अब राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करेंगी ममता बनर्जी,इंडिया गठबंधन को करेंगी मजबूत
बंगाल की सियासत में हुई हार ने ममता बनर्जी को सिर्फ राजनीतिक तौर पर नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी झकझोर दिया है. कभी अपने दम पर राष्ट्रीय राजनीति को चुनौती देने का दावा करने वाली ममता अब उस मोड़ पर खड़ी हैं, जहां इंडिया गठबंधन के साथ खड़े होना विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बनता दिख रहा है. यह वही ममता हैं जिन्होंने लंबे समय तक विपक्षी एकता से दूरी बनाए रखी, कांग्रेस से टकराव लिया और खुद को फेडरल फ्रंट की संभावित धुरी के रूप में पेश किया. लेकिन बंगाल की शिकस्त ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय राजनीति में अकेले चलने की सीमा क्या है.अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ममता गठबंधन के करीब क्यों आ रही हैं, बल्कि यह है कि क्या यह बदलाव उनकी मजबूरी है, सोची-समझी रणनीति है या फिर एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक, जो आने वाले समय में पूरे विपक्ष की दिशा तय कर सकता है.बंगाल का चुनावी नतीजा एक राजनीतिक युग के अंत और नए समीकरणों की शुरुआत का संकेत बन गया. जिस ममता बनर्जी 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को खत्म करने के लिए ‘परिवर्तन’ का नारा दिया था, 2026 में वो खुद उसी बदलाव की चपेट में आ गईं. 15 साल की सत्ता के बाद उनकी पार्टी का सत्ता से बाहर होना और खुद उनका चुनाव हार जाना इस बात का संकेत है कि बंगाल की राजनीति एक बहुत बड़े परिवर्तन से गुजर रही है. लेकिन असली कहानी ममता की हार से ज्यादा उस पलटवार की है जो अब ममता बनर्जी की राजनीति में दिख रहा है और उसका केंद्र है इंडिया गठबंधन.2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी+ ने 207 सीटें जीतकर पहली बार बंगाल में सरकार बनाने का रास्ता साफ किया. यह राजनीतिक भूचाल था. टीएमसी+ 214 सीटों से गिरकर 80 पर सिमट गई. ममता बनर्जी खुद अपनी सीट हार गईं. 15 साल का शासन एक झटके में खत्म हो गयाइस हार के पीछे कई कारक थे.लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद जनता में बदलाव की इच्छा स्पष्ट दिखी. स्कूल भर्ती जैसे मुद्दों ने सरकार की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया.युवाओं और शहरी मतदाताओं ने नौकरी और विकास को प्राथमिकता दीममता का सबसे मजबूत वोट बैंक कई हिस्सों में बंट गया.वेलफेयर पॉलिटिक्स की जगह रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दे भारी पड़े.चुनाव में करारी हार के बावजूद ममता ने न हार मानी और न ही पद छोड़ा. हार के बाद ममता बनर्जी ने न सिर्फ इस्तीफा देने से इनकार किया, बल्कि चुनाव परिणामों को ही चुनौती दी. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव में अनियमितताएं हुईं और 100 से ज्यादा सीटें छीन ली गईं. उन्होंने चुनाव आयोग पर निष्पक्ष भूमिका नहीं निभाने का आरोप भी मढ़ा. यह एक राजनीतिक संकेत भी है. ममता लड़ाई छोड़ने के मूड में तो कतई नहीं हैं.यही वह बिंदु है जहां ममता की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखता है.अब जब ममता बंगाल में मुख्यमंत्री नहीं हैं तो वो खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश कर रही हैं. सत्ता में रहते हुए उन्होंने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से दूरी बनाए रखी. पर अब परिस्थितियां ममता के विपरीत हैं. बीजेपी की बढ़ी हुई ताकत ने ममता के तृणमूल को कमजोर कर दिया है. बंगाल में हार ने ममता की अकेले चलने की रणनीति को झटका दिया है. कांग्रेस शून्य से दो पर तो वाम दल एक से दो पर आ गए हैं. यानी बंगाल में कांग्रेस और अन्य दल फिर से अपनी जगह बना रहे हैं. लिहाजा अब ममता के सामने विकल्प साफ है. विकल्प है कि अकेले रहकर और कमजोर हो जाएं, या गठबंधन में जाकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख जमाएं.इंडिया गठबंधन ममता के लिए एक अवसर भी है और जोखिम भी. अवसर इसलिए कि यह राष्ट्रीय राजनीति में वापसी का मंच है. बीजेपी के खिलाफ संयुक्त रणनीति भी है और इससे संसदीय चुनावों में बेहतर प्रदर्शन की संभावना रहेगी. चुनौती इसलिए कि कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे, नेतृत्व की लड़ाई और क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय की खींचतान चलती रहेगी.

