मुगल बादशाहों के किस्से और फरमान जानकर दंग रह जाएंगे आप,जानिए कैसा रहा है उस जमाने का इतिहास?
औरंगज़ेब के अलावा किसी मुगल बादशाह ने शराब से परहेज नहीं रखा. लेकिन दिलचस्प है कि उनमें कई ने अपने शासनकाल में शराबबंदी की कोशिशें कीं. यहां तक कि आमतौर पर शराब और अफीम के नशे में मस्त रहने वाले जहांगीर ने इसकी रोक के लिए हुक्मनामे जारी किए. बात दीगर है कि इसमें वे नाकामयाब रहे. यहां तक कि अपनी सख्ती और निरंकुशता के लिए याद किये जाने वाले औरंगज़ेब की हुकूमत की नाकामियों में शराबबंदी का फैसला शामिल है.एक मौके पर तो झुंझला कर उसने कहा था, “हिंदुस्तान में बस दो ही लोग शराब से तौबा किए हुए हैं – एक वो खुद और दूसरा क़ाज़ी-ए-मुमालिक अब्दुल वाहब.” हालांकि क़ाज़ी भी इस शौक में पीछे नहीं थे. बात अलग है कि बादशाह के सामने इस्लाम परस्त और शराब को हराम समझने वाले उलेमा की छवि बरकरार रखने में वे कामयाब रहे.

जानिए मुगल बादशाहों की शराब को लेकर सोच से जुड़े कुछ किस्से.दरअसल में मुगल इतिहास का यह रोचक विरोधाभास है कई मुगल बादशाह खूब पीते थे. कुछ की जानलेवा बीमारियों की वजह तो शराब और अफीम ही बनी. अनेक शहज़ादे इसके नशे में ऐसे डूबे रहे कि कम उम्र में या तो किसी काबिल नहीं रहे या फिर दुनिया से रुख़सत हो गए. लेकिन पीने वाले बादशाह भी इसके खतरे और नुकसान से अनजान नहीं रहे. खुद पीते हुए भी वे रियाया को इससे दूर रखने की कोशिशों में लगे रहे. इसके पीछे लोगों की सेहत के ख़्याल के साथ ही कानून व्यवस्था, सार्वजनिक स्थानों पर अमन-चैन कायम रखने में आने वाली दिक्कतों के अलावा धार्मिक आदर्श भी थे. खासतौर पर त्योहारों के मौकों पर शराब पीने के बाद हुल्लड़ और फिर छोटे विवादों के बड़े संघर्षों में बदल जाने की चुनौती से निपटने के लिए समय-समय पर पाबंदियों के हुक्म जारी होते रहे. लेकिन व्यवहार में ये बेअसर रहे.भारत में मुगल साम्राज्य की बुनियाद डालने वाले बाबर ने आत्मकथा “बाबरनामा” में अपनी शराब पीने की लत बेबाकी से बयान की है. इसमें उसने कई स्थानों पर शराब की महफिलों, दोस्तों के साथ शिरकत और और नशे के असर का जिक्र किया है. लेकिन 1527 में खानवा के युद्ध से पहले शराब को लेकर बाबर की सोच में बड़ी तब्दीली आई. उसने फैसला किया कि अब नहीं पियूaगा. वह यहीं नहीं थमा. शराब के तमाम कीमती पैमाने तुड़वा दिए.अगले कदम में अपनी सेना के अफसरों-सिपाहियों से उसने शराब छोड़ने की अपील की. उसकी यह अपील फौरी तौर पर असरदार रही, क्योंकि दूसरों को रोकने के पहले वह खुद शराब से दूरी बना चुका था. इतिहासकारों का मत है कि यह निर्णय मज़हबी नजरिए से सेना का उत्साह बढ़ाने और मनोबल ऊंचा करने में मददगार साबित हुआ.इतिहासकार स्टैनली लेन-पूल और एस. एम. जाफर ने इसे बाबर की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट माना है.इतिहास के पन्नो में हुमायूं के शौकों में शराब की तुलना में अफीम के इस्तेमाल का अधिक जिक्र मिलता है. लेकिन उसके संक्षिप्त शासनकाल में शराबबंदी की कोई कोशिश की गई,इसका उल्लेख नहीं है. मुगल वंश के सबसे कामयाब बादशाह अकबर को शराब से परहेज नहीं था लेकिन वह बहुत पीने वाला नहीं था. अबुल फ़ज़्ल ने आइन-ए-अकबरी में लिखा है कि वह संयम का पक्षधर था. अकबर ने शराब पर पूरी पाबंदी नहीं लगाई. लेकिन उसके प्रयोग को सीमित करने के मकसद से अनेक उपाय किए. इस कड़ी में शराब की बिक्री लाइसेंस के अधीन की गई. राजधानी में कम स्थानों पर बिक्री की इजाजत दी.सार्वजनिक नशाखोरी को हतोत्साहित करने की नीयत से सख्ती की गई. दरबार में पीकर पहुंचना खराब माना गया. इतिहासकार इरफ़ान हबीब लिखते हैं कि अकबर का मकसद पूरी शराबबंदी नहीं बल्कि इसके इस्तेमाल पर सामाजिक नियंत्रण था.