खरमास बाद बिहार में मचेगा सियासी उथल-पुथल,कुशवाहा के पार्टी में टूट का खतरा!
14 जनवरी के बाद खरमास समाप्त हो जाएगा, उसके बाद बिहार की सियासत में बड़े राजनीतिक उलटफेर के कयास लगाए जा रहे हैं. सत्ता पक्ष के विधायक से लेकर मंत्री तक लगातार बयान दे रहे हैं कि विपक्ष में बड़ी टूट होगी. हालांकि विपक्ष का कहना है कि पहले भी कोशिश हो चुकी है लेकिन कामयाबी नहीं मिली, इस बार भी नाकामी ही हाथ लगेगी. वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि अगर विपक्ष में टूट हुई तो विधायकों को सत्ता में बहुत कुछ मिलेगा, इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार एनडीए को 243 में से 202 सीटों पर प्रचंड जीत मिली है, जो बहुमत से काफी अधिक है लेकिन उसके बाद भी विपक्षी दलों में टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं. बीजेपी-जेडीयू और एनडीए के अन्य घटक दल के नेताओं की तरफ से लगातार बयान आ रहे हैं कि कांग्रेस और आरजेडी में टूट होगी. अब 14 जनवरी को खरमास समाप्त हो रहा है. उसके बाद जरूर कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं. जेडीयू विधायक अजीत सिंह का कहना है कि राजनीति में तो कभी भी कुछ हो सकता है और खरमास समाप्त होने के बाद यदि कुछ हो जाता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।बीजेपी प्रवक्ता कुंतल कृष्णा भी मानते हैं कि विपक्षी दलों के कई विधायक पाला बदल सकते हैं. वे कहते हैं, ‘राजद और कांग्रेस में भी कुछ विधायक हैं, जो जनता की सेवा करना चाहते हैं. उनके लिए वह जगह ठीक नहीं है, सेवा करने के लिए तो एनडीए ही है.”वहीं, चिराग पासवान की पार्टी के कोटे से बने मंत्री ने पिछले दिनों बयान दिया था कि विपक्ष के कई विधायक सत्ता पक्ष के संपर्क में हैं. अब एलजेपीआर प्रवक्ता प्रोफेसर विनीत सिंह ने भी कहा कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद विपक्ष के विधायकों का यह हाल है कि कोई भी अपने दल के साथ रहना नहीं चाहता है. ऐसे में खरमास के बाद कांग्रेस और आरजेडी के विधायक सत्ता पक्ष के साथ आ जाएंगे.हालांकि विपक्ष का दावा है कि उनके विधायक एकजुट हैं. आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा कि पिछली बार लगातार एनडीए की तरफ से महागठबंधन में फूट और विधायकों के पाला बदलने के दावे किए जा रहे थे लेकिन हमारे विधायक एकजुट रहे. उन्होंने एनडीए पर पलटवार करते हुए कहा कि टूट तो सत्ता पक्ष के दलों में होगा. आरएलएम के तीन विधायक बीजेपी के संपर्क हैं. लिहाजा पार्टी बचाने की असल चुनौती तो उपेंद्र कुशवाहा के सामने है.बिहार में नीतीश कुमार पहले भी छोटे दलों को तोड़ते रहे हैं. कांग्रेस, लोजपा, बसपा जैसे दलों के विधायक को जेडीयू में शामिल कराते रहे हैं. आरजेडी के भी कई विधायक पाला बदल चुके हैं. जो जानकारी मिल रही है, उसके मुताबिक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इस बार भी कांग्रेस और अन्य दलों को साधने में लगाया है. ऐसे में खरमास के बाद छोटे दलों में टूट होने की सियासी गलियारों में चर्चा तेज है.आईआईपी के एकमात्र विधायक आईपी गुप्ता हैं. उन्होंने तो खुलकर कहा था कि नीतीश कुमार आरक्षण की मांग मान लेते हैं तो हम उनके साथ हो जाएंगे.

आईपी गुप्ता ने महागठबंधन के साथ मिलकर सहरसा से चुनाव लड़ा और जीता लेकिन उनके पाला बदलने की चर्चा लगातार हो रही है.वहीं रामगढ़ से बहुजन समाज पार्टी के सतीश कुमार यादव विधायक बने हैं. 2020 में भी बसपा के एकमात्र विधायक (जमा खान) चुनाव जीते थे, जो बाद में जेडीयू में शामिल हो गए और उन्हें अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनाया गया. इस बार भी बसपा नेताओं का कहना है कि उनके विधायक पर सत्ता पक्ष की नजर है.वहीं, दूसरी तरफ एनडीए में उपेंद्र कुशवाहा की भी परेशानी बढ़ने वाली है. उपेंद्र कुशवाहा के तीन विधायक उनसे नाराज हैं और उपेंद्र कुशवाहा के साथ तीनों विधायकों का संपर्क लंबे समय से नहीं हुआ है. राष्ट्रीय लोक मोर्चा के एक विधायक रामेश्वर महतो ने तो खुलेआम सोशल साइट पर पोस्ट भी किया हैं कि कुशवाहा के साथ अब आगे की राजनीति नहीं करेंगे. जाहिर है ऐसे में केवल विपक्ष में ही नहीं, बल्कि एनडीए में भी खरमास के बाद बवाल मचना तय है.नीतीश मंत्रिमंडल का विस्तार होगा, 10 नए मंत्री बनाए जा सकते हैं. राज्यसभा के पांच सीटों पर चुनाव होना है. एनडीए की चार सीट मिलना तय लेकिन एक सीट पर जीत के लिए विपक्ष में सेंधमारी की कोशिश होगी. डेढ़ दर्जन विधान परिषद के सीटों पर चुनाव होगा. इसमें भी विपक्ष के विधायकों को तोड़ने की कोशिश होगी है. इसी वजह से कांग्रेस के 6 विधायकों में टूट की अटकलें लगाई जा रही है।
