आरक्षण के मुद्दे पर NDA के भीतर घमासान,चिराग-मांझी ने बढ़ाई टेंशन

 आरक्षण के मुद्दे पर NDA के भीतर घमासान,चिराग-मांझी ने बढ़ाई टेंशन
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बिहार में एक बार फिर से दलित के नाम पर राजनीति तेज हो गई है. मुद्दा आरक्षण है लेकिन नजर दलित वोट बैंक पर है. दलितों के नेता बनने की कोशिश भी है और घमासान एनडीए के घटक दल के बीच ही हो रहा है. एक तरफ हम संरक्षक जीतनराम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन मांझी हैं तो दूसरी तरफ लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान हैं. दोनों तरफ से इस्तीफे की मांग भी हो रही है. दोनों एनडीए में हैं और मोदी कैबिनेट में मंत्री भी हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या सूबे की सियासत बदलने वाली है?असल में देश में आरक्षण को लेकर इन दोनों आंदोलन हो रहा है. एक तबका आरक्षण समाप्त करने की मांग कर रहा है लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा. वहीं, इस मुद्दे पर नेताओं की बयानबाजी भी शुरू हो गई है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दलित वर्ग के आरक्षण में उप वर्गीकरण की बात कही थी और उसके सपोर्ट में केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी मुखर हैं, जबकि चिराग पासवान का अलग रुख है।दरअसल, पंजाब के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 1 अगस्त 2024 को एक अहम फैसला सुनाया था. संविधान पीठ ने एससी-एसटी मामले में आरक्षण को लेकर सुनवाई करते हुए सरकार को कोटा के भीतर कोटा बनाने की अनुमति दे दी.

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सर्वोच्च अदालत ने कहा,’एससी-एसटी वर्ग में सभी जाति एक समान नहीं है. जो जातियां ज्यादा पिछड़ी हैं, राज्य सरकार उनके लिए उप कोटा तय कर सकती है।हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से केंद्र सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दी है. सरकार कोटा में कोटा लागू करती है तो विशेषज्ञों का कहना है कि इससे विरोध शुरू हो सकता है. इसलिए केंद्र सरकार इस फैसले के बाद एक तरह से बैकफुट पर दिखाई दे रही है. इस फैसले के बाद एनडीए में भी घमासान मचा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जीतनराम मांझी समर्थन करते रहे हैं और अब उनके बेटे संतोष सुमन ने भी खुलकर बयानबाजी शुरू कर दी है, जबकि चिराग का रुख इसे उलट है.बिहार में 243 विधानसभा सीटों में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 40 विधानसभा की सीटें हैं तो वहीं लोकसभा की 40 सीटों में से अनुसूचित जाति के लिए 6 सीटें आरक्षित हैं. इसके अलावे 19.65% दलित वोट कई सीटों पर जीत हार का फैसला करता है. इसीलिए दलित वोट बैंक पर सभी दलों और नेताओं की नजर है. कुछ पार्टियों तो दलित के नाम पर ही सियासत करती हैं.2023 में बिहार सरकार ने जाति आधारित गणना करवाई थी. उसके मुताबिक अनुसूचित जाति की कुल आबादी 2 करोड़ 56 लाख 89820 है, जो बिहार की कुल आबादी का 19.65% है. बिहार की 22 अनुसूचित जातियों में दुसाध/पासवान/धारी, चमार/मोची/रविदास, बंटार, बौरी, भोगता, भुइंया, चौपाल, दबगर, धोबी/रजक, मुसहर, नट, पान/स्वासी, डोम/धंकार/बांसफोड़, घासी, हलालखोर, हरि/मेहतर/भंगी, कंजर, कुरारियार, लालबेगी, पासी, रजवार और तुरी शामिल हैं.प्रमुख दलित जातियों में सबसे अधिक पासवान जाति की आबादी है. पासवान सबसे अधिक 5.31% है. इसके बाद रविदास 5.26% है. मुसहर की आबादी 3.08% है. वहीं धोबी 0.8% और पासी 0.9% हैं।243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में दलित समाज से आने वाली पासवान और रविदास जातियों की नुमाइंदगी सबसे अधिक 11-11 है, जबकि मुसहर जाति के 9 विधायक हैं. पासी और धोबी समाज से 2-2 विधायक हैं. वहीं भुइयां और रजवार जाति से एक-एक विधायक 2025 चुनाव में जीते हैं।2025 विधानसभा चुनाव में एससी-एसटी की 40 विधानसभा सीटों में से 35 सीट पर एनडीए को जीत मिली, केवल पांच सीटों पर महागठबंधन को जीत हासिल हो पाई. सबसे अधिक जेडीयू ने 14 सीटें जीती हैं, जबकि बीजेपी ने 12 सीट, लोजपा (रामविलास) 5 सीट, हम को चार सीट, आरजेडी चार सीट और कांग्रेस को एक सीट पर जीत हासिल हुई.नीतीश कुमार ने भी बिहार की सत्ता संभालने के बाद इस वोट बैंक को पहचाना और अपने पक्ष में करने के लिए कई उपाय किए, जिसमें महादलित आयोग का गठन भी एक था. दलितों को महादलित में बांटा, तब से दलित पर सियासत खूब हो रही है. हालांकि बाद में राजनीति करवट बदली और सभी दलित जातियों को महादलित में शामिल कर लिया गया.हालांकि बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री और दलित वर्ग से आने वाले सुनील कुमार का कहना है कि नीतीश कुमार ने विजनरी नेता के तौर पर समाज के सबसे पिछड़े तबके को आगे लाने के लिए महादलित आयोग और फिर दलित विकास मिशन बनाकर उनके लिए कई योजनाओं को लागू किया. महादलित टोलों को सड़क से जोड़ा गया.पासवान मतों पर चिराग पासवान की अगुवाई वाली लोजपा (रामविलास) का एकछत्र राज है. लोक जनशक्ति पार्टी का गठन 2000 में रामविलास पासवान ने किया था. हालांकि 2000 के चुनाव में पार्टी को केवल 10 सीटों पर जीत मिली लेकिन 2005 फरवरी में हुए चुनाव में लोजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 29 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की. बिहार में किसी को बहुमत नहीं मिला. रामविलास पासवान उस समय सरकार बनाने की ‘चाबी’ लेकर घूम रहे थे.नीतीश कुमार ने 2014 में जेडीयू के खराब प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया लेकिन कुछ ही महीने में उनके साथ विवाद हो गया. सीएम पद से हटाने के बाद मांझी ने अलग पार्टी (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) बना ली. 2015 में एनडीए के साथ मिलकर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन केवल एक सीट पर जीत मिली.बीजेपी कोटे से एससी-एसटी मंत्री लखेंद्र पासवान ने आरक्षण को लेकर कहा कि जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, आरक्षण की समीक्षा या इसे छूना तो दूर, कोई इससे छेड़छाड़ भी नहीं कर सकता. उन्होंने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि इसे किसी की खैरात नहीं समझना चाहिए. उन्होंने चिराग और मांझी को नसीहत भी दी है।वैसे 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने दलित वोट बैंक को साधने के लिए महादलित आयोग और फिर महादलित विकास मिशन बनाकर कई योजनाएं चलाई थी, जिसका उन्हें लाभ भी मिला लेकिन बिहार में रामविलास पासवान दलितों के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर उभरे. वहीं अब उनके बेटे चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के बीच भी दलितों का सबसे बड़ा बनने की अघोषित लड़ाई चल रही है. इसलिए आरक्षण के बहाने दोनों दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

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