प्रशांत किशोर को लग सकता है बड़ा झटका,कई करीबी नेता छोड़ने वाले है जन सुराज का साथ

 प्रशांत किशोर को लग सकता है बड़ा झटका,कई करीबी नेता छोड़ने वाले है जन सुराज का साथ
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बिहार की राजनीति में खुद को ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की ताकत बताने वाली प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज पार्टी इन दिनों अंदरूनी खींचतान और असमंजस के चलते चर्चाओं में दिख रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुख ने प्रशांत किशोर को चिंता में डाल दिया है. सवाल यह उठता है कि पार्टी में चल क्या रहा है.विधानसभा चुनाव में शिकस्त मिलने के बाद भी प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में डटे हुए हैं. हालांकि प्रशांत ने अपना आशियाना बदल लिया है. शेखपुरा हाउस के बाजार से प्रशांत किशोर अब बिहटा स्थित आश्रम से सियासत को दिशा देने के लिये तैयार हैं. इन सबके बावजूद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुख ने प्रशांत को मुश्किल में डाल दिया है।जनसुराज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह अचानक सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने के संकेत ने जनसुराज पार्टी में उलझन पैदा कर दिया है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या जन सुराज के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा. उदय सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अगले एक साल के लिए सक्रिय राजनीति से अलग हो रहे हैं. उदय सिंह ने निजी कारणों से पार्टी की गतिविधियों से अलग होने की बात कही है.दरअसल, हाल ही में यह चर्चा सामने आई कि पप्पू सिंह ने खुद को कुछ समय के लिए राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखने का मन बनाया है. इसके बाद पार्टी के अंदर मतभेद और नेतृत्व को लेकर अटकलें शुरू हो गईं. हालांकि आधिकारिक तौर पर पार्टी की ओर से किसी बड़े विवाद की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन संगठन के भीतर कई स्तरों पर असहजता महसूस की जा रही है.हाल के कुछ दिनों में जन सुराज में एक साथ कई तरह की घटनाएं घठित हुई. एक तरफ प्रशांत किशोर में जनसुराज पार्टी का कैंप कार्यालय बिहटा शिफ्ट किया तो दूसरी तरफ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पप्पू सिंह ने खुद को किनारे कर लिया. इन सब के बीच एक डेवलपमेंट और हुआ, शेखपुरा हाउस से चलने वाला कैंप कार्यालय बंद हो गया. आपको बता दें कि शेखपुरा हाउस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह का आवास है और वहां से पार्टी की तमाम तरह की गतिविधियां पिछले 2 साल से संचालित हो रही थी।विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उदय सिंह को जन सुराज का पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. प्रशांत किशोर ने खुद उनकी नियुक्ति का ऐलान किया था और इसे संगठन विस्तार की बड़ी रणनीति माना गया था. पप्पू सिंह भाजपा पृष्ठभूमि से आने वाले वरिष्ठ नेता हैं और सीमांचल में उनकी राजनीतिक पकड़ मानी जाती है.

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लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि जिस नेता को पार्टी का राष्ट्रीय चेहरा बनाकर आगे किया गया, वहीं अचानक पीछे क्यों हटने लगे?राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि प्रशांत किशोर और उदय सिंह के बीच रणनीति और संगठन संचालन को लेकर मतभेद उभरे हैं. विधानसभा चुनाव में मिली हार को लेकर भी दोनों नेताओं के बीच तकरार हैं. हालांकि दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ कुछ नहीं कहा है, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व शैली को लेकर असंतोष की चर्चा है।सबसे बड़ा सवाल ये है कि नेतृत्व के स्तर पर क्या ये सिर्फ अस्थायी नाराजगी है या फिर जन सुराज के भीतर नेतृत्व संघर्ष की शुरुआत? आने वाले दिनों में पप्पू सिंह की अगली राजनीतिक भूमिका और प्रशांत किशोर की रणनीति इस सवाल का जवाब देगी. फिलहाल दोनों नेता रेल की पटरियों की तरह दिख रहे हैं, जो चलते तो साथ-साथ हैं लेकिन मिलते नहीं है.कुछ लोगों का मानना है कि जन सुराज में कई नेता यह महसूस कर रहे हैं कि पार्टी अब आंदोलन से ज्यादा ‘वन मैन कंट्रोल सिस्टम’ की ओर बढ़ रही है. यही वजह है कि कुछ पुराने चेहरे असहज दिखाई दे रहे हैं. पार्टी के अंदर फैसला प्रजातांत्रिक तरीके से नहीं हो रहे हैं और इसी वजह से पुराने और सीनियर नेताओं में नाराजगी है. हाल के दिनों में संगठन में फेरबदल और नए सामाजिक समीकरण साधने की कोशिशों ने भी अंदरूनी बेचैनी बढ़ा दी है।

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