NATO को खत्म करना चाहते है ट्रंप!अमेरिका ने चीन पर भी डाला दबाव

 NATO को खत्म करना चाहते है ट्रंप!अमेरिका ने चीन पर भी डाला दबाव
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने NATO को एक बड़ी चेतावनी दी है. ट्रंप ने कहा कि अगर सहयोगी देश होर्मुज स्ट्रेट को खोलने में मदद नहीं करते हैं, तो NATO का भविष्य बहुत बुरा हो सकता है. यह बयान ट्रंप की NATO विरोधी मानसिकता और उनकी अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी से जुड़ा माना जा रहा है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान युद्ध सिर्फ एक बहाना है. ट्रंप का असली मकसद NATO को तोड़ना और यूरोप को अमेरिका के कंट्रोल में लाना है.ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका ने रूस के साथ युद्ध में यूक्रेन की मदद की है, इसलिए वह यूरोप से होर्मुज स्ट्रेट पर मदद की उम्मीद करते हैं. ट्रंप ने कहा कि अगर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती है या नकारात्मक प्रतिक्रिया है, तो यह NATO के भविष्य के लिए बहुत बुरा होगा. यह बयान एक सीधी धमकी है. या तो यूरोप ईरान के खिलाफ अमेरिकी युद्ध में शामिल हो जाए या NATO टूट जाए.NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) की स्थापना 1949 में सोवियत संघ के खतरे से यूरोप और उत्तरी अमेरिका की रक्षा के लिए हुई थी. इसका मूल सिद्धांत सामूहिक सुरक्षा है. अनुच्छेद 5 के तहत, एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है.

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लेकिन ट्रंप कई साल से NATO की आलोचना करते आ रहे हैं. उनका कहना है कि यूरोपीय देश अमेरिकी डिफेंस अम्ब्रेला के नीचे आराम से रहते हैं, लेकिन अपने रक्षा खर्च में योगदान नहीं देते. ट्रंप ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर आठ NATO देशों पर 25% टैरिफ लगाने की भी धमकी दी थी.ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने यूक्रेन की मदद की, अब यूरोप की बारी है. होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जरूरत होगी. यूरोपीय देशों के लिए यह एक विदेशी युद्ध है जिसका उनसे कोई सीधा संबंध नहीं. यूरोप में सभी देश एक साथ नहीं हैं. फ्रांस, जर्मनी, इटली ने पहले ही ईरान युद्ध की आलोचना की है. अगर कुछ देश ट्रंप का साथ देते हैं और कुछ नहीं, तो NATO में फूट पड़ जाएगी.ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका किसी भी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन से मुक्त हो और अपने हितों के मुताबिक काम करे. NATO उनके इस विजन में बाधा है. अगर यूरोप ट्रंप की मांग मान लेता है. तो अमेरिका के युद्ध में फंस जाएगा. अगर नहीं मानता तो ट्रंप NATO छोड़ सकते हैं. दोनों ही स्थिति में NATO कमजोर होगा. यही ट्रंप की असली रणनीति हो सकती है.यूरोपीय देशों के नेता असमंजस में हैं. एक तरफ वे अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहते, दूसरी तरफ वे ईरान युद्ध में शामिल नहीं होना चाहते. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पहले ही कहा है कि यूरोप को रणनीतिक स्वायत्तता की जरूरत है और अमेरिका पर निर्भरता कम करनी होगी. जर्मनी, इटली, स्पेन ने एक संयुक्त बयान में कहा कि वे ईरान पर हमलों की निंदा करते हैं लेकिन अमेरिका-ईरान वार्ता फिर से शुरू होनी चाहिए. वहीं ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का सीमित इस्तेमाल करने की अनुमति दी है.ट्रंप ने चीन पर भी होर्मुज स्ट्रेट खोलने में मदद करने का दबाव डाला. उन्होंने कहा कि चीन को भी मदद करनी चाहिए क्योंकि चीन को अपने तेल का 90% होर्मुज स्ट्रेट से मिलता है. उन्होंने कहा कि वह अपनी बीजिंग यात्रा भी टाल सकते हैं. यह भी एक दबाव की रणनीति है. चीन को यह संदेश देना कि चाइना डील तभी होगी जब चीन अमेरिकी हितों को समझे.होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के तेल का 20% गुजरता है. इसके बंद होने से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले एशियाई देश हैं. चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया ज्यादार तेल खाड़ी देशों से खरीदते हैं. वहीं यूरोप कुछ हद तक तेल खरीदता है, लेकिन यूरोप के पास रूस, नॉर्वे, अफ्रीका जैसे वैकल्पिक स्रोत हैं. अमेरिका तेल में आत्मनिर्भर है. अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट की सबसे कम जरूरत है, फिर भी वह यूरोप से इसे खोलने की मांग कर रहा है. यह विरोधाभास दिखाता है कि यह सिर्फ एक बहाना है.

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