क्षेत्रीय दलों को खत्म करने में जुटी भाजपा!लोकसभा में खुद को ऐसे मजबूत करने में जुटी मोदी सरकार

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संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने पूर्वोत्तर भारत को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक रणनीति को नया आयाम देना शुरू कर दिया है. बीजेपी की एक-एक सांसद को साधने वाली सूक्ष्म रणनीति का असर अब दिखने लगा है. इसके चलते जहां एनडीए का कुनबा लगातार मजबूत होता नजर आ रहा है, वहीं विपक्ष और कुछ क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित होने की चर्चा तेज हो गई है.पूर्वोत्तर की 25 लोकसभा सीटों में से 16 सीटों पर पहले ही एनडीए का कब्जा है. अब बीजेपी की नजर उन क्षेत्रीय दलों पर है, जो औपचारिक रूप से किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं. मिजोरम की सत्तारूढ़ पार्टी जोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) इसका ताजा उदाहरण बनकर उभरी है. पार्टी के नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद लालतलुआंगकिमा ने संसद में एनडीए सरकार को मुद्दा आधारित समर्थन देने की घोषणा की है. लोकसभा में भी पार्टी का एक सांसद है.ऐसे में औपचारिक गठबंधन से बाहर रहते हुए भी ZPM का रुख सरकार के लिए दोनों सदनों में संख्यात्मक बढ़त का संकेत माना जा रहा है.

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मुद्दे के जानकारों का कहना है कि बीजेपी की निगाह पूर्वोत्तर में कांग्रेस की एक दूसरी सहयोगी पार्टी वीपीपी पर भी है.पूर्वोत्तर क्षेत्र की कुल 25 सीटों में से एनडीए के पास 16 सीटें हैं जबकि कांग्रेस समेत विपक्ष के पास 9 सीटें हैं. एनडीए के 16 सीटों में से बीजेपी के 13, एजीपी के पास 1, यूपीपीएल के पास 1, एसकेएम के पास 1 सांसद हैं, वहीं विपक्षी दलों की बात करें तो कांग्रेस के पास सबसे अधिक 7, वीपीपी के पास 1 और जेडपीएम के पास 1 सांसद हैं.बीजेपी की रणनीति महज चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि सदन के भीतर अपनी संख्यात्मक शक्ति को ‘अभेद्य’ बनाना है. इसके लिए पार्टी एक साथ पांच अलग-अलग रणनीतियों (मॉडल्स) पर काम कर रही है. पहला, प्रत्यक्ष दलबदल जिसमें विपक्षी सांसदों को सीधे बीजेपी में शामिल करना. दूसरा, इस्तीफा की रणनीति यानी विपक्षी राज्यसभा सांसदों से इस्तीफा करवाकर सीटें रिक्त करवाना शामिल हैं.तीसरा विकल्प सहयोगी संवर्धन है जिसमें विपक्षी नेताओं को एनडीए के सहयोगी दलों में शामिल कराना है. चौथे विकल्प के रूप में क्षेत्रीय समीकरण साधना यानी छोटे और तटस्थ दलों के जरिए नए गठजोड़ तैयार करना है. पांचवां, बागी गुटों को मान्यता देना, जिसमें विपक्षी दलों में विभाजन कराकर अलग-अलग गुटों को वैधानिक मान्यता दिलवाना है.इस रणनीति का असर सिर्फ विपक्ष पर ही नहीं, बल्कि एनडीए के आंतरिक सत्ता-संतुलन पर भी पड़ा है. आम चुनाव के नतीजों के वक्त बीजेपी के पास 240 सीटें थीं. तब 16 सांसदों के साथ चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी (TDP) दूसरे और 12 सांसदों के साथ नीतीश कुमार की जेडीयू (JDU) तीसरे नंबर पर थी. लेकिन एनडीए की यह आंतरिक रैंकिंग अब पूरी तरह बदल चुकी है.तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए 20 सांसदों के एक बड़े समूह ने एनडीए का रुख किया. इसके चलते त्रिपुरा की ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ अचानक एनडीए के भीतर दूसरी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी और टीडीपी तीसरे नंबर पर आ गई.महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 6 सांसद पाला बदलकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना में शामिल हो गए. इस दलबदल से शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई, जिससे उन्होंने जेडीयू को भी पछाड़ दिया. कभी एनडीए की तीसरी सबसे बड़ी ताकत रही जेडीयू अब पांचवें पायदान पर खिसक गई है.यही कहानी महाराष्ट्र में ही एक और पार्टी में दोहराई जा सकती है. भले ही एनसीपी (शरद पवार गुट) में टूट की खबरें सामने नहीं आ रही हो, लेकिन बीजेपी से जुड़े सूत्रों का दावा है कि आने वाले दिनों में एनसीपी (शरद पवार) खेमे के भी कुछ सांसद एनडीए को बाहर से समर्थन दे सकते हैं. इस मुद्दे पर बीजेपी खुलकर कुछ भी कहने से बच रही है, लेकिन संकेत जरूर देते नजर आते हैं कि आगामी संसद सत्र में कई विपक्षी दल बिखरकर एनडीए के पाले में खड़े नजर आ सकते हैं.नए छोटे दलों का साथ, विपक्ष से टूटकर आए गुट और मुद्दा-आधारित समर्थन ने एनडीए अपने संख्याबल के आधार पर आत्मनिर्भर बनता जा रहा है. बीजेपी का अंतिम लक्ष्य अब केवल साधारण बहुमत बनाए रखना नहीं, बल्कि रणनीतिक जोड़-तोड़ के जरिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई (2/3) बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचना है.

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