सऊदी अरब,तुर्की और पाकिस्तान आया एक साथ,तीनों ने मिलकर कर ली बड़ी समझौता

 सऊदी अरब,तुर्की और पाकिस्तान आया एक साथ,तीनों ने मिलकर कर ली बड़ी समझौता
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पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मिलकर एक समझौता किया है. यह डिफेंस समझौता मक्का एग्रीमेंट के नाम से किया गया है. इसके तहत तीनों देशों का कहना है कि किसी एक पर हमला सभी पर माना जाएगा. ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भारत का सीधे तौर पर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान इससे मजबूत होगा. क्या उसके पास भारत से किसी जंग के दौरान दो और साथी होंगे, जो सक्रिय तौर पर उसकी मदद करेंगे? क्या यह भारत के लिए चिंता की बात है. इस संबंध में हमने जेएनयू के स्पेशल सेंटर फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर अमित सिंह से बात की. वह कहते हैं कि इस डिफेंस पैक्ट का भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान हमारा महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है, लेकिन कभी उसने भारत से जंग के मौके पर साथ नहीं दिया. वह कहते हैं, ‘सऊदी अरब ने पहले भी कहा था कि पाकिस्तान हमारा रणनीतिक सहयोगी है. लेकिन उसके तुरंत बाद ही ऑपरेशन सिंदूर हुआ तो सऊदी अरब ने कुछ भी नहीं किया. उसका कोई बयान भी नहीं आया था.’

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हालांकि तुर्की को वह थोड़ा अलग मानते हैं, लेकिन उसे इस स्तर पर भी नहीं देखते, जो चिंता की बात हो. प्रोफेसर अमित सिंह कहते हैं, ‘तुर्की और पाकिस्तान के पहले से ही अच्छे संबंध हैं. अब इसमें और इजाफा हो गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे लगता है कि भारत उसके पड़ोसी देशों के ज्यादा करीब है और डिफेंस डील की है. लेकिन भारत के लिए यह चिंता की बात नहीं है क्योंकि डिफेंस की क्षमता के मामले में भारत तीनों से ही कहीं आगे है.’प्रोफेसर अमित सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा कि तब तुर्की ने पाकिस्तान को ड्रोन दिए थे और कुछ सैनिकों को भी भेजा था. लेकिन सऊदी अरब तो खुद ही भारत से ब्रह्मोस लेना चाहता है. पाकिस्तान का भारत से कोई मसला होता है तो उसमें सऊदी अरब हमेशा समानांतर दूरी ही रखता आया है.उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान की स्थिति कमजोर है. उसके पास तुर्की और सऊदी अरब को देने के लिए कुछ नहीं है. वह तो इन देशों से कुछ लेना ही चाहता है. इस गठजोड़ को भी वह परमाणु संपन्न देश होने के नाम पर ही कर पाया है. पाकिस्तान ने हमेशा खुद को न्यूक्लियर बम के तौर पर प्रोजेक्ट किया है. इसके अतिरिक्त उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है.’ फिर क्या ईरान के लिए यह गठजोड़ चिंता की बात है. उनका कहना है कि ऐसा भी नहीं है. ईरान पहले से ही इन देशों से संघर्ष में रहा है और अकेले ही मुकाबला करता रहा है.उन्होंने कहा कि ईरान के लिए यह ज्यादा चिंता की बात नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि पहले भी इन देशों ने कभी उसका साथ नहीं दिया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की पहले से ही अमेरिका के साथ खड़े हैं. ईरान से उनका विरोध ही रहा है. ऐसे में यदि कागज पर इनका गठजोड़ भी हो गया तो जमीन पर कोई अलग चीज नहीं हुई है. वहीं अल जजीरा की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पैक्ट के मायने मध्य पूर्व के लिए ज्यादा हैं. ईरान के अलावा यहां अन्य सुन्नी देश ही हैं और उनमें भी विभाजन रहा है. ऐसे में इस पैक्ट के माध्यम से एक सतही ही सही, लेकिन एकता की कोशिश होगी. रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में मिस्र, कतर, सीरिया और यूएई को भी पैक्ट में शामिल किया जा सकता है.इस समझौते का भारत पर क्या असर होगा. इसका विश्लेषण किया जा रहा है. इस बीच ईरान ने ही सऊदी अरब पर तंज कस दिया है.ईरान के सांसद और राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति मामलों से जुड़े एक सदस्य इब्राहिम रेजाई ने सऊदी अरब से कहा कि कागजी समझौता आपको बचा नहीं सकेगा. ईरान ने कहा कि आपने सालों तक अमेरिका का साथ दिया है. इसके बाद भी आपकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी है. ऐसे में तुर्की और पाकिस्तान से रक्षा समझौता करने से आप बच नहीं सकेंगे. उन्होंने कहा कि यदि सऊदी अरब अपनी नीतियों में सुधार कर ले तो उसे सुरक्षा के लिए दूसरों से भीख नहीं मांगनी पड़ेगी. ईरान ने यह तीखा तंज समझौते के कुछ देर ही बाद कसा है. आज ही सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर साइन किए हैं.यह समझौता ऐसे वक्त में हुआ है, जब ईरान और अमेरिका के बीच जंग चल रही है. इस बीच ईरान ने कई बार सऊदी अरब को भी टारगेट किया है. यह एग्रीमेंट इसलिए भी अहम है क्योंकि तुर्की और सऊदी अरब को इस्लाम के अलग-अलग ध्रुवों के तौर पर देखा जाता रहा है. ऐसे में यदि दोनों देश साथ आए हैं तो यह अहम है. इस समझौते का प्रतीकात्मक महत्व भी है. यह समझौता इस्लाम में पवित्र माने जाने वाले मक्का शहर में हुआ है, जहां पैगंबर मोहम्मद का जन्म हुआ था. इस एग्रीमेंट की नाटो से इसलिए तुलना की जा रही है क्योंकि नाटो देशों के बीच सुरक्षा समझौता है. इसमें यदि किसी एक मुल्क पर हमला होता है तो सभी मिलकर लड़ते हैं और जंग में उतर जाते हैं.यूक्रेन के भी इसी नाटो में शामिल होने की आशंका थी. इसी डर के कारण रूस ने उस पर हमला कर दिया था. यही नहीं जंग खत्म करने की मुख्य शर्तों में भी यही है कि नाटो में शामिल न होने का भरोसा दिया जाए. ऐसे में उसी तर्ज पर तीन मुसलमान देशों की एकता महत्वपूर्ण है. बता दें पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र परमाणु संपन्न मुस्लिम राष्ट्र है. पाकिस्तान आर्थिक संकट से जूझ रहा है और वह इस्लाम एवं सुरक्षा का नैरेटिव फैलाकर अमीर मुसलमान देशों से सहायता लेना चाहता है. माना जाता है कि इसी कारण से वह सऊदी अरब के नजदीक है. इस एग्रीमेंट पर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन और पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने साइन किया।

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