स्टालिन के हार के पीछे का ये है कारण!बंगाल में ऐसे जीती भाजपा,मोदी-शाह का दिखा कमाल

 स्टालिन के हार के पीछे का ये है कारण!बंगाल में ऐसे जीती भाजपा,मोदी-शाह का दिखा कमाल
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सोमवार को आए नतीजे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अति आह्लादकारी हैं. उनकी राजनीति के दो प्रमुख विरोधी नेता औंधे मुंह गिरे हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को बीजेपी और तमिलनाडु में स्टालिन को थलपति विजय ने चित कर दिया. इसके अतिरिक्त लेफ्ट का आख़िरी क़िला केरलम भी ढह गया. काल मार्क्स की जयंती की पूर्व संध्या को भारत से कम्युनिस्ट सरकार का अंतिम गढ़ भी ध्वस्त हो गया.बीजेपी अब पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक निष्कंटक राज करने की सोच कर खुश हो सकती है. यह अलग बात है कि दक्षिण के तीन राज्यों में अब कांग्रेस मोर्चे की सरकारें आ गई हैं. कर्नाटक, तेलंगाना के बाद केरलम में भी कांग्रेस सरकार बनाएगी. लेकिन प्रधानमंत्री का जैसा विरोध एमके स्टालिन कर रहे थे, वैसा विरोध सिद्धरमैया, रेवंत रेड्डी और अब केरल की सरकारों से होने का अंदेशा नहीं है.ममता बनर्जी 2011 से लगातार 15 वर्ष तक पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ रहीं. मुस्लिम मतदाताओं के प्रति अतिरिक्त रुझान और प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार ने उनकी छवि बिगाड़ दी थी. हालांकि उनके लिए संतोष की बात यह है कि अभी तक उनकी निजी छवि बेदाग़ रही है पर उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप हैं. ममता ने यह सब जानते हुए भी अपने भतीजे पर कभी अंकुश नहीं लगाया. आरजी कर कांड को कोई नहीं भुला सकता. राज्य में मुख्यमंत्री रहते हुए ममता बनर्जी ने नौकरशाही और पुलिस प्रशासन को अपना चाकर बना लिया था. वे सीधे-सीधे केंद्र सरकार को चुनौती देती थीं. ऐसे में उनके अहंकार का घड़ा फूटना ही था.असल चीज़ तो यह है कि ममता ने गांव-गांव जा कर कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि जिन वोटरों की ताक़त पर वे राइटर्स बिल्डिंग पहुंची थीं, उसकी हालत क्या है. वे बीजेपी का मुक़ाबला यूं कर रही थीं, जैसे बीजेपी की मतदाताओं में पैठ महज़ एक प्रचार हो.उन्होंने इस बात पर गौर नहीं किया कि जो बीजेपी अंग (बिहार) और कलिंग (उड़ीसा) में क्षेत्रीय पार्टियों को ध्वस्त कर अपनी सरकार बनाने में सफल हुई है, वह बंग (बंगाल) में बस ममता, माटी और मुस्लिम से ही हार जाएगी. बीजेपी के रणनीतिकार साल के 365 दिन चुनावी मोड में रहते हैं. उन्होंने 2021 के विधान सभा चुनाव के नतीजों से ही सबक़ ले लिया था कि यदि बंगाल से ममता को उखाड़ना है तो ज़मीन पर जा कर काम करना होगा. इसीलिए उन्होंने ममता बनर्जी सरकार की हर नाकामी पर और हर कमजोरी पर नज़र रखनी शुरू की.हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना या केंद्रीय बलों को कोसना तो एक तरह से खीझ मिटाना है. ममता बनर्जी को भी पता है कि वे क्यों हारीं. क्यों उनकी सरकार की नौकरशाही और पुलिस प्रशासन सिर्फ़ उन्हीं की हां में हां मिलाता था. केंद्र ने बस यही किया कि ममता के अफ़सरों को इधर-उधर कर दिया.ममता बनर्जी जिस इंडी गठबंधन की ताक़त पर भविष्य में मोदी सरकार को हटाने की योजनाएं बना रही थीं, वह भी ममता को समझ रहा था. इसीलिए ममता विपक्षी दलों के बीच भी कोई तालमेल नहीं बिठा पाईं. कांग्रेस भी उनके विरुद्ध लड़ी और वाम दल भी. सच बात तो यह ममता को किसी पर भरोसा नहीं था. अपने चहेते अफ़सरों और पुलिस अधिकारियों को वे केंद्र के विरुद्ध उकसा रही थीं.कांग्रेस भी इतना समझती थी कि ममता के साथ जाना आग से खेलना है.

