आखिर तेजस्वी के विधायक ने रामविलास पासवान को क्यों कहा बेचारा?समझिए पूरी अंदर की कहानी
बिहार में ‘बेचारा’ पर बवाल मचा हुआ है. राजद के तेज तर्रार विधायक कुमार सर्वजीत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान को ‘बेचारा’ कह दिया तो बवाल मच गया. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के विधायक अपने नेता चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान के बारे में यह शब्द सुनना नहीं चाहते हैं, भला वह चाहे भी क्यों? रामविलास पासवान ने अपने दौर के सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ गठबंधन किया. यहां तक कि 6 प्रधानमंत्री के कैबिनेट में मंत्री रहे. ऐसे में भला यह ‘बेचारा’ शब्द उन लोगों के लिए कष्टदायक क्यों नहीं लगेगा?दरअसल, राष्ट्रीय जनता दल के बोधगया विधायक कुमार सर्वजीत ने पिछले हफ्ते बिहार में दलित राजनीति के प्रणेता पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के राजनीतिक यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि पटना में रामविलास पासवान के योगदान को देखते हुए प्रमुख स्थान पर प्रतिमा लगाई जाए. कुमार सर्वजीत ने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह करते हुए बीच में रामविलास पासवान को ‘बेचारा रामविलास पासवान’ कह दिया. बाकी सब तो ठीक था लेकिन, लोजपा आर के विधायकों को ‘बेचारा’ शब्द चुभ गई.

उसके बाद यह बवाल शुरू हो गया.लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राजद विधायक कुमार सर्वजीत के इस बयान को लेकर लगातार बवाल कर रही है. राजद के पुतले फुके जा रहे हैं. राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव के पुतले फूंके जा रहे हैं. यहां तक कि सोमवार को विधानसभा की कार्रवाई शुरू होने से पहले लोजपा (रामविलास) के प्रदेश अध्यक्ष राजू तिवारी की अध्यक्षता में प्रदर्शन किया गया.”विधानसभा में लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान के लिए जो शब्द इस्तेमाल किया गया है, वह शब्द यह दर्शाता है कि तेजस्वी यादव की मानसिकता दलित विरोधी समाज विरोधी है. तेजस्वी यादव को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए.’बवाल को बढ़ता हुआ देखकर राजद विधायक कुमार सर्वजीत ने कहा कि रामविलास पासवान दलित, शोषितों, अकलियतों के नेता रहे हैं. मैंने विधानसभा परिसर में उनकी मूर्ति लगाने की बात कही थी. मैंने सदन में कहा था कि दलित शोषितों के बच्चे सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं, यदि बेचारे रामविलास पासवान होते देश के दलित और ओबीसी को यह दिन देखना नहीं पड़ता.”मैंने यह भी कहा राम विलास पासवान की पुण्यतिथि पर सरकारी छुट्टी दी जाए. मैंने साफ कहा है कि पासवान जाति को दलित और महादलित करके आपस में बांट दिया गया. लगातार दलित और ओबीसी पर अत्याचार हो रहा है लेकिन, राम भक्त हनुमान यानी कि चिराग पासवान चुप्पी साधे हुए हैं. यदि, रामविलास पासवान जीवित होते तो यह दिन नहीं देखना होता.कुमार सर्वजीत ने आगे कहा कि यह प्रचलन रहा है अगर कोई महापुरुष व्यक्ति धरती पर नहीं रहते हैं तो हम लोग कहते हैं कि अगर बेचारे होते आज यह दिन हम लोगों को नहीं देखना होता. चिराग पासवान अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, उनकी पार्टी अपनी इज्जत को बचाने के लिए 19 विधायको में से एक विधायक ने नहीं कहा कि उनकी आदम कद मूर्ति लगनी चाहिए. उनके नाम पर छुट्टी घोषित होनी चाहिए.”बेचारे शब्द को आपराधिक शब्द प्रचलित किया जा रहा है जबकि यह श्रद्धावाला शब्द है. जिससे आत्मिक लगाव होता है, उसके लिए यह शब्द का प्रयोग किया जाता है. यह कोई अपराधिक शब्द नहीं है. मेरे खिलाफ जो पुतला जला रहे हैं, वह एक पासवान के बेटे का पुतला जला रहे हैं. इससे सिद्ध हो गया कि यह दलित के दुश्मन हैं.