बिहार पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा अपडेट,परिसीमन के बाद आरक्षण और जातीय समीकरण में आएगा बदलाव?
बिहार में पंचायत चुनाव को लेकर पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का अहम बयान सामने आया है. दीपक प्रकाश ने स्पष्ट कहा है कि परिसीमन के बाद ही पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी. उन्होंने कहा कि पंचायतों के परिसीमन में 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाएगा. बिहार राज्य निर्वाचन आयोग तो 2026 के पंचायत आम चुनाव के लिए आरक्षण निर्धारण में 2011 की जनसंख्या को आधार बनाकर प्रपत्र-1 भी प्रकाशित कर चुका है.दीपक प्रकाश ने कहा पंचायत चुनाव से पहले वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर पंचायतों का परिसीमन कराया जाएगा. इसका साफ अर्थ है कि पंचायत चुनाव का बिगुल बजने से पहले गांवों की सियासत का नक्शा बदल सकता है. पंचायतों की सीमाएं तो बदलेंगी. इसके साथ ही उम्मीदवार अपना चुनावी क्षेत्र बदल सकते हैं. इसके चुनाव लड़ने की बाट जोह रहे कई उम्मीदवारों को आरक्षण का रोस्टर तैयार होने के बाद झटका भी लग सकता है.बिहार सरकार की तरफ से इस बार परिसीमन में करीब 7 हजार की आबादी के आसपास एक पंचायत बनाने का फॉर्मूला अपनाया जा सकता है. अगर किसी पंचायत में तय सीमा से काफी ज्यादा आबादी या मतदाता हैं, तो परिसीमन के दौरान उसका हिस्सा अलग हो सकता है. वहीं कम आबादी वाली पंचायतों में आसपास के क्षेत्रों को जोड़कर नया समीकरण बनाया जा सकता है. 7 हजार का आंकड़ा अंतिम तौर पर किस आधार पर लागू होगा, यह आधिकारिक परिसीमन आदेश और इससे संबंधित नोटिफिकेशन से ही तय होगा.2026 के पंचायत चुनाव के परिसीमन को लेकर 2011 की जनगणना के आंकड़े बहुत अहम हो गए हैं.दरअसल, देश में 2011 के बाद जनगणना के कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं है. ऐसे में इसी जनगणना के आंकड़ों का परिसीमन के लिए इस्तेमाल करना होगा.

बिहार राज्य निर्वाचन आयोग ने 2026 के पंचायत चुनाव के लिए फॉर्म-1 में 2011 की जनगणना के आधार पर अलग-अलग पदों के लिए जनसंख्या का ब्योरा जारी किया है. इसके बाद लोगों को इस सूची पर आपत्ति या सुझाव देने का मौका भी दिया जाएगा.पंचायत की सीमाएं बदलने से मुखिया, सरपंच और वार्ड सदस्य सीटों के स्वरूप में जरूर बदलाव आ सकता है.मतदाता सूची और मतदान केंद्रों में भी तब्दीली आ सकती है. इसके अलावा आरक्षण का निर्धारण भी नए परिसीमन के आधार पर किया जा सकता है. ये सारी स्थितियां पंचायत चुनावों में कई उम्मीदवारों के लिए समीकरण बदल सकती हैं. यानी एक पंचायत का कुछ हिस्सा दूसरी पंचायत में चला गया तो वहां के मतदाताओं का राजनीतिक समीकरण भी बदल जाएगा.नई ग्राम पंचायत बनाई जा सकती है.दो पंचायतों का विलय किया जा सकता है.किसी पंचायत का क्षेत्र बढ़ाया या घटाया जा सकता है.वार्डों की संख्या और सीमाएं बदली जा सकती हैं.आरक्षित और अनारक्षित सीटों में बदलाव हो सकता है.2026 के पंचायत चुनाव में आरक्षण का रोटेशन काफी अहम होने वाला है. जिन सीटों पर पिछले चुनाव में कोई खास वर्ग आरक्षित था, जरूरी नहीं कि इस बार भी वही सीट उसी वर्ग के लिए आरक्षित रहे. मसलन, जो क्षेत्र पहले अनारक्षित वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित था, इस बार वह अनुसूचित जाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग या अनारक्षित अन्य वर्ग के लिए जा सकता है.इसी तरह जो क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था, वह इस बार अत्यंत पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग की महिला या अनारक्षित वर्ग के लिए हो सकता है . जो क्षेत्र पहले अनारक्षित अन्य यानी सामान्य वर्ग के लिए था, वह इस बार अनुसूचित जाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग की महिला या सामान्य वर्ग के अन्य उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हो सकता है.इसका साफ अर्थ है कि पिछली बार जिस सीट को देखकर उम्मीदवार ने राजनीतिक तैयारी की थी, इस बार उसी सीट का आरक्षण बदल सकता है।यही वजह है कि आरक्षण की नई सूची आने के बाद कई पंचायतों में पुराने दावेदारों को अपना चुनावी क्षेत्र और रणनीति बदलनी पड़ सकती है.परिसीमन के बाद बदले आरक्षण का असर केवल प्रधान के पद तक सीमित नहीं रहेगा. बिहार के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में वार्ड सदस्य, पंच, मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, पंचायत समिति प्रमुख, जिला परिषद सदस्य और जिला परिषद अध्यक्ष जैसे चुनावों पर भी इसका असर पड़ सकता है.बिहार पंचायत चुनाव 2026 में गांव की राजनीति का गणित इस बार काफी बदल सकता है. 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन, करीब 7 हजार के फॉर्मूले की चर्चा और आरक्षण के रोटेशन से कई पंचायतों में पुराने समीकरण उलट सकते हैं. बिहार में इसी साल पंचायत चुनाव होना था. लेकिन अब परिसीमन का आदेश आ गया है.फिलहाल परिसीमन की प्रक्रिया में तकरीबन 6 से 7 महीने का समय लगेगा. इसके बाद पिछड़े वर्गों के आरक्षण को लेकर एक डेडिकेटेड कमीशन अपनी रिपोर्ट देगा. इस पूरी प्रक्रिया में करीब दो से तीन महीने का समय लगेगा. यानी बिहार में पंचायत चुनाव, तकरीबन जून-जुलाई के महीने में ही होगा. बता दें कि बिहार में पिछले 36 साल से पंचायतों का परिसीमन नहीं हुआ है. ऐसे में सरकार का कहना है कि आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व को संतुलित करना जरूरी है.
