IAS-IPS की नींव किसने रखी?जानिए पटेल की कहानी!
आजादी के समय भारत कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा था. देश का विभाजन हो चुका था. रियासतों को भारत में मिलाना था. शरणार्थियों का पुनर्वास करना था. कानून-व्यवस्था बनाए रखनी थी. ऐसे समय में प्रशासन को कमजोर करना देश के लिए जोखिम भरा हो सकता था. पटेल ने इसी जरूरत को समझा. उन्होंने अधिकारियों की ऐसी व्यवस्था का समर्थन किया जो केंद्र और राज्यों, दोनों के लिए काम करें. यही सोच आगे चलकर अखिल भारतीय सेवाओं की नींव बनी.ब्रिटिश शासन में भारतीय सिविल सेवा यानी ICS प्रशासन की सबसे प्रभावशाली सेवाओं में से एक थी. इसके अधिकारी जिलों और प्रांतों में राजस्व, कानून-व्यवस्था और सरकारी कामकाज संभालते थे. भारतीय पुलिस से जुड़ी सेवा में भी अधिकारी प्रशासन और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते थे. लेकिन यह व्यवस्था भारत के लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं थी. उसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का शासन चलाना था. उच्च पदों पर अंग्रेज अधिकारियों का दबदबा था. भारतीयों के लिए इस सेवा में प्रवेश पाना कठिन था. परीक्षा की प्रक्रिया और उसके स्थान जैसी बाधाएं भी भारतीय उम्मीदवारों के लिए चुनौती बनती थीं.

देश के स्वतंत्रता आंदोलन में ICS की आलोचना हुई. कई लोगों को लगता था कि यह सेवा औपनिवेशिक शासन का औजार है. इसलिए आजादी के बाद इसे जस का तस रखना संभव नहीं था. साथ ही, प्रशासनिक अनुभव और प्रशिक्षित अधिकारियों को अचानक हटाना भी ठीक नहीं होता. नए देश को रोजमर्रा का शासन चलाने के लिए अनुभवी कर्मचारियों की जरूरत थी.आजादी के आसपास कुछ नेताओं के मन में पुरानी सिविल सेवा को खत्म करने का विचार था. उन्हें लगता था कि यह सेवा अंग्रेजों की बनाई हुई है और स्वतंत्र भारत में इसका स्थान नहीं होना चाहिए. पटेल ने इस विचार से असहमति जताई. उनका तर्क था कि देश को स्थिर प्रशासन चाहिए. अधिकारी चुनी हुई सरकारों की नीतियों को लागू करने में मदद करते हैं. वे कानून-व्यवस्था, राजस्व, विकास और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े काम संभालते हैं. अगर प्रशासनिक ढांचा अचानक टूट जाता, तो नई सरकार के सामने शासन चलाने में गंभीर कठिनाई आ सकती थी.पटेल अधिकारियों से केवल पुराने तौर-तरीके जारी रखने की अपेक्षा नहीं करते थे. वे चाहते थे कि अधिकारी अब ब्रिटिश सरकार के बजाय स्वतंत्र भारत और उसके संविधान के प्रति जवाबदेह हों. सेवा का उद्देश्य बदलना था. उसे जनता की जरूरतों के अनुसार काम करना था. उन्होंने अधिकारियों को यह भी समझाया कि वे राजनीतिक दबाव से दूर रहकर निष्पक्ष ढंग से काम करें. प्रशासन को चुनी हुई सरकार के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए, लेकिन अधिकारियों से यह अपेक्षा भी थी कि वे नियमों और कानून के अनुसार काम करें. यही संतुलन एक पेशेवर सिविल सेवा की पहचान बना.आजादी के बाद ICS को भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS के रूप में बदला गया. यह केवल नाम का परिवर्तन नहीं था. सेवा का आधार अब स्वतंत्र भारत का संविधान था. उसका उद्देश्य देश के प्रशासन को चलाना और सरकार की नीतियों को लागू करना बना. भारतीय प्रशासनिक सेवा को अखिल भारतीय सेवा के रूप में विकसित किया गया. इसका अर्थ है कि अधिकारी केंद्र और राज्यों, दोनों में काम कर सकते हैं. वे किसी राज्य कैडर से जुड़े होते हैं, पर उनकी सेवा का दायरा केवल उस राज्य तक सीमित नहीं रहता. जरूरत के अनुसार वे केंद्र सरकार में भी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं. इस व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक संपर्क बना रहता है. अधिकारी अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं. इससे उन्हें देश की विविध परिस्थितियों को समझने का अवसर मिलता है. साथ ही, प्रशासनिक अनुभव और कामकाज के कुछ साझा मानक भी विकसित होते हैं.