जानें बांकीपुर सीट का ओपिनियन पोल,भाजपा को टक्कर दे गए प्रशांत किशोर!
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है. यह मुकाबला बीजेपी की साख, जनसुराज के भविष्य और प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता की परीक्षा बन चुका है. 30 जुलाई को मतदान हो चुका है और 3 अगस्त को मतगणना होगी. चुनावी मैदान में 25 उम्मीदवार थे और सभी की किस्मत ईवीएम में बंद हो गई है. हालांकि आरजेडी की रेखा गुप्ता भी भी रेस में है लेकिन असली लड़ाई प्रशांत किशोर और नीरज सिन्हा के बीच में ही मानी जा रही है.बांकीपुर उप-चुनाव के एग्जिट पोल में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर को भारी बढ़त का दावा किया गया है लेकिन भारतीय जनता पार्टी को कमतर नहीं आंका जा सकता. ईटीवी भारत से खास बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी ने चुनाव के पांच बड़े सवालों पर विस्तार से अपनी राय रखी. वे भी मानते हैं कि मुकाबला बेहद नजदीकी है. लिहाजा परिणाम चौंकाने वाला भी हो सकता है.बांकीपुर का मुकाबला बेहद कांटे का रहा है. इस चुनाव में जीत-हार का अंतर बहुत बड़ा नहीं होगा और परिणाम 5 हजार से 10 हजार वोटों के बीच तय हो सकता है. उनका कहना है कि भाजपा इस सीट को लंबे समय से अपना मजबूत गढ़ मानती रही है लेकिन इस बार उसे पूरी ताकत झोंकनी पड़ी.

बीजेपी के 40 स्टार प्रचारकों ने चुनाव प्रचार किया. प्रदेश के मंत्री मोहल्ले-मोहल्ले जाकर वोट मांगते नजर आए. उन्होंने कहा कि यह अपने आप में बताता है कि भाजपा ने भी इस चुनाव को आसान नहीं माना. उनका मानना है कि प्रशांत किशोर के मैदान में उतरने से पूरा चुनावी नैरेटिव बदल गया और मुकाबला भाजपा बनाम महागठबंधन की बजाय भाजपा बनाम प्रशांत किशोर बन गया है।प्रशांत किशोर जनता के मुद्दों को पकड़ने, तथ्यों के साथ अपनी बात रखने और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हैं. यदि उन्हें विधानसभा का मंच मिलता है तो बिहार की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा हो सकता है. उनका यह भी मानना है कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक रणनीति और मुद्दों को प्रस्तुत करने की शैली उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी अलग पहचान दिला सकती है.बिहार में नेता प्रतिपक्ष सदन में सत्र के दौरान अनुपस्थित रहते हैं और जनता के मुद्दों को लेकर वह रोल नहीं निभा पा रहे, जो एक नेता प्रतिपक्ष से उम्मीद की जाती है. ऐसा लगता है कि राजनीति से इतर भी उनकी कुछ प्राथमिकताएं हैं. उनकी पार्टी आरजेडी के विधायक ही उनसे नाराज रहते हैं कि वह उनसे मिलने का समय नहीं दे पाते।चुनाव हारने का मतलब जनसुराज का अंत नहीं होगा. उन्होंने कहा कि प्रशांत किशोर पहले भी चुनावी झटके झेल चुके हैं लेकिन उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई. पिछला चुनाव वह बेहद शर्मनाक तरीके से हारे थे लेकिन बावजूद इसके उन्होंने लोगों के साथ जनसंपर्क कर संवाद बनाए रखा.जनसुराज फिलहाल काफी हद तक प्रशांत किशोर के व्यक्तित्व और नेतृत्व पर आधारित राजनीतिक अभियान है. इसलिए यदि वह हारते भी हैं तो संगठन खत्म नहीं होगा, बल्कि संभावना है कि वह पहले की तरह जनसंवाद, यात्रा और जनसंपर्क के जरिए अपने राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाते रहेंगे. जब तक कि वह चुनाव में जीत हासिल ना कर लें.अंतिम फैसला जनता ने ईवीएम में बंद कर दिया है. इसलिए अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि जमीनी स्तर से जो संकेत मिल रहे हैं, उसके अनुसार भाजपा के परंपरागत वोटों में भी कुछ हिस्से का झुकाव जनसुराज की ओर दिखाई दिया है. आरजेडीके कोर वोट एम-वाई में भी बड़ी सें लगाई है.भाजपा ने इस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी पार्टी के वरिष्ठ नेता, मंत्री और नितिन नबीन पर छोड़ रखी थी. उम्मीदवार चयन से लेकर चुनावी रणनीति और प्रचार अभियान तक में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. ऐसे में यदि भाजपा जीतती है या हारती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी उनको जानी चाहिए लेकिन अगर परिणाम उम्मीद के विपरीत आता है तो हार की जिम्मेदारी यहां के सरकार के ऊपर डाली जासकती है. सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.3 लाख 79 हजार से अधिक वोटर वाले बांकीपुर विधानसभा में पिछले चार विधानसभा चुनाव के वोटिंग प्रतिशत के आंकड़े को देखें तो सबसे अधिक 2025 विधानसभा चुनाव में ही वोटिंग हुई. हालांकि वह भी 41% के करीब ही थी. उससे पहले हुए तीन विधानसभा चुनाव में हमेशा वोटिंग प्रतिशत 40% या उससे कम रहा. 2008 में पटना पश्चिम परिसीमन के बाद बांकीपुर सीट बनी और तब से कम वोटिंग के बावजूद भाजपा के नितिन नबीन लगातार चुनाव जीतते रहे और हर बार जीतने का रिकॉर्ड बनाया।
