राम मनोहर लोहिया की राजनीति का अध्याय,आजकल के नेताओं के लिए बड़ी सीख
डॉ. राम मनोहर लोहिया को गुजरे 59 साल हो गए. भारतीय राजनीति में इतने बरसों में बहुत कुछ बदला. सत्ता के चेहरे बदले. दल बदले. नारों और दावों के अर्थ बदले. लेकिन कुछ सवाल अब भी वहीं खड़े हैं. सत्ता से सवाल पूछने वाले कितने हैं? अपने विचारों को भी कठघरे में खड़ा करने का साहस कितनों में है? लोहिया की राजनीति इन्हीं सवालों से बनी थी. वे गांधीवादी थे. लेकिन गांधी के भक्त नहीं. समाजवादी थे. लेकिन मार्क्सवाद की सीमाओं पर भी सवाल उठाते थे. राष्ट्रवादी थे. लेकिन विश्व सरकार की कल्पना करते थे.उनके लिए कोई विचार अंतिम नहीं था. कोई नेता आलोचना से ऊपर नहीं था. शायद इसीलिए लोहिया को गुजरे हुए इतने साल बाद भी उनकी विरासत से ज्यादा उनके सवाल परेशान करते हैं.लोहिया की राजनीतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रमाण जवाहरलाल नेहरू को दी गई चुनौती है. वह दौर था जब नेहरू लोकप्रियता के शिखर पर थे. 1962 के फूलपुर चुनाव में उनके मुकाबले उतरे लोहिया ने कहा था, मुझे मालूम है कि मैं पहाड़ के सामने हूं. पार न कर पाऊं. पर दरार तो डाल ही दूंगा. यह किसी निजी दुश्मनी की लड़ाई नहीं थी.लोहिया को लगता था कि कांग्रेस आजादी की लड़ाई के उद्देश्यों से भटक गई है. सत्ता का विकल्प खड़ा करना जरूरी है. इसी सोच से गैर-कांग्रेसवाद की जमीन तैयार हुई. 1963 के फर्रुखाबाद उपचुनाव में जनसंघ ने उनका साथ दिया.

जौनपुर में उन्होंने जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय के लिए सभाएं कीं. 1967 तक नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. इन सरकारों में कम्युनिस्ट और जनसंघ भी साथ आए. लोहिया के लिए सवाल था कि सत्ता का एकाधिकार कैसे टूटे. बाद के वर्षों में गैर-कांग्रेसवाद को लेकर अनेक बहसें हुईं. लेकिन कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने की इस रणनीति का शुरुआती अध्याय लोहिया के नाम दर्ज है.लोहिया को केवल कांग्रेस विरोध तक सीमित कर देना उनके विचारों का दायरा छोटा करना होगा. उनकी सप्तक्रांति में समाज बदलने की व्यापक परियोजना थी. नर-नारी की समानता, रंगभेद से पैदा होने वाली मानसिक और आर्थिक गुलामी का अंत, जाति व्यवस्था का विनाश, पिछड़ों को अवसर, विदेशी गुलामी का विरोध, आर्थिक विषमता से संघर्ष और निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ये सभी उनके संघर्ष के मोर्चे थे. जाति उनके लिए केवल सामाजिक बुराई नहीं थी. वह अवसर, प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी का सवाल भी थी. इसी तरह आर्थिक समानता केवल भाषणों का विषय नहीं थी. दाम बांधो आंदोलन के जरिए उन्होंने महंगाई और आम आदमी की क्रयशक्ति को राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की.वह सामाजिक न्याय, आर्थिक बराबरी और राजनीतिक लोकतंत्र को अलग-अलग खानों में नहीं रखते थे. उनकी राजनीति का मैदान संसद भी था और सड़क भी. 22 अगस्त 1963 को नेहरू सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव पर बहस में उन्होंने कहा था, जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं. सत्ता को चुनौती देने और जनता की सक्रियता पर भरोसा करने वाली उनकी राजनीति का यह एक महत्त्वपूर्ण सूत्र था।भाषा के प्रश्न पर भी लोहिया का रुख इसी बेचैनी से निकला था. वे अंग्रेजी के वर्चस्व को सत्ता, अवसर और सामाजिक प्रतिष्ठा की असमानता से जोड़कर देखते थे. हिंदी के पक्ष में आंदोलन चलाते हुए उन्होंने अंग्रेजी हटाने की दूर की समय-सीमा तय करने की राजनीति पर सवाल उठाया. उनका तर्क था कि 1950 में अंग्रेजी हटाने के लिए 1965 की समय-सीमा तय करना ही भूल थी.हिंदी के लिए कसम खाई जाती थी, लेकिन अंग्रेजी चलाते रहने का संकल्प बना रहता था. उन्होंने इस विरोधाभास को तीखे शब्दों में रखा. लेकिन लोहिया ऐसी हिंदी भी नहीं चाहते थे जो ज्ञान और विचार की भाषा बनने में असमर्थ हो. हिंदी सटीक हो. रंगीन हो. पारिभाषिक हो. ठेठ और रोचक हो. उसमें सभी तरह की बुद्धियाँ खिल सकें. किताबों की कमी का बहाना उन्हें इसलिए स्वीकार नहीं था कि भाषा को सक्षम बनाने के लिए इच्छाशक्ति जरूरी थी. आज भाषा की बहस केवल हिंदी बनाम अंग्रेजी की नहीं है. सवाल यह भी है कि ज्ञान, रोजगार और सत्ता तक पहुंच की भाषा किसकी है.लोहिया की स्त्री-दृष्टि अपने समय की स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती थी. भारतीय संस्कृति में सावित्री का आदर्श प्रतिष्ठित रहा है. लोहिया ने उसके बरक्स द्रौपदी को रखा. वे द्रौपदी में ज्ञान, हाजिरजवाबी, समझ और साहस देखते थे. उन्हें इस बात पर आपत्ति थी कि द्रौपदी के पांच पतियों की चर्चा तो होती है, लेकिन उसके व्यक्तित्व की विशिष्टता पर ध्यान नहीं जाता. उन्होंने इस दोहरे मापदंड को भारतीय समाज की मानसिकता से जोड़ा.सावित्री के पतिव्रत की कथा को गौरव मिलता है, लेकिन स्त्री की स्वतंत्र बुद्धि और सवाल करने की क्षमता को उतना सम्मान क्यों नहीं? महाभारत के शांति पर्व का प्रसंग याद करते हुए उन्होंने द्रौपदी की हंसी को भी अर्थ दिया. भीष्म जीवन के अंतिम क्षणों में राजनीति की शिक्षा दे रहे थे. द्रौपदी हंसी. वजह यह थी कि जीवन भर अपने ही उपदेशों के विपरीत आचरण करने वाले भीष्म अब नीति समझा रहे थे. लोहिया के लिए यह केवल पौराणिक प्रसंग नहीं था. यह सत्ता, नैतिकता और आचरण के बीच के अंतर को पहचानने का अवसर था.लोहिया भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखते थे. लेकिन आस्था का अर्थ रूढ़ियों के आगे समर्पण नहीं था. वे कहते थे, भारत माता हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो और राम का कर्म और वचन दो. वे प्राचीन भारतीय आदर्शों को आधुनिक समाजवाद, स्वतंत्रता और अहिंसा के साथ जोड़कर देखते थे. रामायण मेले की परिकल्पना करते हुए उनके मन में हिंदुओं को राजनीतिक रूप से लामबंद करने की इच्छा नहीं थी।
