अनंत सिंह की विधायकी पर संकट!क्या जाएगी MLA की कुर्सी?
बिहार में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने मोकामा से विधायक अनंत सिंह को 6 साल के लिए पार्टी से निकाल दिया है. पार्टी ने उनकी प्राथमिक सदस्यता भी तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी. साथ ही, बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की अनुशंसा की है. जेडीयू का आरोप है कि अनंत सिंह ने पार्टी के निर्देशों का पालन नहीं किया, वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया और विधान परिषद चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार के बजाय जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में प्रचार किया. जेडीयू के उम्मीदवार नीरज कुमार पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे.अब सवाल है कि क्या पार्टी से निकाले जाने के बाद अनंत सिंह की विधायकी भी खत्म हो जाएगी?

इसका जवाब समझने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका को जानना जरूरी है.संविधान की दसवीं अनुसूची को आम तौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है. इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया था. इसका उद्देश्य विधायकों और सांसदों के दल बदलने पर रोक लगाना है. इसके तहत कुछ परिस्थितियों में जनप्रतिनिधि को सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराया जा सकता है.पैराग्राफ 2(1)(a): अगर कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है.पैराग्राफ 2(1)(b): अगर विधायक सदन में अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट देता है या वोटिंग से अनुपस्थित रहता है और पार्टी 15 दिनों के भीतर इसे माफ नहीं करती, तो अयोग्यता हो सकती है.पैराग्राफ 6: विधायक की अयोग्यता पर फैसला विधानसभा अध्यक्ष करते हैं.दूसरे दल के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना और विधानसभा के भीतर पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट देना अलग-अलग स्थितियां हैं. दसवीं अनुसूची में दूसरे दल के उम्मीदवार के लिए प्रचार करने को अपने आप अयोग्यता का आधार नहीं बताया गया है. इसलिए अध्यक्ष को देखना होगा कि शिकायत में दिए गए तथ्य किस संवैधानिक प्रावधान के तहत आते हैं.इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला है. 1996 में जी. विश्वनाथन बनाम तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पार्टी से निकाले जाने के बाद भी विधायक को दसवीं अनुसूची के तहत उसी पार्टी का सदस्य माना जा सकता है, जिसने उसे चुनाव लड़ाया था. यानी पार्टी से निष्कासन अपने आप विधायक को दल-बदल कानून से बाहर नहीं करता. इसलिए अनंत सिंह के मामले में सिर्फ यह तथ्य पर्याप्त नहीं है कि जेडीयू ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया है. उनके आचरण और शिकायत में दिए गए आधारों की जांच जरूरी होगी.सुप्रीम कोर्ट ने रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994) मामले में कहा था कि पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने का अर्थ केवल इस्तीफा देना नहीं है. विधायक के आचरण स भी ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है, लेकिन उसके समर्थन में ठोस और भरोसेमंद सबूत जरूरी हैं.संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 6 के मुताबिक, दल-बदल के आधार पर किसी विधायक की अयोग्यता का सवाल विधानसभा अध्यक्ष तय करते हैं. इस मामले में बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार के सामने जेडीयू की अनुशंसा आने के बाद कानूनी प्रक्रिया का सवाल उठेगा. अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष को करना होगा. उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा भी हो सकती है. अब अहम सवाल यह है कि अध्यक्ष के सामने क्या याचिका और सबूत रखे जाते हैं और उन पर कानूनी जांच का क्या नतीजा निकलता है.
