बंगाल में रिगिंग नहीं है कोई नई बात,जान लीजिए चुनाव आयोग और TMC के बीच का मनमुटाव

 बंगाल में रिगिंग नहीं है कोई नई बात,जान लीजिए चुनाव आयोग और TMC के बीच का मनमुटाव
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पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान गड़बड़ियों को ठीक करने का चुनाव आयोग का प्रयास सराहनीय है. हालांकि, इसे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के नेता अनावश्यक और लोगों को परेशान करने वाला कदम बताते हैं. से सिर्फ एक उदाहरण से समझें. ममता बनर्जी के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के चुनाव क्षेत्र डायमंड हार्बर का एक विधानसभा इलाका है फाल्ता. वहां से इस बार टीएमसी ने जहांगीर को अपना उम्मीदवार बनाया है. चुनाव आयोग को शिकायत मिली कि जहांगीर वहां के वोटरों को धमका रहा है. चुनाव पर्यवेक्षक बन कर आए यूपी कैडर के आईपीएस अजय पाल शर्मा अर्दधसैनिक बल की एक टुकड़ी लेकर जहांगीर के घर धमक गए. जहांगीर तो नहीं मिला लेकिन उन्होंने सख्त चेतावनी दी कि आगे ऐसी शिकायत मिली तो ठीक नहीं होगा. घर वालों को धमकी दी कि जहांगीर तक यह बात पहुंचा दें. वर्ना बाद में रोना-पछताना पड़ेगा. शर्मा की चेतावनी को टीएमसी ने मतदाताओं को धमकाने वाला कदम बताया. उनको केंद्र कर एक फेक वीडियो टीएमसी नेता सायोनी घोष ने जारी किया. जहांगीर ने भी वीडियो जारी कर शर्मा को चेतावनी दी कि अगर वे सिंघम हैं तो वह भी पुष्पा है. यह जान लें कि ‘सिंघम’ कड़क पुलिस अफसर का प्रतीक है तो ‘पुष्पा’ कुख्यात अपराधी का. बात यहीं नहीं रुकी. टीएमसी समर्थक एक महिला ने शर्मा के खिलाफ रेप के प्रयास का मामला भी पुलिस में दर्ज करा दिया.बंगाल में चुनावी गड़बड़ी कोई नई बात नहीं है. चुनाव आयोग ने भी इस बार इन गड़बड़ियों पर अंकुश लगाने की ठान ली थी. आयोग ने बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए एक निर्देश जारी किया था. 21 अप्रैल को जारी निर्देश में कहा गया था कि ईवीएम के बटन पर इत्र (परफ्यूम), गोंद या किसी भी तरह का पदार्थ लगाना छेड़छाड़ माना जाएगा और यह चुनावी अपराध है. तब इत्र की बात ठीक से समझ में नहीं आई थी. इसलिए कि 1991 से बंगाल का करीबी रिश्ता रहने के बावजूद यह बात कभी नहीं सुनी या जानी थी. अलबत्ता लेफ्ट के 34 साल के शासन काल में साइंटिफिक रिंगिंग जरूर मेरे एक मित्र ने समझाई थी. गोंद या पानी की तरलता से ईवीएम के साफ्टवेयर के खराब होने की बात तो समझ में आई थी, लेकिन परफ्यूम के बारे में आयोग का तर्क ठीक से समझ नहीं पाया था. बाद में बंगाल के ही एक परिचित ने बताया कि टीएमसी समर्थक अपने उम्मीदवार के बटन पर इत्र इसलिए लगाते हैं, ताकि वोट करने वाले की अंगुली सूंघ कर पता लगा सकें कि उसने किसे वोट दिया है.

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अगर दूसरे को वोट दिया साबित हो गया तो प्रताड़ना-अवहेलना झेलने वालों की सूची में उस आदमी का नाम दर्ज हो जाता है. बाद में उन्हें सत्ताधारी दल के समर्थक तरह-तरह से तबाह करते हैं. आखिरी दौर की वोटिंग के दौरान एक बूथ पर जब टेप चिपकाने की शिकायत सार्वजनिक हुई, तब समझ में आया कि बंगाल में किसी गठबंधन या दल की सरकारें वर्षों तक क्यों नहीं बदलतीं! खबर आई कि ममता बनर्जी के चुनाव क्षेत्र के एक बूथ में ईवीएम के उस बटन पर टेप चिपका था, जो भाजपा के सिंबल का संकेत कर रहा था.90 के दशक में बिहार बूथ लूट के लिए बदनाम था. बूथ पर उसी दल के वोट पड़ते, जिसके लोग कब्जा कर चुके रहते. 2005 में चुनाव आयोग के सलाहकार केजे राव ने ठीक वैसा ही तरीका अपनाया, जिस ढंग से चुनाव आयोग ने इस बार बंगाल में मतदान कराया है. बंगाल के ज्यादातर अफसरों को आयोग ने पहले इधर से उधर किया. यह सिलसिला आखिरी दौर के मतदान के अंतिम रात तक चला. बिहार में राव के प्रयास से लोगों ने मिर्भीक होकर वोट डाले थे. इसके साथ ही 15 साल से जमा-जमाया लालू-राबड़ी राज का अंत हो गया था. इससे पहले जब तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषण ने वोटर आईडी कार्ड जारी करने का फरमान सुनाया तो लालू यादव ने यह कहते हुए इसका विरोध किया था कि इससे राज्य के खजाने पर बेवजह बोझ बढ़ेगा. पर, चुनावी गड़बड़ियों के मामले में बंगाल तो बिहार से भी आगे निकल गया. पहले पाड़ा और इलाका दखल सत्तादारी वाम फ्रंट के लोग करते थे. इससे विरोधियों की पहचान करने में उन्हें सहूलियत होती थी. फिर उन्हें धमकाने और प्रताड़ित करने का काम होता था. महिलाों के साथ रेप और छेड़खानी तो आम बात थी. तकलीफदेह स्थिति यह थी कि उनकी शिकायतें भी थानों में दर्ज नहीं हो पाती. इसलिए कि सत्तादारी वाम मोर्चा के लोकल कमेटियों की मर्जी के खिलाफ पुलिस को काम करने की छूट ही नहीं थी. बाद में ममता बनर्जी जब सत्ता में आईं तो उन्होंने हूबहू वाम फ्रंट सरकार के इन नुस्खों को अपना लिया।

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