भारतीय पुलिस सेवा भी अखिल भारतीय सेवाओं का हिस्सा बनी. इसका काम पुलिस प्रशासन और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा है. देश के विभाजन के समय हिंसा और विस्थापन ने कानून-व्यवस्था की अहमियत को और स्पष्ट कर दिया था. एक संगठित पुलिस सेवा का उद्देश्य केवल अपराध पर कार्रवाई करना नहीं है. उसे नागरिकों की सुरक्षा करनी होती है. उसे कानून के अनुसार काम करना होता है.लोकतंत्र में पुलिस की जवाबदेही और निष्पक्षता बहुत जरूरी है. आईपीएस अधिकारी राज्यों में पुलिस नेतृत्व संभालते हैं. कुछ अधिकारी केंद्र की सुरक्षा और जांच से जुड़ी संस्थाओं में भी काम करते हैं. पटेल की सोच में मजबूत प्रशासन और राष्ट्रीय एकता एक-दूसरे से जुड़े थे. उन्हें लगता था कि देश के अलग-अलग हिस्सों में शासन की क्षमता बनी रहनी चाहिए. कानून सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए. प्रशासन में निरंतरता होनी चाहिए, ताकि राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के बीच भी सरकारी काम चलता रहे.सबसे बड़ा बदलाव सेवा की निष्ठा में था. पहले अधिकारी ब्रिटिश शासन के प्रति जवाबदेह थे. आजादी के बाद उनकी जवाबदेही भारत के संविधान और कानूनों से जुड़ी. अब जनता की चुनी हुई सरकार नीतियां तय करती है. अधिकारी उन नीतियों को नियमों के दायरे में लागू करते हैं. भर्ती और प्रशिक्षण को भी भारतीय जरूरतों के अनुसार ढाला गया. सेवाओं में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था विकसित हुई.भर्ती प्रक्रिया को संघ लोक सेवा आयोग से जोड़ा गया. इसका उद्देश्य योग्यता के आधार पर चयन करना था. प्रशिक्षण में प्रशासन, कानून, वित्त और देश की सामाजिक विविधता से जुड़े विषय शामिल हुए. सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ी. अधिकारियों से यह अपेक्षा थी कि वे जनता के बीच काम करें और स्थानीय जरूरतों को समझें. प्रशासन का केंद्र केवल राजस्व वसूली या शासन नियंत्रण नहीं रहा. शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और कल्याणकारी योजनाएं भी सरकारी काम का हिस्सा बनीं.इन बदलावों के बावजूद, पुरानी व्यवस्था की कुछ आलोचनाएं बनी रहीं. नौकरशाही पर कभी-कभी धीमे काम, अधिक कागजी प्रक्रिया और आम लोगों से दूरी के आरोप लगते हैं. इसलिए प्रशासनिक सुधार की जरूरत आज भी महसूस की जाती है. किसी सेवा की मजबूती केवल उसके नियमों से नहीं बनती. उसके अधिकारियों के व्यवहार, ईमानदारी और जवाबदेही से भी बनती है.भारतीय संविधान ने अखिल भारतीय सेवाओं के लिए आधार दिया. संविधान का अनुच्छेद 312 संसद को नई अखिल भारतीय सेवाएं बनाने की व्यवस्था देता है. इस प्रावधान से ऐसी सेवाओं का ढांचा बना, जो केंद्र और राज्यों, दोनों के प्रशासन में भूमिका निभा सके. इस व्यवस्था का एक लाभ यह है कि राज्यों को प्रशिक्षित अधिकारियों की सेवा मिलती है. केंद्र को भी ऐसे अधिकारी मिलते हैं जिन्हें अलग-अलग राज्यों में काम करने का अनुभव होता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्र और राज्य के बीच हर प्रशासनिक सवाल पर सहमति अपने आप बन जाती है. सेवा को प्रभावी बनाए रखने के लिए स्पष्ट नियम, निष्पक्ष कामकाज और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है.स्टील फ्रेम का अर्थ यह नहीं है कि प्रशासन कठोर या जनता से दूर हो. इसका अर्थ एक ऐसी व्यवस्था से है जो संकट के समय काम करती रहे, कानून का पालन करे और शासन में स्थिरता बनाए रखे. पटेल ने प्रशासनिक सेवा को स्वतंत्र भारत की जरूरतों के अनुसार इस्तेमाल करने की बात रखी. IAS और IPS की नींव रखना उनके योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था. उन्होंने माना कि लोकतंत्र को सक्षम प्रशासन चाहिए. साथ ही, प्रशासन को जनता के प्रति उत्तरदायी भी होना चाहिए. आज इन सेवाओं के सामने पारदर्शिता, तकनीक, तेज सेवा और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान जैसे नए सवाल हैं. पटेल की सोच को याद करने का सही तरीका केवल उन्हें लौह पुरुष कहना ठीक नहीं है. उनके विचार का सार यह भी है कि मजबूत संस्थाएं देश को जोड़ती हैं. लेकिन मजबूत संस्था वही होती है जो संविधान के अधीन रहे, निष्पक्ष काम करे और जनता की सेवा को अपना उद्देश्य माने.
