ईरान में दिखेगा तबाही का मंजर,ट्रंप की सनकी दिमाग ने फिर से शुरू करवाई जंग?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का शांति प्रस्ताव महज 24 घंटे में ही नाकाम होता दिख रहा है. अमेरिका द्वारा मास्टरस्ट्रोक समझे जा रहे समझौता ज्ञापन (MOU) को ईरान ने ‘रद्दी का टुकड़ा’ बताकर आग के हवाले कर दिया है. इससे बौखलाए अमेरिका ने अपनी साख बचाने के लिए ईरान पर हमलों का सिलसिला शुरू कर दिया है. दावा किया जा रहा है कि इन हमलों के साथ-साथ अमेरिका ने अपने कुछ नए हथियारों की टेस्टिंग भी की है, जो काफी घातक माने जा रहे हैं.अमेरिका ने ईरान की पोर्ट को निशाना बनाया है, लेकिन ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए साफ संदेश दे दिया कि वह किसी भी चुनौती का सामना करने को तैयार है. ट्रंप का भ्रमजाल अमेरिका पर भारी पड़ता दिख रहा है. एक तरफ अरब देशों का भरोसा खत्म हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान युद्धविराम के दौरान भी हमले कर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है. दरअसल यह वही पैटर्न है जिसमें अमेरिका ईरान को फंसाना चाहता था, लेकिन ईरान ने पूरी बाजी पलट दी है.ईरान के प्रस्ताव खारिज करने से बौखलाए अमेरिका ने कुछ ही देर में ईरान पर कई बड़े हमले किए. उसके निशाने पर ईरान का सबसे बड़ा बंदरगाह बंदर अब्बास था, जो 2700 वर्ग किमी में फैला है. इस हमले से बंदर अब्बास के नेवल कमांड सेंटर में आग लग गई और पोर्ट के तीन टर्मिनल पूरी तरह खाक हो गए. दूसरा निशाना केश्म द्वीप था, जो 1491 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाला होर्मुज का सबसे बड़ा द्वीप है. यहां हमले में मिसाइल साइलो में विस्फोट हो गया और स्पीड बोट के ठिकाने ध्वस्त हो गए. तीसरा हमला मिनाब तटीय शहर पर किया गया, जो करीब 5300 वर्ग किमी में फैला है. इस हमले में चेक प्वाइंट तबाह होने के साथ ही रडार सिस्टम भी नष्ट हो गया.युद्धविराम अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन दोनों ओर से बारूद की बारिश हो रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या वार्ता संभव है? खास बात यह है कि इस बार अमेरिका, इजराइल और अरब देशों की ताकतें एक साथ मिल गई हैं. अंदेशा जताया जा रहा है कि इन हमलों में अमेरिकी सेना के साथ सऊदी अरब और UAE की सैन्य तकनीक भी शामिल थी, जबकि मोसाद का इनपुट था. अमेरिकी सैनिकों ने अरब देशों की जमीन और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल किया, वहीं सुरक्षा के लिए इजराइल ने डिफेंस सिस्टम मुहैया कराए.खबरों के मुताबिक ट्रंप खुद हमले के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अरब देशों के दबाव में यह कार्रवाई की गई. पिछले 48 घंटों में हालात तेजी से बदले. 48 घंटे पहले ईरान ने UAE के फुजैरा पोर्ट पर एक दर्जन से अधिक बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों से हमला किया था (हालांकि ईरान ने आधिकारिक तौर पर जिम्मेदारी लेने से इनकार किया).

इसके 24 घंटे बाद सऊदी अरब और कुवैत ने अमेरिकी सेना को अपने एयरबेस तक पहुंचने से रोक दिया, क्योंकि वे पेंटागन द्वारा हमले को सीजफायर का उल्लंघन न मानने से नाराज थे. इसके बाद अरब देशों और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई.ट्रंप प्रशासन ने अरब देशों के विरोध से नाराज होकर प्रोजेक्ट फ्रीडम को रोक दिया, क्योंकि खाड़ी देशों के सहयोग के बिना इसे आगे बढ़ाना संभव नहीं था. मगर जब ट्रंप की साख पर सवाल खड़े हुए, तो अचानक ईरान पर हमले का आदेश दे दिया गया.कहा जा रहा है कि अमेरिका ने इन हमलों के जरिए अपने नए हथियारों की भी टेस्टिंग कर ली. इस बहाने उसने अरब देशों का गुस्सा भी शांत किया और लंबे युद्ध की तैयारी का परीक्षण भी कर लिया. पहला हथियार LUCAS है, जो एक स्ट्राइक ड्रोन सिस्टम है. यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस है, स्टेल्थ कैपेबिलिटी के कारण रडार पर पकड़ में नहीं आता, कई ड्रोनों से स्वॉर्म अटैक कर सकता है. इसकी स्पीड 950 किमी/घंटा और रेंज 2500 किमी है.दूसरा हथियार डार्क ईगल हाइपरसोनिक मिसाइल है. इसकी स्पीड 6200 किमी/घंटा और रेंज 2775 किमी है. यह रास्ता बदलने में माहिर है, जिससे दुश्मन इसे पकड़ नहीं पाता. इन दोनों हथियारों की मांग सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने की थी. पिछले हफ्ते सेंटकॉम चीफ ब्रैड कूपर युद्ध तैनाती का जायजा लेने USS त्रिपोली पर पहुंचे थे. इसके बाद तय किया गया कि लंबा युद्ध लड़ने के लिए होर्मुज और ईरान के लिए अलग रणनीति बनानी होगी, ताकि ईरान को दो मोर्चों पर उलझाया जा सके. खासतौर पर होर्मुज के लिए डार्क ईगल और लुकास ड्रोन की खेप मंगवाकर अमेरिका ने उनका टेस्ट भी कर लिया है.आने वाले दिनों में होर्मुज में इन दो हथियारों से हमले बढ़ सकते हैं, जबकि ईरान पर हवाई हमलों का जिम्मा इजराइल को सौंपा जा सकता है. संभावना जताई जा रही है कि ट्रंप इसीलिए बार-बार वार्ता पर जोर दे रहे हैं, ताकि हथियार बनाने और अधिक तैनाती के लिए वक्त मिल सके. लेकिन अब ईरान ने उसी पैटर्न को अपनाकर ट्रंप के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया है. अब ट्रंप को फिर से सोचना होगा कि आखिर ईरान पर काबू कैसे पाया जाए.