दरअसल, राष्ट्रीय जनता दल के विधायक कुमार सर्वजीत के दिल से यह बात यूं ही नहीं आई है. शायद कुमार सर्वजीत पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान के द्वारा किए गए अहसानों को इस माध्यम से चूकाना चाहते हैं.रामविलास पासवान ने ही 2009 में बोधगया विधानसभा क्षेत्र से पहली बार उन्हें चुनाव लड़वाया था और जिताकर विधानसभा भी भेजा था. महज एक साल के कार्यकाल के बाद 2010 में कुमार सर्वजीत चुनाव हार गए. 2015 में उन्होंने राजद का दामन थामा और जीत हासिल की. 2020 में भी जीते और विपरीत परिस्थितियों में कुमार सर्वजीत ने 2025 में भी सफलता हासिल की.रामविलास पासवान की राजनीतिक कार्यकाल को देखा जाए तो वह एक बार विधायक, 9 बार लोकसभा सांसद और दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे हैं. रामविलास पासवान 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से अलौली के विधायक बने थे. फिर हाजीपुर लोकसभा सीट से 1977, 1980, 1989, 1991(रोसरा लोकसभा), 1996, 1998, 1999, 2004, 2014 से हाजीपुर से सांसद रहे. इसके साथ ही 2010 और 2019 में राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी चुने गए.रामविलास पासवान राजनीति के 51 साल के कार्यकाल में छह प्रधानमंत्री के साथ कैबिनेट में सदस्य रहे. पहली बार, 1989 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कैबिनेट में श्रम मंत्री बने. दूसरी बार और तीसरी बार, 1996 से लेकर 1998 के बीच में प्रधानमंत्री एचडी देवे गौड़ा और आईके गुजराल के कैबिनेट में रेल मंत्री के रूप में काम किया. तीसरी बार रामविलास पासवान ने 1999 प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में भी केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री के रूप में काम किया.बाद में 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के कैबिनेट में केंद्रीय खान मंत्री भी बने. पांचवी बार, 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री बने. वही छठी बार, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में उपभोक्ता मामले खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री बने.रामविलास पासवान ने बिहार की राजनीति में एक अलग मोर्चा बनाए रखा था. इसको लेकर उन्होंने अपनी पार्टी का भी गठन किया. 1983 में रामविलास पासवान ने दलित मुक्ति और कल्याण के लिए दलित सेवा की स्थापना की थी. इसके बाद 2000 में जनता दल से हटकर उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की. जिसकी स्थापना से लेकर 2020 तक वही राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे.हालांकि 2020 में उनके निधन के बाद पुत्र चिराग पासवान और उनके भाई पशुपति पारस के बीच मनमुटाव हुआ. चाचा भतीजे की राहें जुदा हो गई. रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके भाई पशुपति पारस को नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री बनाया गया. तब चिराग पासवान अलग-थलग पड़ गए थे.चिराग पासवान ने लोजपा पर दावा किया तो, चुनाव आयोग ने लोक जनशक्ति पार्टी को बांटते हुए एक का नाम राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी और दूसरे का नाम लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) कर दिया. राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी का नेतृत्व पशुपति पारस करते हैं तो वहीं लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास का नेतृत्व चिराग पासवान करते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में समीकरण ऐसे बदले कि चाचा पशुपति पारस को चुनाव भी नहीं लड़ने दिया गया. वहीं भतीजा चिराग पासवान ने सभी सीटों पर जीत हासिल करते हुए नरेंद्र मोदी के कैबिनेट में मंत्री भी बने.