मुगल बादशाहों में नशाखोरी के मामले में जहांगीर की सबसे ज्यादा चर्चा होती है. शराब और अफ़ीम की लत के चलते उसके शासन की बागडोर आमतौर पर मल्लिका नूरजहां के हाथों में रही. अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहांगीरी में उसने कुबूल किया है कि युवावस्था में वह प्रतिदिन लगभग बीस प्याले तक शराब पी जाता था.उसने लिखा, “मैंने अठारह वर्ष की उम्र से शराब पीना आरम्भ किया और मात्रा इतनी बढ़ गई कि दिन-रात अनेक प्याले पीने लगा.” आगे वह स्वीकार करता है कि स्वास्थ्य बिगड़ने पर चिकित्सकों की सलाह से शराब घटाकर अफीम लेनी शुरू की.बेशक उसका दावा था कि बाद में उसने इसकी मात्रा पांच प्याले कर दी लेकिन अन्य कई इतिहासकार इससे सहमत नहीं हैं कि पीने के मामले में उसने कभी कमी की. रोचक है कि खुद खूब नशा करने वाले जहांगीर ने गद्दी पर बैठते समय अपने प्रसिद्ध जो बारह आदेश जारी किए, उनमें एक शराब और अन्य नशीले पदार्थों के निर्माण एवं बिक्री पर रोक का था.इतिहासकार डॉ. बेनी प्रसाद ने लिखा है कि यह आदेश नैतिक आदर्श अधिक था, व्यावहारिकता से इसका वास्ता नहीं था. जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में यह स्वीकार किया कि वह शराब पूरी तरह छोड़ नहीं सका. अनेक इतिहासकारों की राय में अत्यधिक शराब और अफीम के इस्तेमाल ने उसकी सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव डाला और यह उसकी असमय मौत का बड़ा कारण था.पिता जहांगीर के विपरीत शराब को लेकर शाहजहां संयमित था. वह पीता था लेकिन पिता जैसे हर वक्त नशे में डूबा नहीं रहता था. फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर, जो शाहजहां के अंतिम वर्षों में भारत में था, लिखता है,” शाहजहां अपने पिता जहांगीर की तरह शराब का दास नहीं था. वह कभी-कभी शराब पीता था, लेकिन इतालवी यात्री निकोलाओ मनूच्ची ने लिखा है कि शाहजहां विलासप्रिय अवश्य था, लेकिन मदिरापान में अति नहीं करता था. इतिहासकार सतीश चन्द्र ने भी अपनी पुस्तक Medieval India में जहांगीर और शाहजहां की तुलना करते हुए लिखा है कि शाहजहां व्यक्तिगत जीवन में अपेक्षाकृत अधिक संयमी था. लेकिन शाहजहां ने पिता जहांगीर की तरह शासन स्तर पर शराबबंदी का कोई आदेश जारी नहीं किया.उसके शासनकाल का ऐसा कोई शाही फ़रमान उपलब्ध नहीं है जिसमें पूरे साम्राज्य में शराब के निर्माण, बिक्री और सेवन पर सामान्य प्रतिबंध लगाया गया हो. हालांकि शाहजहां व्यक्तिगत रूप से सुन्नी इस्लामी मूल्यों का पालन करने वाला शासक था. इसलिए उसने सार्वजनिक रूप से शराब के व्यापार और खुले सेवन को प्रोत्साहित नहीं किया. इतिहासकार संकेत देते हैं कि शाहजहां के शासन में नैतिक अनुशासन पर बल था, लेकिन उसने पुत्र औरंगज़ेब जैसी व्यापक धार्मिक नीति नहीं अपनाई गई. उसके दरबार में विदेशी व्यापारियों के लिए शराब उपलब्ध रहती थी.मुगल बादशाहों में औरंगज़ेब ने शराबबंदी और नशे के अन्य पदार्थों के सार्वजनिक व्यापार पर रोक की कोशिशें कीं. अपने पुरखों के विपरीत वह नशाखोरी से दूर रहता था. शासक के तौर पर उसे रियाया को भी इस मामले में अपने रास्ते पर ले चलने की ख्वाहिश थी, इसी उम्मीद में उसने 1658 के बाद अनेक फ़रमान जारी कर शराब, भांग और नशे के सार्वजनिक व्यापार पर रोक लगाने का उसने प्रयास किया. हालांकि, इसके अमल में आम तौर पर उसे नाकामी हासिल हुई. फ्रांसीसी यात्री बर्नियर के मुताबिक बुतपरस्त (हिंदू) और मोहम्मद (इस्लाम) को मानने वाले यानि दोनों ने ही शराब को हराम बताया है।
