क्या सच में टूटेगी जदयू पार्टी?कई विधायक और सांसद करेंगे बगावत!
महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की तर्ज पर बिहार में जेडीयू के संभावित बिखराव और क्षेत्रीय दलों को कमजोर कर 122 का जादुई आंकड़ा छूने की बीजेपी की कथित रणनीति की चर्चा तेज है. विधानसभा में 89 सीटों वाली बीजेपी का लक्ष्य विधानसभा से लोकसभा तक पूर्ण वर्चस्व कायम करना है, जिससे जेडीयू के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं.दरअसल, साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में NDA ने 202 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया था. इस जीत में बीजेपी को सबसे अधिक 89 और जेडीयू को 85 सीटें मिली थीं. इसके अलावा सहयोगी दलों में लोजपा (रामविलास) को 19, जीतन राम मांझी की हम को 5 और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा को 4 सीटें आईं थीं.चुनाव के बाद सरकार तो नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही बनी, लेकिन इस साल नीतीश कुमार के सीएम पद छोड़ने के बाद बिहार की सियासत पूरी तरह से बदल गई है. राज्य के इतिहास में पहली बार बीजेपी का कोई मुख्यमंत्री बना है और सम्राट चौधरी के पास इस समय 201 विधायकों का भारी-भरकम समर्थन है.

हालांकि, जिस तरह से पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद टीएमसी और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बड़ी बगावत और भगदड़ देखने को मिली, उसने बिहार में जेडीयू की चिंता बढ़ा दी है. इसपर जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का तर्क है कि बिहार के हालात बंगाल और महाराष्ट्र की तरह नहीं है, क्योंकि यहां का चुनाव नीतीश के चेहरे और उनके मजबूत जनाधार पर लड़ा गया था.इसके विपरीत, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की नजर इस वक्त जेडीयू के 85 विधायकों, 12 लोकसभा और 5 राज्यसभा सांसदों पर टिकी है. भले ही बीजेपी अभी कोई जल्दबाजी न दिखाए, लेकिन आने वाले समय में बिहार की घरती पर एक बड़े राजनीतिक उलटफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.बिहार में ऐसे तो चुनाव 2030 में होना है. उससे पहले लोकसभा का चुनाव 2029 में होगा. लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा बीजेपी के सभी प्रमुख पदों पर काबिज होने को लेकर है. पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बिहार में बना है. बीजेपी का मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद का सभापति भी बीजेपी का ही है.बिहार में सभी प्रमुख पदों पर बीजेपी का एक तरह से कब्जा है. विधानसभा में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 122 चाहिए और फिलहाल जदयू को छोड़कर बीजेपी एनडीए के अन्य सहयोगी दलों को मिला दें तो यह आंकड़ा 116 तक पहुंच रहा है यानी सरकार बनाने के करीब है.पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी में बड़ा खेल हो गया है. विधायक और सांसद ने टीएमसी से अलग गुट बना लिया है. राज्यसभा के कई सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है. यही हाल महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी में हो रहा है. बिहार में राज्यसभा के चुनाव में सम्राट चौधरी ने राजद और कांग्रेस में सेंधमारी कर दी थी.अब राजनीतिक चर्चा यह भी है कि बीजेपी की नजर जदयू के ऊपर है. ऐसे तो बिहार में पिछले तीन दशक से भाजपा-जदयू का गठबंधन है. बीजेपी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ती रही है, लेकिन नीतीश कुमार के स्वास्थ्य कारणों से स्थिति बदल गई है. उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. विपक्ष भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि यदि जदयू भाजपा का तालमेल टूटा तो सरकार बनाने में मदद करे.