कतर ने भी छोड़ा ईरान का साथ,GCC देशों की बढ़ेगी एकजुटता
होर्मुज स्ट्रेट के पास मंगलवार को सऊदी और कतर के जहाजों पर हमले हुए थे. कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने ईरान से मांग की कि वह क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डालने वाली सभी गतिविधियां तुरंत बंद करे. साथ ही अपने सीमित हितों के लिए दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और खाड़ी देशों के संसाधनों को खतरे में न डाले. वहीं, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कतर के आरोपों को अच्छे पड़ोसी के रिश्तों के खिलाफ बताया.होर्मुज स्ट्रेट में सऊदी अरब और कतर के जहाजों पर हुए हमलों के बाद मिडिल ईस्ट में समीकरण बदल रही है. सबसे बड़ा बदलाव कतर के रुख में देखने को मिला है.

कतर ने इन हमलों के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है. यह इसलिए बड़ी बात है क्योंकि अब तक कतर को ईरान का सबसे करीबी सहयोगी और उसका समर्थन करने वाला देश माना जाता था. आइए जानते हैं क्या अब कतर और ईरान के समीकरण बदलने वाले हैं…कतर में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य बेस होने के बावजूद, कतर ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए दोहा वार्ता का आयोजन किया था. कतर की मुख्य रणनीति हमेशा से दोनों पक्षों को संतुलित करने की रही है. खाड़ी के ज्यादातर देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई और बहरीन के ईरान से रिश्ते लंबे समय से खराब रहे हैं. लेकिन कतर हमेशा ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है. इसके पीछे दो बड़े कारण है.कतर और ईरान दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार साउथ पार्स/नॉर्थ डोम गैस फील्ड को साझा करते हैं. इसलिए दोनों के बीच आर्थिक संबंध काफी मजबूत रहे हैं.साल 2017 में जब सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और मिस्र ने कतर का बहिष्कार किया था, तब ईरान ने ही कतर के लिए अपने हवाई और समुद्री रास्ते खोल दिए थे. उस समय ईरान कतर के लिए सबसे बड़ा सहारा बना था.इसी वजह से कतर का अब ईरान पर सीधे आरोप लगाना बेहद अहम माना जा रहा है. इससे साफ है कि कतर ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को पुरानी दोस्ती से ऊपर रखा है.2021 के अल-उला समझौते के बाद दोनों देशों के रिश्ते सुधरे थे, लेकिन पूरी तरह भरोसा नहीं बन पाया था. अब जहाजों पर हमलों के बाद दोनों देश ईरान के खिलाफ एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. इससे उनके बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग बढ़ सकता है.अब तक ईरान को खाड़ी देशों के भीतर कतर और ओमान जैसे देशों के नरम रुख का फायदा मिलता था. लेकिन कतर के बदलते रुख के बाद गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) पहले से ज्यादा एकजुट हो सकती है. इससे ईरान पर क्षेत्रीय दबाव बढ़ेगा. बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई GCC के सदस्य हैं.ईरान पहले से ही पश्चिमी प्रतिबंधों, आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है. अब अगर कतर भी उससे दूरी बनाता है, तो ईरान का कूटनीतिक अलगाव और बढ़ सकता है.दुनिया का करीब 20% कच्चे तेल और कतर के अधिकांश एलएनजी होर्मुज स्ट्रेट का निर्यात होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते ही होता है. अगर जहाजों पर हमले जारी रहे या तनाव युद्ध में बदल गया, तो तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होगी है. इनकी कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. कतर का बदला हुआ रुख मिडिल ईस्ट की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है. अब दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि ईरान इसका जवाब कैसे देता है और आगे खाड़ी क्षेत्र में हालात किस दिशा में बढ़ते हैं.