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उनके अधिकारी सबकी कुंडली बना डालेंगे और जब चाहेंगे वे उनको लपेट लेंगे. इसलिए ग़ैर बीजेपी विपक्ष उनके क़रीब आने से झिझकता रहा. ममता बनर्जी ने जिस तरह से 34 वर्ष के कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फेंका था, उसके बूते उनकी छवि बंगाल की शेरनी जैसी बन गई थी. परंतु ममता बनर्जी स्वयं अपनी छवि में इस क़दर डूब गईं कि वे ख़ुद भी स्वयं को शेरनी समझने लगी थीं.बीजेपी ने ममता सरकार के 15 वर्षों की सारी नाकामियों को खंगाला. उनकी सरकार पर लगे शिक्षक भर्ती घोटाला (2016) से लेकर शारदा चिट फंड घोटाला, राशन घोटाला आदि के कई आरोप पर बीजेपी हमलावर हुई. किंतु ममता अपनी आक्रामक शैली में सब आरोपों को नकारती रही. जबकि इस बीच उनकी ही पार्टी के तमाम राजनेता उनका साथ छोड़ कर बीजेपी में चले गये. शुभेंदु अधिकारी के पहले मुकुल रॉय भी बीजेपी में गए थे, हालांकि बाद में वे फिर से तृणमूल में आ गये थे.मुकुल रॉय वे राजनेता थे जो ममता के साथ तृणमूल कांग्रेस के गठन के वक्त भी थे. अभी 23 फ़रवरी को उनका निधन हो गया. अपने पुराने साथियों के बिछड़ने से ममता बनर्जी और ग़ुस्से में भर गईं. यहां तक कि उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने शुभेंदु अधिकारी को मीर जाफ़र घोषित कर दिया. जिस प्रदेश की राजनीति इतनी संवेदनशील हो वहां इस तरह का बयान तृणमूल को ही घेरने वाला रहा.पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में हिंदुओं में व्याप्त भय को ममता समझ नहीं पाईं. उधर बीजेपी से खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने कमान सम्भाल ली. उन्हें ज़मीनी सच्चाई पता थी, इसीलिए उन्होंने उस वोटर को पकड़ा जो बंगाली भद्र लोक था तथा मारवाड़ी, बिहारी, गुजराती और उत्तर प्रदेश का था. झालमूड़ी, नौका विहार आदि को टीएमसी महज़ शिगूफ़ा समझ रही थी किंतु इसका व्यापक असर पड़ा.इसके अतिरिक्त बूथ लेबल मैनेजमेंट में भी बीजेपी आगे रही. इस बार बीजेपी ने दीदी पर व्यंग्य नहीं किया. ये सब बातें बीजेपी के पक्ष में गईं. इसके अलावा बांग्ला देश में सत्ता परिवर्तन का असर भी पड़ा और इस प्रचार का भी कि बांग्लादेश की नई सरकार इस बात से चिंतित है कि बीजेपी सत्ता में आई तो बांग्ला देशी वापस भेजे जाएंगे. इस तरह के प्रचार मुस्लिम वोटर एकजुट हुआ तो हिंदू वोटर भी. टीएमसी को अब अपनी जगह तलाशनी चाहिए.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक और शास्वत विरोधी एमके स्टालिन की पार्टी DMK की पराजय भी बीजेपी को संतोष देने वाली है. स्टालिन पिछले पांच वर्ष से लगातार वे हर उस बात का विरोध करते थे जो केंद्र से जारी होती. दक्षिण भारत में आंध्र और पुडुचेरी को छोड़ कर कहीं भी बीजेपी या उसके गठबंधन की सरकार नहीं है. मगर कर्नाटक, तेलंगाना अथवा केरलम ने कभी भी प्रधानमंत्री का उस तरह विरोध नहीं किया, जिस तरह स्टालिन कर रहे थे.उत्तर और दक्षिण भारत के बीच अलगाव की आंच को वे ही सुलगा रहे थे. भाषा नीति, हिन्दी विरोध, उत्तर विरोध और भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के समानांतर द्रविड़ राष्ट्रीय अस्मिता सबको परेशान किये थी. वहां के लोग भी स्टालिन से परेशान थे. हालांकि अभी उनकी पार्टी नंबर दो की पोजिशन में है और यह भी संभावना है कि DMK गठबंधन का कोई साथी टूट कर थलपति विजय की TVK को समर्थन दे दे.ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए और बड़ा संकट आएगा क्योंकि यदि कांग्रेस ने DMK गठबंधन से हट कर TVK को सपोर्ट किया तो दक्षिण के चार बड़े राज्य केंद्र सरकार के विरोध में खड़े होंगे. उत्तर और दक्षिण के मध्य विभाजन रेखा और तगड़ी हो जाएगी. अब देखना यह है कि केंद्र सरकार कैसे भावी स्थितियों से पार पा पाएगी.

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