शराबबंदी से बिहार को हो रहा है 14-15% राजस्व नुकसान,फिर से चालू करने पर विचार करेगी सरकार!
बिहार में शराबबंदी लागू हुए करीब 10 साल हो चुके हैं, लेकिन अब इस नीति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शराब पर पूरी तरह रोक लगाने की जगह अब इसकी बिक्री को नियमों के तहत शुरू करने पर विचार हो सकता है? इस चर्चा के पीछे सबसे बड़ी वजह राज्य के राजस्व का नुकसान बताया जा रहा है. एक नई स्टडी में अनुमान लगाया गया है कि शराबबंदी की वजह से बिहार को हर साल अपने राजस्व का करीब 14 से 15 फीसदी हिस्सा गंवाना पड़ रहा है.बताया जा रहा है कि शराब की पूरी तरह रोक हटाकर बिक्री को नियमों के तहत चलाने और एक्साइज ड्यूटी लगाने की सलाह दी गई है. इसका मतलब यह होगा कि सरकार शराब की बिक्री से टैक्स जुटा सकेगी और उस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और दूसरी जरूरी योजनाओं में किया जा सकेगा. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बिहार सरकार ने शराबबंदी हटाने का फैसला कर लिया है या इसे हटाने की पक्की तैयारी शुरू हो चुकी है. दरअसल, सरकार के सहयोगी दलों के कई बड़े नेता अभी भी शराबबंदी के समर्थन में हैं.

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि राज्य को राजस्व बढ़ाने के तरीके जरूर तलाशने चाहिए, लेकिन इसका मतलब शराबबंदी हटाना नहीं है. वहीं केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने बिहार में गुजरात मॉडल की तरह सख्त शराबबंदी लागू करने की बात कही है. दूसरी ओर, जनता दल यूनाइटेड के एक नेता ने नीति की समीक्षा की जरूरत बताई है. ऐसे में फिलहाल तस्वीर यह है कि राजस्व नुकसान का मुद्दा शराबबंदी पर नए सिरे से चर्चा जरूर खड़ी कर रहा है, लेकिन इसे हटाने पर राजनीतिक सहमति बनती दिखाई नहीं दे रही.14-15% राजस्व का नुकसान: NCAER स्टडी के मुताबिक हर साल इतना राजस्व प्रभावित हो रहा है.शराब का अवैध कारोबार: रोक के बावजूद राज्य में शराब की तस्करी और अवैध बिक्री बढ़ने की बात सामने आई है.10 साल से लागू है बैन: 2016 में लागू हुई शराबबंदी अब करीब एक दशक पूरा कर चुकी है.रेगुलेटेड बिक्री की सलाह: स्टडी ने पूरी रोक की जगह नियमों के तहत शराब बिक्री और एक्साइज ड्यूटी की सिफारिश की है.शराबबंदी के आर्थिक असर को समझने के लिए सबसे अहम आंकड़ा राजस्व का है. NCAER की स्टडी के मुताबिक, बिहार को हर साल करीब 14 से 15 फीसदी राजस्व का नुकसान हो रहा है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अगर शराब की बिक्री को पूरी तरह बंद रखने के बजाय उसे नियमों के तहत लाया जाए और उस पर एक्साइज ड्यूटी लगाई जाए, तो सरकार को एक बड़ा टैक्स स्रोत वापस मिल सकता है.बिहार में शराब पर टैक्स से होने वाली कमाई शराबबंदी से पहले राज्य के लिए एक अहम स्रोत थी. वहीं, शराबबंदी के आर्थिक असर को लेकर भी सरकार पर सवाल उठते रहे हैं. PRS लेजिस्लेटिव की बिहार बजट से जुड़ी रिपोर्ट देखें, तो साल 2012-13 से 2015-16 के बीच शराब से मिलने वाला टैक्स राज्य के GSDP का करीब 0.8 से 1 फीसदी रहा.साल 2015-16 में बिहार सरकार को शराब पर टैक्स से 3,142 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी. लेकिन, शराबबंदी लागू होने के बाद 2016-17 में यह कमाई घटकर करीब 30 करोड़ रुपये रह गई. इसके बाद यह आमदनी लगभग खत्म हो गई. रिपोर्ट में अनुमान के आधार पर पिछले 10 साल में 30 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के नुकसान का भी जिक्र है.