कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल,जस्टिस भुइयां ने बिना कारण नियुक्तियों और पारदर्शिता पर जताई चिंता

 कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल,जस्टिस भुइयां ने बिना कारण नियुक्तियों और पारदर्शिता पर जताई चिंता
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न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति से जुड़े कॉलेजियम सिस्टम पर एक बार फिर बहस हो रही है. 30 जुलाई को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी. इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कॉलेजियम सिस्टम का हवाला देते हुए कहा कि कॉलेजियम बनाने वाले कुछ जजों ने बाद में माना था कि उनसे गलत फैसला हुआ था. इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी कहा, ‘जैसा आपने कहा कि जज ही जजों का चयन करते हैं, लेकिन अब तो हमें भी यह सोचने की जरूरत पड़ रही है कि क्या आज वास्तव में जज ही जजों का चयन कर रहे हैं?’इसके बाद 1 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कॉलेजियम की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता की कमी और बिना कारण बताए जजों के चयन पर चिंता व्यक्त की.

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कानूनी थिंक टैंक ‘विधि’ (Vidhi Centre for Legal Policy) की ‘ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स’ रिपोर्ट के विमोचन पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कुछ ऐसे मुद्दे उठाए, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर सीधा असर डालते हैं.जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी खामी पैदा कर रही है, जिससे असंवैधानिक या अपमानजनक टिप्पणी करने वाले व्यक्ति भी न्यायपालिका में प्रवेश पा सकते हैं. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पूर्व जज का उदाहरण दिया, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान एक अल्पसंख्यक समुदाय को ‘चींटियों’ के रूप में संदर्भित किया था.जस्टिस भुइयां ने बताया कि कॉलेजियम ने हाल ही में पारदर्शिता से दूरी बना ली है. पिछले तीन कॉलेजियम प्रस्तावों में प्रमोशन की सिफारिशों के पीछे कोई कारण नहीं बताया गया है, जबकि पहले हर सिफारिश के साथ एक स्पष्ट कारण दिया जाता था. इस वजह से न सिर्फ गलत लोगों के चयन का खतरा बढ़ता है, बल्कि जनता उन योग्य उम्मीदवारों की उपलब्धियों से भी अनजान रह जाती है, जिन्हें चुना गया है.अदालती कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग पर बात करते हुए जस्टिस भुइयां ने इसे पिछले एक दशक का सबसे बड़ी पारदर्शिता बताई. उन्होंने 24 जुलाई को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के आदेश का जिक्र किया, जिसका मकसद लाइवस्ट्रीमिंग को रोकना नहीं, बल्कि इसके व्यावसायिक शोषण को रोकना है. उन्होंने चिंता जताई कि संदर्भहीन वीडियो क्लिप्स और सनसनीखेज कैप्शन जजों और वकीलों की छवि खराब कर रहे हैं. 2018 के स्वप्निल त्रिपाठी और 2020 के सुभाष चंद्र अग्रवाल फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि खुली अदालतें जनता का विश्वास बढ़ाती हैं. न्याय की आत्मा पारदर्शिता में ही बसती है.जस्टिस भुइयां के बयान के मुताबिक, जजों के ट्रांसफर और प्रमोशन पर होने वाली चर्चाएं पूरी तरह सीक्रेट रहती हैं. किसी सिफारिश को खारिज करने या टालने के कारणों का पूरा खुलासा शायद ही कभी किया जाता है. जब नियुक्तियों का कोई सार्वजनिक मानक मौजूद नहीं है, तो पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजमी है.जस्टिस भुइयां का मानना है कि कारणों का खुलासा न होना न्यायपालिका के लिए खतरनाक है. नियुक्ति होने और न होने की वजह का खुलासा होना चाहिए. जस्टिस भुइयां के मुताबिक, अल्पसंख्यक समुदाय को ‘चींटियां’ कहने वाले पूर्व जज का उदाहरण यह साबित करता है कि अपारदर्शी सिस्टम से ऐसे लोग भी कुर्सी तक पहुंच जाते हैं, जो संवैधानिक मूल्यों का सम्मान नहीं करते.MoP जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की प्रक्रिया तय करता है, जो 1993 और 1998 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर बना है. MoP के मुताबिक, हाईकोर्ट्स को पद खाली होने से कम से कम 6 महीने पहले सिफारिशें करनी होती हैं. हालांकि, सरकार का कहना है कि इस समय सीमा का शायद ही कभी पालन किया जाता है. 2015 में नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन (NJAC) के रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने MoP को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने को कहा था, लेकिन यह प्रक्रिया अभी भी अधर में है.जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका बेहद सीमित है. केवल उन्हीं व्यक्तियों को हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया जाता है, जिनके नाम की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (SCC) करता है.संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत नियुक्ति में किसी जाति या वर्ग के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. हालांकि, सरकार हाईकोर्ट्स के चीफ जस्टिस से लगातार अनुरोध करती है कि नियुक्ति प्रस्ताव भेजते समय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को उचित विचार दिया जाए ताकि सामाजिक विविधता सुनिश्चित हो सके.सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, जजों की नियुक्ति एक सतत, एकीकृत और सहयोगात्मक प्रक्रिया है, जो न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चलती है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (SCC) की सिफारिशों के बिना कोई नियुक्ति नहीं होती. 31 जुलाई 2026 को संसद में दिए गए एक जवाब के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में हाईकोर्ट्स में कुल 608 जजों की नियुक्ति की गई है.6 फरवरी 2026 को लोकसभा में पेश किए गए डेटा के अनुसार, 2018 से 2 फरवरी 2026 तक कुल 848 जजों की नियुक्ति हुई. इस डेटा में अनुशंसित उम्मीदवारों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, विविधता की स्थिति कुछ इस प्रकार है.33 जज अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से हैं.17 जज अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से हैं.104 जज अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से हैं.46 जज अल्पसंख्यक (Minority) वर्ग से हैं.इस दौरान हाईकोर्ट्स में 130 महिला जजों की नियुक्त हुई.ये आंकड़े दर्शाते हैं कि 848 में से सिर्फ 33 जज SC और 17 जज ST जनजाति से आते हैं. यह न्यायपालिका में सामाजिक विविधता को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार की अपील के बावजूद, अभी भी उच्च न्यायपालिका में समाज के सभी वर्गों का समान और आनुपातिक प्रतिनिधित्व एक चुनौती बना हुआ है.

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