बीजेपी के 88 विधायक हैं. पहले 89 थे, लेकिन नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद एक सीट खाली है. वहीं लोजपा आर के 19, हम के पास 05 और रालोमो के 04 विधायक हैं. कुल संख्या 116 है. सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों का समर्थन जरूरी है, यानी सम्राट चौधरी को केवल 7 और विधायक चाहिए.राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के तीन और राजद के एक विधायक ने वोट नहीं डाला था और इसके कारण एनडीए को राज्यसभा की पांचो सीट मिल गई थी. टूट के डर से कांग्रेस और राजद ने अपने विधायकों पर कोई कार्रवाई नहीं की, लेकिन चर्चा है कांग्रेस और राजद के कई विधायक सत्ता पक्ष के संपर्क में है. ऐसे में सम्राट चौधरी को सरकार बनाने में कहीं से कोई परेशानी होने वाली नहीं है क्योंकि सरकार बनाने का मैजिक नंबर 122 है.राजनीतिक विशेषज्ञ प्रिय रंजन भारती का कहना है कि राजद और कांग्रेस के विधायक तो पहले से टूटने के लिए तैयार बैठे हैं, लेकिन बीजेपी जल्दबाजी में नहीं है. क्योंकि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री कुर्सी छोड़ने के बाद जदयू नेताओं के सूर बीजेपी की तरह ही दिख रहे हैं.पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में जिस प्रकार से भगदड़ मची है, उसके बाद कहीं ना कहीं जदयू खेमे में बेचैनी है. बिहार में जदयू के लोकसभा के 12 सांसद हैं और पांच राज्यसभा के सांसद हैं जबकि 85 विधायक है, सबको एकजुट बनाए रखना बड़ी चुनौती है. लेकिन जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का कहना है हम लोगों के सामने चुनौती नहीं है. बंगाल में एक चुनाव हारने के बाद ही तृणमूल कांग्रेस पार्टी ताश के पत्ते की तरह बिखर गई. उनके विधायक और सांसद के अंदर क्या होगा जब उनका फाउंडेशन ही बहुत कमजोर था.वहीं बिहार के विपक्षी दलों का कहना है कि विपक्षी के जितने भी क्षेत्रीय दल हैं, बीजेपी उसे समाप्त करने की एक सूत्री अभियान में लगी हुई है. बंगाल और महाराष्ट्र में जो बीजेपी का अभियान चला है उसके बाद अब दिख रहा है कि भाजपा की नजर बिहार में जदयू पर है. एक और खासियत है कि भाजपा के साथ जो दल रहा है, बीजेपी सबसे पहले उसी को समाप्त करती है.राजनीतिक विशेषज्ञ सुनील पांडे का भी कहना है कि इसमें सच्चाई है कि भाजपा के साथ जितने भी सहयोगी दल अब तक रहे हैं उसमें जदयू ही एकमात्र दल है जो अपने वजूद के साथ खड़ी है और सरकार में है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी बिना जदयू के बिहार में सरकार नहीं बन सकती है. लेकिन जदयू के लिए आज की बात नहीं हो रही है भविष्य की बात हो रही है.बिहार में बीजेपी और सहयोगी दलों को छोड़ दें तो जदयू के साथ सभी विपक्षी दलों को मिलाकर विधायकों का आंकड़ा 126 पहुंच जाता है. ऐसे में जदयू और सभी विपक्षी दल एकजुट हो जाए तो सरकार बन सकती है, लेकिन यह होना आसान नहीं है. यह विपक्षी दलों को भी पता है और जदयू को भी. जदयू के पास 85 विधायक हैं. वहीं राजद के 25, कांग्रेस के 06, वाम दल के 03, आईआईपी के 01, बसपा के 01 और एआईएमआईएम के 05 विधायक हैं. कुल आंकड़ा 126 है.बिहार में एनडीए के पास प्रचंड बहुमत है. जदयू भाजपा का संबंध भी पुराना है. लेकिन नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद से बीजेपी काफी बेहतर स्थिति में है. पहली बार बीजेपी बड़े भाई की भूमिका में दिख रही है.भले ही बीजेपी का पहली बार मुख्यमंत्री बना है, लेकिन अभी भी बीजेपी की सरकार जदयू के सहयोग से बनी है. सरकार बनाने के लिए जो जादुई आंकड़ा चाहिए 122 विधायकों का चाहिए, वहां तक बिना जदयू के सम्राट चौधरी पहुंचते दिख रहे हैं. हालांकि बीजेपी फिलहाल जल्दबाजी दिखाने की कोशिश नहीं कर रही है. राजनीतिक विशेषज्ञों को मुताबिक, 2029-2030 से पहले बिहार में बड़ा खेला होगा. उस समय आरजेडी और कांग्रेस के साथ जदयू के लिए एकजुटता सबसे बड़ी चुनौती होगी.