शराबबंदी को लेकर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी लगातार सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि बिहार में गुजरात मॉडल की तर्ज पर शराबबंदी को और सख्त करने की जरूरत है, क्योंकि मौजूदा कानून का असर आम लोगों पर ज्यादा पड़ रहा है. उनके मुताबिक, शराबबंदी कानून के तहत करीब 12 लाख लोगों पर केस दर्ज हो चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या गरीब लोगों की है. उन्होंने आरोप लगाया है कि इस कानून का फायदा उठाकर कुछ अधिकारी भी पैसे कमा रहे हैं. मांझी की इस बात का समर्थन बिहार सरकार में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री लखेंद्र पासवान ने भी किया है.NCAER की स्टडी का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि शराब की कानूनी बिक्री बंद होने के बाद राज्य में अवैध शराब का बाजार तेजी से बढ़ा. रिपोर्ट में शराब की तस्करी, अवैध बिक्री और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी की बात कही गई है. इसी वजह से स्टडी ने पूरी तरह बैन रखने के बजाय शराब की बिक्री को नियमों के तहत लाने की सलाह दी है.रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के आसपास के कई राज्यों और नेपाल में शराब की बिक्री होती है. मसलन, झारखंड, बंगाल, नेपाल जैसे जगहों पर खूब शराब बिक रही है. जब्ती के कई मामलों में दूसरे राज्यों से शराब बिहार पहुंचने की बात भी सामने आई है. इससे शराबबंदी लागू करने और सीमा पार से आने वाली शराब को रोकने की चुनौती साफ दिखाई देती है.शराबबंदी का दूसरा बड़ा सवाल यह है कि अगर राज्य में शराब की बिक्री पर पूरी रोक है, तो बड़ी मात्रा में शराब पकड़ी क्यों जा रही है? बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 2026 के जनवरी से मई के बीच राज्य में 17.5 लाख लीटर से ज्यादा शराब जब्त की गई. इसकी कीमत करीब 141 करोड़ रुपये बताई गई. इसी अवधि में शराबबंदी से जुड़े मामलों में 56,904 लोगों को गिरफ्तार किया गया.2025 में जनवरी से मई के बीच 15.73 लाख लीटर शराब जब्त हुई थी. यानी 2026 में इसी अवधि में जब्ती का आंकड़ा करीब 11 फीसदी बढ़ गया. पुलिस के मुताबिक निगरानी बढ़ने और कानून को सख्ती से लागू करने के कारण जब्ती बढ़ी है. पिछले 10 साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो बिहार में शराबबंदी से जुड़े मामलों में 17 लाख से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई और करीब 4.83 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई.अगर भविष्य में बिहार में शराब की बिक्री को नियमों के तहत अनुमति दी जाती है, तो सबसे बड़ा फायदा सरकार को टैक्स के रूप में हो सकता है. एक्साइज ड्यूटी से मिलने वाला पैसा राज्य के खजाने में जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार , रिपोर्ट में कहा गया है कि कहा जा रहा है कि इससे मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है. इसके अलावा सरकार को अवैध शराब के खिलाफ लगातार बड़े स्तर पर होने वाली कार्रवाई में भी संसाधन खर्च करने पड़ते हैं. रेगुलेटेड बिक्री की स्थिति में सरकार के पास लाइसेंस, टैक्स और निगरानी के जरिए बाजार को नियंत्रित करने का विकल्प होगा.यही सबसे बड़ा सवाल है, आर्थिक नुकसान और स्टडी की सिफारिश के बावजूद अभी राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है. JD(U) आधिकारिक तौर पर शराबबंदी जारी रखने के पक्ष में है. चिराग पासवान ने भी शराबबंदी हटाने का सीधा समर्थन नहीं किया है. वहीं जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल की सख्त शराबबंदी की बात कही है. दूसरी तरफ JD(U) के एक नेता ने नीति की समीक्षा की जरूरत बताई है.इसलिए फिलहाल यह कहना सही होगा कि शराबबंदी हटाने का फैसला नहीं हुआ है, लेकिन राजस्व नुकसान, अवैध कारोबार और लंबे समय से लागू नीति को लेकर समीक्षा की बहस जरूर तेज हो गई है.