ममता और कांग्रेस के रिश्ते कभी स्थायी नहीं रहे हैं. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का शून्य से दो सीटों पर आना ममता के लिए सबसे बड़ा खतरा है. अगर आगामी चुनाव में इंडिया गठबंधन के साथ बात बनी और कांग्रेस के साथ ममता ने मैदान में उतरने की सोची तो सीट शेयरिंग सबसे बड़ा विवाद होगा. यानी, गठबंधन बनाना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं. बंगाल में बीजेपी अचानक उभर कर सत्ता तक नहीं पहुंची है. 2011 में बीजेपी+ की सीटें 77 थीं पर केवल पांच साल के बाद ही इनकी संख्या 130 बढ़कर 207 सीटों पर पहुंच गई. सीटों की संख्या में यह इजाफा बताता है कि बीजेपी ने संगठन और वोट बैंक दोनों पर काम किया है. टीएमसी की कमजोरियों को न केवल पकड़ने में कामयाब हुई बल्कि उसे सही तरीके से भुनाया भी. इससे एक बात तो स्पष्ट है कि मतदाताओं की प्राथमिकताएं बदल गई हैं और ऐसे में ममता के लिए बीजेपी से अकेले लड़ना पहले जितना आसान नहीं है.यह सवाल बेहद अहम है. इंडिया गठबंधन में पहले ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद की संभावित दावेदार मानी जाती थीं. लेकिन बंगाल में न केवल पार्टी की हार बल्कि खुद के हारने से भी उनकी साख पर बड़ा आघात लगा है. ऐसे में उन्हें इंडिया गठबंधन में अपनी जगह तय करनी होगी. बहुत संभव है कि ममता किंग से किंगमेकर की भूमिका में आ जाएं. यहीं पर उनकी राजनीति और रणनीति दोनों में बड़ा बदलाव होगा.अब तक ममता राज्य की राजनीति में पूरी तरह मगन थीं, पर अब इंडिया गठबंधन की ओर इशारा करके उन्होंने अपनी रणनीति को एक तरह से सबसे सामने रख ही दिया है. तो ममता की आगे की रणनीति तीन स्तर पर तय होगी. पहला, राज्य स्तर की राजनीति पर. यहां उनके सामने चुनौती होगी कि वो संगठन को फिर से खड़ा करें और टूटे, रुठे वोट बैंक को फिर से जोड़ें.दूसरा, राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर. यहां उन्हें इंडिया गठबंधन में सक्रिय भूमिका निभानी होगी ताकि संसद में आक्रामक विपक्ष दिखे.तीसरा, लेकिन सबसे अहम छवि के स्तर पर. उन्होंने पीड़ित नेता या आम जनों के लिए संघर्ष करती नेता वाली नैरेटिव तो सेट करना चाहा है, फिलहाल वो इसमें कितनी कामयाब होती हैं यह तो उनकी अगली चाल से ही समझ में आएगा. पर चुनावी हार को ममता अपनी राजनीतिक पूंजी में बदलने की कला में माहिर हैं.इतिहास गवाह है कि ममता बनर्जी राजनीति में कभी कांग्रेस के साथ दिखती हैं तो कभी उसके खिलाफ और तीसरे मोर्चे के गठन की कोशिश में जुटी दिखती हैं. लिहाजा यह कहना जल्दबाजी होगी कि इंडिया गठबंधन के साथ भी उनका जुड़ाव स्थायी तौर पर होगा है फौरी. इस वक्त भले ही यह जुड़ाव मजबूरी दिख रहा हो, पर जैसे ही दीदी स्थिर होंगी और कमबैक करती दिखेंगी वो रीसेट बटन दबाने को भी तैयार बैठी होंगी.साथ ही इंडिया गठबंधन वाला दांव कितना सफल होगा यह इसकी एकजुटता पर निर्भर है. ऐसे में यह भी देखना होगा कि क्या बंगाल की जनता राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें फिर मौका देने को तैयार होती है या नहीं. बंगाल की हार ने एक बात तो साफ कर दी है कि अब ममता बनर्जी की राजनीति पहले जैसी नहीं रहेगी. और होगा क्या, यह भविष्य के गर्त में छिपा है.
