिया.ईरान में महिलाओं की शिक्षा का स्तर तेजी से बढ़ा. विश्वविद्यालयों में छात्राओं की संख्या बढ़ी, नौकरी के अवसर बढ़े और शादी की औसत उम्र भी ऊपर चली गई. जब महिलाएं पढ़-लिखकर करियर पर ध्यान देती हैं तो आमतौर पर शादी देर से होती है और बच्चे कम होते हैं. ईरान में भी यही ट्रेंड दिखा. पहले जहां कम उम्र में शादी और ज्यादा बच्चे आम थे, वहीं अब शहरी परिवार एक या दो बच्चों तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं.ईरान की अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और महंगाई का गहरा असर पड़ा है. बेरोजगारी, बढ़ती कीमतें और अस्थिर आय ने भी परिवारों को छोटे परिवार की ओर धकेला. बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च लगातार बढ़ा है।

ऐसे में कई दंपती सोच-समझकर फैसला ले रहे हैं कि वे कम बच्चे ही करें, ताकि बेहतर जीवन दे सकें.सिर्फ ईरान ही नहीं, कई देशों में जन्मदर तेजी से गिरी है. भारत में 1970 के दशक में जहां प्रति महिला करीब 5 बच्चे होते थे, अब यह आंकड़ा लगभग 2 के आसपास है. दक्षिण कोरिया में तो हालात और भी चौंकाने वाले हैं. 1950 के दशक में करीब 6 बच्चे प्रति महिला से गिरकर 2023 में यह दर 1 से भी कम हो गई. हालांकि हर देश में गिरावट सीधी रेखा में नहीं हुई. अमेरिका में 1940 से 1960 के बीच बेबी बूम देखा गया, जब जन्मदर में उछाल आया था.दिलचस्प बात यह है कि अब ईरान सरकार घटती जन्मदर को लेकर चिंतित है. देश की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. कामकाजी उम्र की आबादी घटने से भविष्य में आर्थिक दबाव बढ़ सकता है. इसीलिए हाल के वर्षों में सरकार ने ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं. लेकिन बदलती सामाजिक सोच और आर्थिक हकीकत के बीच यह चुनौती आसान नहीं दिखती।

Comments
Sharing Is Caring:

Related post