आखिर Gen Alpha को सड़कों पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी?सरकार के लिए बनेंगे सिरदर्द
कभी स्कूल में पंखा नहीं चलता, कहीं पीने का साफ पानी नहीं मिलता, तो कहीं शिक्षक ही नहीं हैं. ऐसी शिकायतें पहले बच्चे अपने माता-पिता या स्कूल के प्रिंसिपल तक पहुंचाते थे. लेकिन अगस्त 2026 में तस्वीर कुछ अलग दिख रही है. उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक स्कूली बच्चे अपनी समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं. ये बच्चे अभी वोट देने की उम्र में भी नहीं पहुंचे हैं, लेकिन अपने स्कूल और पढ़ाई से जुड़े सवालों पर अधिकारियों से जवाब मांग रहे हैं.कई जगह बच्चों ने स्कूल से बाहर निकलकर मार्च किया, धरना दिया, स्कूल के गेट बंद किए और सरकारी दफ्तरों तक पहुंच गए. इन प्रदर्शनों को Gen Alpha Protest कहा जा रहा है. खास बात यह है कि इन बच्चों की मांगें किसी बड़ी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी हैं- पंखा, पानी, शौचालय, शिक्षक, खाना, सड़क और स्कूल की बेहतर व्यवस्था. भारत में 2026 में जो नई लहर दिखाई दे रही है, वह खास तौर पर स्कूली बच्चों की है और इसे Gen Alpha की पहली बड़ी, कई राज्यों में फैली दिखाई देने वाली विरोध लहर बताया जा रहा है.Gen Alpha की उम्र की सीमा को लेकर पूरी दुनिया में एक जैसी सहमति नहीं है.

आम तौर पर इसमें 2010 के आसपास से 2020 के दशक के मध्य तक पैदा हुए बच्चों को रखा जाता है. भारत में अगर 0-14 साल की आबादी को इसका मोटा आधार माना जाए, तो यह संख्या करीब 34 से 39 करोड़ बैठती है.उत्तर प्रदेश: स्कूल की खराब व्यवस्था, शिक्षक, पानी, पंखे और सड़क को लेकर प्रदर्शन.बिहार: मिड-डे मील, गंदे शौचालय, टूटे हैंडपंप और बेंच की शिकायत.राजस्थान: खाली शिक्षक पदों को भरने के लिए बच्चों ने स्कूल के गेट तक बंद किए.मध्य प्रदेश: बस किराया बढ़ाने और स्कूलों को दूसरी जगह शिफ्ट करने के खिलाफ प्रदर्शन.महाराष्ट्र: पानी, शौचालय और शिक्षकों की कमी जैसे मुद्दे उठाए गए.Gen Alpha के विरोध प्रदर्शनों में सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश के फतेहपुर की हुई. 28 जुलाई को किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्रों ने करीब पांच से छह घंटे तक प्रदर्शन किया. बच्चों की शिकायत थी कि कई कक्षाओं में बिजली और पंखों की व्यवस्था ठीक नहीं है, शौचालय साफ नहीं हैं, पीने का पानी ठीक नहीं है और बैठने के लिए पर्याप्त डेस्क-बेंच भी नहीं हैं. बच्चों ने लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब जैसी सुविधाओं की कमी का भी मुद्दा उठाया. प्रदर्शन के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने स्कूल का निरीक्षण किया और कई मांगों पर काम शुरू करने का भरोसा दिया.गया के सिमुआरा मिडिल स्कूल के 40 से ज्यादा छात्र करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर टिकारी SDM कार्यालय पहुंचे. बच्चों की शिकायतों में खराब मिड-डे मील, गंदे शौचालय, टूटा हैंडपंप और खेल सामग्री की कमी शामिल थी. बच्चों ने अधिकारियों से सीधे बात करने पर जोर दिया. इसके बाद SDM ने स्कूल के प्रधानाध्यापक को समस्याएं दूर करने के लिए समय दिया और शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई.राजस्थान के बाड़मेर और जालौर में बच्चों का गुस्सा शिक्षकों की कमी को लेकर सामने आया. कई स्कूलों में जरूरी विषयों के शिक्षक नहीं होने से पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी प्रभावित हो रही थी. बाड़मेर में छात्रों ने स्कूल का गेट बंद कर प्रदर्शन किया. अधिकारियों की ओर से तत्काल तीन शिक्षकों को भेजने का भरोसा दिए जाने के बाद प्रदर्शन खत्म हुआ. यहां बच्चों की मांग साफ थी- स्कूल है तो पढ़ाने वाले शिक्षक भी होने चाहिए.मध्य प्रदेश के सिरोंज में छात्राओं ने स्कूल बस के रियायती किराए को 10 रुपये से बढ़ाकर 25 रुपये किए जाने का विरोध किया. छात्राओं के प्रदर्शन के बाद प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और किराया वापस 10 रुपये कर दिया गया. यही नहीं, उज्जैन में छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह शिफ्ट या मर्ज किए जाने के विरोध में कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया.उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में बच्चों ने स्कूल तक पक्की सड़क की मांग को लेकर करीब 5 किलोमीटर की तिरंगा यात्रा निकाली और कलेक्ट्रेट पहुंचे. बच्चों का कहना था कि बारिश के दौरान रास्ता कीचड़ से भर जाता है और स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाता है. प्रशासन के अनुसार सड़क का प्रस्ताव पहले से लंबित था और आगे की प्रक्रिया के लिए भेजा गया था. इस प्रदर्शन ने सड़क जैसी बुनियादी सुविधा को भी बच्चों की शिक्षा से जोड़कर सामने ला दिया.अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों के सड़कों पर उतरने से क्या बदला? कई मामलों में इसका शुरुआती असर साफ दिखाई दिया है. फतेहपुर में पंखे लगाने, बिजली की वायरिंग ठीक करने, डेस्क-बेंच उपलब्ध कराने, पानी की सुविधा और मिड-डे मील सुधारने की बात सामने आई. बिहार में शिकायतों की जांच के लिए कमेटी बनी. राजस्थान में शिक्षकों की तैनाती का भरोसा दिया गया. मध्य प्रदेश के सिरोंज में बस किराया बढ़ाने का फैसला वापस ले लिया गया. यानी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरी व्यवस्था बदल गई, लेकिन इतना जरूर है कि बच्चों की शिकायतों को नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए मुश्किल हुआ है.Gen Alpha की सटीक आबादी बताना आसान नहीं है, क्योंकि इस पीढ़ी की जन्म-वर्ष सीमा पर अलग-अलग संस्थाओं की अलग राय है. इसलिए 0-14 साल के बच्चों की आबादी को एक मोटा आधार माना जा सकता है. उपलब्ध जनसांख्यिकीय अनुमानों में भारत में इस समूह की संख्या 2026 में करीब 32.7 करोड़ बताई गई है. हालांकि इसे Gen Alpha की आधिकारिक आबादी नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि Gen Alpha की परिभाषा केवल उम्र से नहीं बल्कि तय जन्म-वर्ष सीमा से जुड़ी है.
