फिल्म वेलकम टू द जंगल ने बॉक्स ऑफिस पर उड़ाया गर्दा,सितारों से भरी ये फिल्म तोड़ेगी सबका रिकॉर्ड!
वेलकम टू द जंगल’ के लिए अगर आप थिएटर में ये सोचकर जा रहे हैं कि आपको कोई बहुत गहरी, दिमागी या किसी बड़े सामाजिक संदेश वाली फिल्म देखने को मिलेगी, तो भाई अपना टिकट तुरंत कैंसिल करा दीजिए. क्योंकि ऐसी फिल्में लॉजिक या रीजनिंग के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ बिना सोचे-समझे हंसने और फुल-ऑन एंटरटेनमेंट के लिए थिएटर में आती हैं. अहमद खान के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म के बारे में अगर सिर्फ एक लाइन में कहें, तो ‘वेलकम टू द जंगल’ सब कुछ भूलकर ठहाके लगाने पर मजबूर करने वाली एक मैड-कैप कॉमेडी फिल्म है.अक्सर क्रिटिक्स को जो चुटकुले थोड़े अजीब या सस्ते लगते हैं, थिएटर के अंदर बैठी आम जनता उसी पर सबसे ज्यादा ताली पीटकर हंसती है. अक्षय कुमार की ये फिल्म बड़े-बड़े शब्दों वाली समीक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि उन दर्शकों के लिए बनी है जो दिनभर की टेंशन को बाहर छोड़कर दो पल खुलकर हंसना चाहते हैं.

लेकिन क्या ये फिल्म सिर्फ एक बिना सिर-पैर का मजाक है या फिर थिएटर के अंदर ये आपके पैसों को पूरी तरह वसूल करा पाती है? क्या ये मल्टीस्टारर ‘वेलकम’ फ्रेंचाइजी के उस कल्ट स्टेटस के साथ इंसाफ कर पाई? इस तमाम सवालों का जवाब जानने के लिए आपको ये पूरा रिव्यू पढ़ना होगा.क्या होगा जब काले धन के पहाड़ पर बैठा एक शातिर नेता (पॉलिटिशियन) अपने करोड़ों रुपये के काले साम्राज्य को कानूनी रूप से व्हाइट करने के लिए एक अजीबोगरीब दांव खेलता है? वो मास्टर प्लान बनाता है कि वो बॉलीवुड के इतिहास की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म बनाएगा, ताकि उसका सारा पैसा भयंकर घाटे में डूब (लॉस) जाए और कागजों पर सब कुछ साफ हो जाए! ‘वेलकम टू द जंगल’ इसी अनोखे और अतरंगी ताने-बाने पर बुनी गई फिल्म है.करोड़ों का नुकसान झेलने के लिए तैयार बैठा यह नेता इस नामुमकिन मिशन को पूरा करने के लिए दो महान फिल्म मेकर्स को काम पर लगाता है, इनका नाम है देव (राजपाल यादव) और दास (परेश रावल). इन दोनों को फिल्म बनाने का काम सिर्फ इसलिए दिया जाता है कि वो फ्लॉप हो सके. अब फिल्म के लिए ये दोनों मिलकर एक फ्लॉप एक्टर (अक्षय कुमार), दो डॉन (सुनील शेट्टी और अरशद वारसी) के साथ दुनिया भर के फ्लॉप एक्टर, भोजपुरी एक्टर और टीवी एक्टर की एक पूरी फौज इकट्ठी करते हैं. लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तब आता है, जब सबसे फ्लॉप फिल्म बनाने का यह मिशन इस पूरी पलटन को जंगल के बीचों-बीच बसे एक ऐसे अलग-थलग गांव में ले जाता है, जो पुरानी दुश्मनियों,गलतफहमियों, पागलपन और अजीबोगरीब चुनौतियों से भरा हुआ है. अब क्या ये अतरंगी मेकर्स मिलकर वो फ्लॉप फिल्म पूरी कर पाते हैं? क्या उस नेता का यह टेढ़ा और अनोखा प्लान कामयाब हो पाता है? ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर वेलकम टू द जंगल देखनी होगी.वेलकम टू द जंगल’ एक मास एंटरटेनर फिल्म है, ये फिल्म मेट्रो शहरों के साथ-साथ हमारे देश के दिल यानी सिंगल स्क्रीन और मास पॉकेट्स वाले दर्शकों को सीधे कनेक्ट करती है. फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा धीमा है. शुरुआत के सिर्फ 35 मिनट कहानी का बेस बनाने में लगते हैं, और उसके बाद जो हंसी का सफर शुरू होता है, वो दर्शकों को लोटपोट कर देता है और बॉलीवुड के इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ है कि फिल्म के इंटरवल में भी अक्षय कुमार और दिशा पाटनी पर फिल्माया गया एक गाना दिखाया गया है.