महबूबा मुफ्ती का भविष्य तय करेगा आज का मतदान,जम्मू-कश्मीर में कमजोर पड़ी बीजेपी!
कश्मीर के पहले चरण का विधानसभा चुनाव महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी के भाग्य का फैसला करेगा, जो अपने गठन के 25वें साल में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. पीडीपी के गढ़ दक्षिण कश्मीर में पहले चरण का मतदान इसकी दिशा तय करेगा. दक्षिण कश्मीर के चार जिलों की 16 और जम्मू के तीन जिलों की 8 विधानसभा सीटें पर वोटिंग है. दक्षिण कश्मीर की सभी 16 सीटों पर सिर्फ पीडीपी ने ही अपने उम्मीदवार उतारे हैं. ऐसे में साफ है कि पीडीपी का सियासी भविष्य दांव पर लगा है।पीडीपी की सियासी शुरुआत दक्षिण कश्मीर क्षेत्र से हुई है. 2014 के विधानसभा चुनाव में पीडीपी को सबसे ज्यादा सीटें इसी इलाके से मिली थीं. इसी की बदौलत पीडीपी सरकार भी बनाने में कामयाब रही. अब जम्मू-कश्मीर की सियासत बदल चुकी है और पीडीपी की राजनीतिक स्थिति भी पहले जैसी नहीं रही. अनंतनाग से नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार से लोकसभा चुनाव हारने वाली महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा चुनाव से किनारा कर लिया है. चुनाव लड़ने के बजाय पार्टी को बचाए रखने की कवायद में जुटी हैं।महबूबा मुफ्ती ने खुद विधानसभा चुनाव लड़ने के बजाय अपनी बेटी इल्तिजा मुफ्ती को चुनावी रणभूमि में उतारा है. इल्तिजा मुफ्ती अपने परिवार की परंपरागत श्रीगुफवारा-बिजबेहरा सीट पर कड़ी टक्कर मिल रही है. इस सीट पर नेशनल कॉन्फ्रेंस से बशीर अहमद शाह और बीजेपी से सोफी यूसुफ से उनका मुकाबला है।

इसके अलावा अनंतनाग, कुलगाम, शोपियां और पुलवामा विधानसभा सीटें तय करेंगी कि पीडीपी का भविष्य क्या होगा, क्योंकि इन सीटों पर महबूबा मुफ्ती और उनके पिता का सियासी रसूख रहा है।पीडीपी का गठन 1999 में हुआ, उसके बाद लगातार सियासी बुलंदी चढ़ती गई. साल 1998 में बीजेपी के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से कश्मीर की सभी क्षेत्रीय पार्टियों ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया, लेकिन वाजपेयी का सौम्य चेहरा और कश्मीर क्षेत्र में भाजपा की महत्वाकांक्षा की कमी ने राजनीति को प्रभावित नहीं किया. इसके विपरीत पीएम मोदी ने जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष दर्जा खत्म कर केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया. ऐसे में कश्मीर में लोगों के बीच यह बात फैली है कि पीडीपी के पीछे दिल्ली का हाथ है. इसकी वजह यह थी कि पीडीपी ने 2015 में बीजेपी के साथ गठबंधन किया और उसे राज्य की सत्ता में लाई।
