कई राज्यों में हार के बाद इंडिया गठबंधन हुआ एक्टिव,यूपी चुनाव के लिए विपक्ष दिखाएगी एकजुटता
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन की हार के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ी है कि इंडिया गठबंधन का क्या होगा. अभी तक संसद में इंडिया गठबंधन के घटक दलों के रूप में समाजवादी पार्टी और डीएमके हमेशा से कांग्रेस के पीछे खड़ी रही. जबकि तृणमूल कांग्रेस का स्टैंड मुद्दों के आधार पर बदलता रहता था. वहीं अभी हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस ने दो राज्यों में अपने ही इंडिया गठबंधन के साथियों के खिलाफ चुनाव लड़ा. केरल में वह वाममोर्चा को हरा कर सत्ता में आई, जबकि बंगाल में वह तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ी और 292 सीटों पर उम्मीदवार उतारे.राहुल गांधी ने अपने चुनावी प्रचार में ममता बनर्जी की सरकार पर तीखे प्रहार किए. यहां तक तो कोई समस्या नहीं है, क्योंकि राज्यों में राजनीतिक दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, मगर केंद्र में बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो जाते हैं. मगर अब इंडिया गठबंधन में दिक्कत ये है कि कांग्रेस तमिलनाडु में डीएमके का साथ छोड़ कर एक्टर विजय के साथ सरकार में शामिल होने जा रही है. जबकि डीएमके के साथ मिलकर उन्होंने अभी चुनाव लड़ा है. वैसे लोग इसे कांग्रेस की मौक़ापरस्त राजनीति भी कह सकते हैं, मगर यह राजनीति है. यदि मौका चूक गए तो चूकते ही रहेंगे और इतिहास गवाह है कांग्रेस ने ऐसे कई मौके चूके हैं।अगर कांग्रेस एक्टर विजय के साथ सरकार में जाती है तो संसद में उसे लोकसभा में डीएमके के 22 और राज्यसभा के 8 सांसदों का समर्थन नहीं मिल पाएगा. दरअसल डीएमके के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस में चुनाव से पहले भी दो राय थी. कांग्रेस का एक धड़ा डीएमके के साथ चुनाव में जाने के पक्ष में नहीं था, खासकर तमिलनाडु के कांग्रेसी. मगर अंत में राहुल गांधी को मानना पड़ा और कांग्रेस डीएमके का गठबंधन हुआ. अब देखना है कि तमिलनाडु की राजनीति क्या करवट लेती है. कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि कांग्रेस को एक्टर विजय के साथ जाना चाहिए हम अगली लोकसभा में तमिलनाडु की सभी 39 सीटें जीत सकते हैं.दूसरी ओर राहुल गांधी ने तृणमूल कांग्रेस की तरफ नरम हैं और भारतीय जनता पार्टी पर बंगाल में वोट चोरी के साथ साथ सरकार चोरी का आरोप लगा दिया है. वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तो कोलकाता ही पहुंच गए. कुल मिलाकर यहां पर इंडिया गठबंधन पर एकसाथ दिखाई दे रहा है. मगर अगले चुनाव तक क्या होगा यह अभी कहना मुश्किल है.

लेकिन इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा टेस्ट उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव में होना है. यहां देखना होगा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एकसाथ लड़तीं है या अलग-अलग।राहुल और अखिलेश पहले भी एक साथ लड़ चुके हैं. कांग्रेस अकेले भी लड़ चुकी है.अभी लोकसभा में कांग्रेस के 6 सांसद हैं.समाजवादी पार्टी के 37 सांसद मिलाकर कुल 43 सांसद होते हैं, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव दिलचस्प हो सकता है. लेकिन इस सब के लिए इंडिया गठबंधन को 2027 और उसके आगे तक जिंदा रहना पड़ेगा।बंगाल का चुनावी नतीजा एक राजनीतिक युग के अंत और नए समीकरणों की शुरुआत का संकेत बन गया. जिस ममता बनर्जी 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को खत्म करने के लिए ‘परिवर्तन’ का नारा दिया था, 2026 में वो खुद उसी बदलाव की चपेट में आ गईं. 15 साल की सत्ता के बाद उनकी पार्टी का सत्ता से बाहर होना और खुद उनका चुनाव हार जाना इस बात का संकेत है कि बंगाल की राजनीति एक बहुत बड़े परिवर्तन से गुजर रही है. लेकिन असली कहानी ममता की हार से ज्यादा उस पलटवार की है जो अब ममता बनर्जी की राजनीति में दिख रहा है और उसका केंद्र है इंडिया गठबंधन.चुनाव में करारी हार के बावजूद ममता ने न हार मानी और न ही पद छोड़ा. हार के बाद ममता बनर्जी ने न सिर्फ इस्तीफा देने से इनकार किया, बल्कि चुनाव परिणामों को ही चुनौती दी. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव में अनियमितताएं हुईं और 100 से ज्यादा सीटें छीन ली गईं. उन्होंने चुनाव आयोग पर निष्पक्ष भूमिका नहीं निभाने का आरोप भी मढ़ा. यह एक राजनीतिक संकेत भी है. ममता लड़ाई छोड़ने के मूड में तो कतई नहीं हैं.अब जब ममता बंगाल में मुख्यमंत्री नहीं हैं तो वो खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश कर रही हैं. सत्ता में रहते हुए उन्होंने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से दूरी बनाए रखी. पर अब परिस्थितियां ममता के विपरीत हैं. बीजेपी की बढ़ी हुई ताकत ने ममता के तृणमूल को कमजोर कर दिया है. बंगाल में हार ने ममता की अकेले चलने की रणनीति को झटका दिया है. कांग्रेस शून्य से दो पर तो वाम दल एक से दो पर आ गए हैं. यानी बंगाल में कांग्रेस और अन्य दल फिर से अपनी जगह बना रहे हैं. लिहाजा अब ममता के सामने विकल्प साफ है. विकल्प है कि अकेले रहकर और कमजोर हो जाएं, या गठबंधन में जाकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख जमाएं।