अक्षय कुमार और रवीना टंडन को इतने सालों बाद एक साथ स्क्रीन पर देखना किसी बड़े सरप्राइज से कम नहीं है. पहले हमने उनका रोमांस और गजब की केमिस्ट्री देखी थी, लेकिन इस फिल्म में दोनों ने जिस तरह की कॉमेडी की है, वो देखने लायक है. जब रवीना टंडन, अक्षय कुमार को देखकर वो डायलॉग मारती हैं कि 20 साल कहां थे तुम? तो थिएटर तालियों से गूंज उठता है. फिल्म का सेकंड हाफ (पोस्ट-इंटरवल) मज़ेदार है, हम चाहकर भी इसे रोक नहीं पाते, लेकिन अहमद खान ने कहानी में इतने सारे मसाले और ट्विस्ट डालने की कोशिश की है कि कुछ जगहों पर फिल्म अपनी वो रफ्तार और चमक खो देती है.बागी 4’ जैसी भयंकर फ्लॉप फिल्म के बाद डायरेक्टर अहमद खान से किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं. लेकिन इस फिल्म में उन्होंने कमाल का कमबैक किया है. इतनी बड़ी और भारी-भरकम स्टारकास्ट को संभालना और हर एक एक्टर को स्क्रीन पर सही स्पेस देना कोई आसान काम नहीं था. लेकिन अहमद खान ने हर एक एक्टर की यूएसपी (स्ट्रेंथ) को समझा और उसी हिसाब से उनके किरदार और पंच लिखे. फिल्म के डायलॉग्स कई जगहों पर पेट दर्द होने तक हंसाते हैं.वेलकम टू जंगल में भले ही स्क्रीन पर सितारों का पूरा मेला लगा हो, लेकिन इस पूरी नैया के खेवनहार अक्षय कुमार ही हैं. अपनी गजब की कॉमिक टाइमिंग और एक्टिंग से वो पूरी फिल्म को अपने कंधों पर खींचते हैं. सुनील शेट्टी और अरशद वारसी ने अपने-अपने किरदारों में बेहतरीन काम किया है. वहीं ऑन-स्क्रीन फिल्म मेकर्स के रूप में परेश रावल, राजपाल यादव और श्रेयस तलपड़े की तिकड़ी ने जबरदस्त रंग जमाया है. जॉनी लीवर हमेशा की तरह अपने कुछ ही सीन्स में महफिल लूट ले जाते हैं. लेकिन इस फिल्म की जो असली जान और सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट हैं, वो हैं आजादगंज गांव वाले किरदार.फरीदा जलाल, रवीना टंडन और किरण कुमार की एंट्री होते ही फिल्म एक अलग ही लेवल पर चली जाती है. विलेन के रूप में जैकी श्रॉफ शानदार हैं. हालांकि, दिशा पाटनी और जैकलिन फर्नांडीस के पास करने के लिए कुछ खास नहीं था, उन्हें स्क्रीन टाइम बहुत सीमित मिला है. सभी कलाकारों ने अपने किरदारों को न्याय देने की कोशिश की है.अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो कोई गहरा मेसेज देती हैं या जिनकी कहानी में बहुत लॉजिक होता है, तो ये फिल्म आपके सिर में दर्द कर सकती है. फिल्म का फर्स्ट हाफ हिस्सा थोड़ा लंबा और कुछ जगहों पर फीका लगता है, जिसे एडिटिंग टेबल पर थोड़ा और क्रिस्प किया जा सकता था.कुल मिलाकर हर फिल्म समाज को सुधारने का संदेश दे या फिर वायलेंस वाले सीन दिखाकर दर्शकों का मनोरंजन करें, ये जरूरी नहीं है. सिनेमा का एक बड़ा मकसद मनोरंजन भी होता है और ‘वेलकम टू द जंगल’ उसी मकसद को पूरा करती है. जैसे की सन ऑफ सरदार में किसी महापुरुष ने कहा है, अरे पाजी, कभी हंस भी लिया करो ये फिल्म बिल्कुल इसी फिलॉसफी पर चलती है. स्वाद बदलने के लिए जैसे हर तरह का खाना जरूरी है, वैसे ही बॉलीवुड के गिरते कॉमिक स्तर के बीच ये फिल्म एक बढ़िया बैलेंस बनाती है. अगर आप बिना किसी दिमागी कसरत के सिर्फ हंसना चाहते हैं, तो ये फिल्म आपके लिए एक पैसा वसूल साबित हो सकती है.
