मॉडल स्कूल खोलकर इतिहास रचने जा रहे सीएम सम्राट,गरीब छात्रों के साथ पढ़ेंगे अधिकारियों के बच्चे
सरकार बिहार की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी कर रही है. सरकार की योजना राज्य के सभी 524 प्रखंडों में आधुनिक सुविधाओं से लैस मॉडल स्कूल स्थापित करने की है. इसे सरकारी स्कूलों को मजबूत करने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकल्प तैयार करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.सरकार की तैयारी ऐसी बताई जा रही है कि मॉडल स्कूल सिर्फ आम लोगों के बच्चों तक सीमित नहीं रहें, बल्कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बच्चे भी इनमें पढ़ना पसंद करें. यदि समाज के सभी वर्गों के बच्चे एक जैसी सुविधाओं वाले स्कूलों में पढ़ेंगे तो शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और गुणवत्ता दोनों बढ़ सकती हैं.मॉडल स्कूल योजना को कॉमन स्कूल सिस्टम की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है. कॉमन स्कूल सिस्टम का मूल विचार यह है कि अमीर, गरीब, अधिकारी, जनप्रतिनिधि और आम नागरिकों के बच्चे समान गुणवत्ता वाले स्कूलों में पढ़ें.

इससे शिक्षा में वर्गीय अंतर कम करने और सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.बिहार सरकार शिक्षा क्षेत्र पर बड़े स्तर पर बजट खर्च कर रही है. वित्तीय वर्ष 2026 27 के लिए सरकार ने शिक्षा क्षेत्र के लिए कुल 68,216 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. इसमें शिक्षा विभाग को 60,204 करोड़ रुपये और उच्च शिक्षा विभाग को 8,012 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.शिक्षा पर भारी बजट खर्च के बावजूद बिहार से छात्रों का दूसरे राज्यों की ओर पलायन लगातार जारी है. बेहतर स्कूल, कोचिंग, कॉलेज और उच्च शिक्षा की तलाश में बड़ी संख्या में छात्र राज्य से बाहर जा रहे हैं. श्रम संसाधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में करीब 57 लाख लोग शिक्षा के लिए बिहार से बाहर गए, जिनमें लगभग पांच लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों में गए.बिहार में निजी स्कूलों की फीस, किताब, यूनिफॉर्म और अन्य शुल्क को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं. सरकार समय समय पर दिशा निर्देश जारी करती है, लेकिन निजी स्कूलों की मनमानी पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है. सरकार का मानना है कि यदि सरकारी मॉडल स्कूल बेहतर विकल्प बनेंगे तो निजी स्कूलों पर भी प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ेगा.सरकार की योजना के अनुसार मॉडल स्कूलों में बेहतर शिक्षक, स्मार्ट क्लास, विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और अंग्रेजी माध्यम जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएंगी. जरूरत के अनुसार छात्रावास की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा सकती है. इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों की छवि बदलना और बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल देना है.कॉमन स्कूल सिस्टम की अवधारणा भारत में पहली बार औपचारिक रूप से 1964 66 के दौरान कोठारी आयोग ने रखी थी. आयोग ने 29 जून 1966 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और सिफारिश की थी कि सभी वर्गों के बच्चे पड़ोस के समान गुणवत्ता वाले स्कूलों में पढ़ें, ताकि अमीर और गरीब के बीच शिक्षा की खाई कम हो सके.बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2006 में कॉमन स्कूल सिस्टम लागू करने की इच्छा जताई थी. इसके बाद पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में कॉमन स्कूल सिस्टम आयोग का गठन किया गया. आयोग ने 10 सितंबर 2006 से काम शुरू किया और 8 जून 2007 को सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन उस रिपोर्ट पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी.मुचकुंद दुबे आयोग ने सरकारी, सहायता प्राप्त और अन्य स्कूलों के बीच गुणवत्ता का अंतर खत्म करने की सिफारिश की थी. आयोग ने नौ वर्ष के रोडमैप के तहत कॉमन स्कूल सिस्टम विकसित करने, शिक्षा को सामाजिक न्याय का माध्यम बनाने और सभी बच्चों को समान अवसर देने पर जोर दिया था.अनुग्रह नारायण सिंह संस्थान के प्रोफेसर डॉ. विद्यार्थी विकास का कहना है कि केवल भवन निर्माण से शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं होगा. मॉडल स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की नियुक्ति, नियमित प्रशिक्षण, पर्याप्त संसाधन, जवाबदेही और आधुनिक पाठ्यक्रम जरूरी होगा.डॉ. विद्यार्थी विकास के अनुसार 524 प्रखंडों में मॉडल स्कूल स्थापित करने के लिए सरकार को चरणबद्ध तरीके से काम करना होगा. इसके लिए भूमि उपलब्धता, भवन निर्माण, विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, डिजिटल कक्षाएं, खेल मैदान, छात्रावास और प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति जैसे कई मोर्चों पर एक साथ काम करना पड़ेगा.विशेषज्ञों के अनुसार मॉडल स्कूलों के निर्माण, आधारभूत संरचना और तकनीकी सुविधाओं पर औसतन 15 से 20 करोड़ रुपये प्रति स्कूल खर्च हो सकता है. भूमि अधिग्रहण पर करीब 10 से 11 हजार करोड़ रुपये और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लगभग पांच हजार करोड़ रुपये की जरूरत पड़ सकती है.डॉ. विद्यार्थी विकास का कहना है कि मॉडल स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति स्नातकोत्तर योग्यता के आधार पर की जानी चाहिए. उन्होंने शिक्षकों की भर्ती बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से कराने और बच्चों का नामांकन प्रवेश परीक्षा के आधार पर करने की बात कही है.शिक्षाविद डॉ. प्रेम कुमार मणि का कहना है कि सिर्फ मॉडल स्कूल खोलने से शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं होगा. उन्होंने कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए कॉमन स्कूल सिस्टम लागू करना जरूरी है, ताकि गरीब और अमीर परिवारों के बच्चे एक ही तरह के स्कूलों में पढ़ सकें.मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दावा किया है कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की तैयारी की जा रही है. उन्होंने कहा कि आने वाले एक वर्ष में 524 प्रखंडों में मॉडल स्कूल खोलने की योजना है, जहां ऐसी सुविधाएं होंगी कि कलेक्टर, विधायक और सांसदों के बच्चे भी पढ़ना चाहेंगे.यदि सरकार मॉडल स्कूल योजना को केवल घोषणा तक सीमित रखने के बजाय शिक्षक, संसाधन, निगरानी और जवाबदेही के साथ लागू करती है तो यह बिहार की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मॉडल स्कूल केवल चमकदार भवन बनेंगे या वास्तव में कॉमन स्कूल सिस्टम की मजबूत नींव तैयार करेंगे.
