कहीं के नहीं रहेंगे उपेंद्र कुशवाहा,बेटा का भी जाएगा मंत्री पद और विधायक भी छोड़ेंगे RLM का साथ
एनडीए के सहयोगी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को बीजेपी से झटका लगा है. एनडीए ने बिहार सरकार में मंत्री उनके बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद में नहीं भेजा. यानी दीपक प्रकाश अभी किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. ऐसे में उनके आगे मंत्री बने रहने पर सस्पेंस है. हालांकि बीजेपी सूत्रों का कहना है कि बिना किसी सदन का सदस्य बने भी छह महीनों तक कोई मंत्री रह सकता है.हालांकि उपेंद्र कुशवाहा के पास एनडीए में रहने के सिवा कोई और विकल्प भी नहीं है. यही वजह है कि उन्होंने बुधवार को दिल्ली में एनडीए की बैठक में हिस्सा लिया था.सूत्रों के मुताबिक बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा को विधान परिषद चुनाव के पहले अपनी पार्टी की बीजेपी नें विलय करने का ऑफर दिया था, पर उन्होंने पार्टी का बीजेपी में विलय करने से इनकार कर दिया. बाद में बीजेपी ने यह भी प्रस्ताव दिया कि वह उनके बेटे को अपने टिकट पर विधान परिषद में भेजने को तैयार है. पर उपेंद्र कुशवाहा इसके लिए भी तैयार नहीं हुए, क्योंकि बीजेपी के टिकट पर जीतने पर उनके बेटे बीजेपी के सदस्य बन जाते, जो कुशवाहा नहीं चाहते हैं क्योंकि उनको अपनी पार्टी का अस्तित्व बचा कर रखना है.उपेंद्र कुशवाहा पर उनकी ही पार्टी के विधायकों ने परिवारवाद का आरोप लगाया था. बिहार विधानसभा चुनाव में उनके चार विधायक जीत कर आए थे, जिनमें से एक उनकी पत्नी ही हैं, पर बाद में उन्होंने अपने बेटे को बिहार सरकार में मंत्री बनवा दिया जो कि किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. बेटे को मंत्री बनाने से से उनकी पार्टी के तीन विधायक नाराज हो गए.अब उपेंद्र कुशवाहा विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी से हुए समझौते को याद दिला रहे हैं, जिसमें तय किया गया था कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा को छह सीटें दी जाएंगी और बीजेपी के हिस्से से बिहार विधान परिषद में एक सीट भी मिलेगी.हालांकि बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा को अपने विधायकों की बदौलत ही राज्य सभा भेजा है.

ऐसे में पार्टी के नेता भी पूछ रहे हैं कि केवल चार विधायक की पार्टी को एक राज्य सभा और एक विधान परिषद की सीट क्यों दी जाए?बीजेपी नेताओं का यह भी तर्क है कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने कुशवाहा समुदाय को बड़ा राजनीतिक संदेश और प्रतिनिधित्व दे दिया है. वैसे अगले साल राज्यपाल की ओर से बिहार में 12 व्यक्तियों को विधान परिषद में मनोनीत किया जाना है, पर उसमें अभी समय है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या तब तक दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचा रहेगा?पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस संकट से गुजर रही है। विधानसभा में पार्टी की दो फाड़ होने के बाद अब संसद में भी पार्टी टूट सकती है। टीएमसी के करीब 20 विधायकों ने एक पत्र लिखकर मोदी सरकार को समर्थन देने की बात कही हैं। टीएमसी के बाद अब बीजेपी की नजर NDA की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) पर है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरएलएम के तीन विधायक आलोक कुमार सिंह, रामेश्वर महतो और माधव आनंद बीजेपी के संपर्क में थे।बीजेपी सूत्रों के हवाले से दावा किया कि उपेंद्र कुशवाहा को इसी साल राज्य सभा भेजते समय उनसे RLM का बीजेपी में विलय करने का आश्वासन लिया गया था। इसके अलावा जब दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाने पर विचार हुआ, तब भी पार्टी नेतृत्व ने विलय का मुद्दा उठाया था।एक समय उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए का बड़ा नेता माना जाता था, लेकिन अब प्रभाव कम होता नजर आ रहा है। जब से सम्राट चौधरी बिहार के सीएम बने हैं, उसके बाद से कुशवाहा की राजनीतिक भूमिका भी सीमित होती गई। बता दें कि दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के बाद आरएलएम के अंदर विरोध देखने को मिला था। पार्टी के चार में से तीन विधायकों ने आरोप लगाया था कि उपेंद्र कुशवाहा परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।विधायकों का कहना था कि खुद कुशवाहा राज्य सभा सांसद हैं, उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा विधायक हैं और अब बेटे को भी मंत्री बना दिया गया, जबकि वे न विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य। इसके अलावा, मंत्री बनाए जाने के फैसले के विरोध में पार्टी के सात नेताओं ने इस्तीफा भी दिया था।
