बिहार में यूसीसी की चर्चा अचानक हुई तेज,जानिए कब से हो सकता है लागू?
बिहार इन दोनों कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है. बढ़ते जनसंख्या घनत्व और घुसपैठ ने प्रदेश की डेमोग्राफी को बदल कर रख दिया है. राज्य के संसाधनों पर घुसपैठियों के कब्जे से पलायन भी बढा है. अब जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं, ऐसे में सत्ता और सत्ता की ताकत पहली बार पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के हाथों में होगी. सत्ता हस्तांतरण की आहट के बीच बीजेपी के कई नेता समान नागरिक संहिता की मांग कर रहे हैं. हालांकि जेडीयू की तरफ से इस पर हाल-फिलहाल में कोई प्रतिक्रिया नहीं है, जबकि आरजेडी और कांग्रेस पूरी तरह से यूसीसी के खिलाफ है.असल में नीतीश कुमार के बाद बीजेपी का सीएम होगा, ये तय माना जा रहा है. ऐसे में सत्ता परिवर्तन की आहट के बीच पार्टी नेताओं ने ठहरे हुए पानी में कंकड़ मारने की कोशिश की है. यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपने पुराने वादे को पूरा करने के लिए इस बार खुलकर सियासी दांव खेलने का मन बना लिया है. उत्तराखंड के बाद हाल में ही गुजरात में भी यूसीसी लागू हो गया है. ऐसे में बिहार में भी मांग उठने लगी है.भारतीय जनता पार्टी ‘एक देश, एक संविधान, एक निशान’ के नारों को लेकर आगे बढ़ रही है. शुरुआती दौर से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड पार्टी के एजेंडे में शामिल है. अब यह धीरे-धीरे यह धरातल पर आ रही है. दो राज्यों ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिए हैं. उत्तराखंड राज्य के बाद गुजरात राज्य में भी समान नागरिक संहिता लागू कर दी है.

अब तैयारी बिहार में भी लागू करने की है.साल 1990 से 2014 के बीच बीजेपी के लिए राजनीतिक विस्तार का दौर था. अलग-अलग चुनाव में बीजेपी ने लगातार अपने घोषणापत्र में यूसीसी का समर्थन किया. गठबंधन की मजबूरी की वजह से यूसीसी इस पर ठोस कदम नहीं उठाया जा सका. साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने एक समान नागरिक संहिता बिल लाने की कोशिश की थी. 2019 में केंद्र की सरकार ने तीन तलाक बिल को मंजूरी दे दी. उसके बाद से अबतक बीजेपी शासित दो राज्यों में यूसीसी लागू हो चुका है.पहली बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता मिलने जा रही है. पार्टी नेताओं को लगता है कि अगर उनका मुख्यमंत्री हुआ तो वह एक समान नागरिक संहिता लागू कर सकते हैं. यही वजह है कि गुजरात और उत्तराखंड के बाद बिहार में भी यूसीसी लागू करने की तैयारी की जा रही है. इसे लागू करने की जिम्मेदारी अगले सीएम के कंधों पर होगी.मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी समान नागरिक संहिता के पक्ष में नहीं है. प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा कि संविधान में हमें धार्मिक स्वतंत्रता की आजादी दी है. अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अलावे अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30 के तहत सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों को जीने का अधिकार है. लोग अपनी धार्मिक परंपरा और संस्कृति के हिसाब से जीवन जी सकते हैं. अपनी नाकामी छिपाने के लिए बीजेपी बेवजह यूसीसी के मुद्दे को उछाल रही है।समान नागरिक संहिता को लेकर जनता दल यूनाइटेड ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है. हालांकि सेक्यूलर छवि की वजह से पार्टी यूनिफॉर्म सिविल कोड को विवादास्पद मानती है. इस सवाल को लेकर ईटीवी भारत संवाददाता ने जब जेडीयू के शीर्ष नेताओं से संपर्क साधा तो उन्होंने कुछ भी बोलने से इनकार किया. पार्टी के एक सीनियर नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा, ‘इस मुद्दे पर अभी कुछ भी बोलना ठीक नहीं है, क्योंकि पार्टी के स्तर पर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है.’एलजेपीआर और आरएलएम भी सरकार के साथ नजर आ रही है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रवक्ता विनीत सिंह कहते हैं, ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड जरूरी है. हमलोग इसके पक्ष में हैं लेकिन इसे लागू करने से पहले संबंधित पक्ष की चिंता को भी ध्यान में रखना चाहिए. वहीं, राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रवक्ता सुशील कुमार कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार चल रही है और अगर फैसला समान नागरिक संहिता लागू करने का है तो हम उसके साथ खड़े होंगे. हमारे नेता उपेंद्र कुशवाहा भी एक समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं।
