प्राचीन काल में कैसे साबित करते थे नागरिकता?लंबी दूरी के लिए पासपोर्ट नहीं बल्कि ये था जरूरी

 प्राचीन काल में कैसे साबित करते थे नागरिकता?लंबी दूरी के लिए पासपोर्ट नहीं बल्कि ये था जरूरी
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पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह केवल विदेश यात्रा करने का अधिकार पत्र है. हाल ही में जब से भारत सरकार ने इस तथ्य को नए सिरे से देश के सामने रखा है, तभी से इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है. बड़ी संख्या में लोग सवाल उठा रहे हैं कि पासपोर्ट, आधार, वोटर कार्ड अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बने हैं तो क्या यह सब गैर भारतीयों को भी दिए जाते हैं? मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने एक्स पर विदेश मंत्रालय के इस बयान पर सख्त आपत्ति जताई है.आइए, पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण है या केवल विदेश यात्रा का अनुमति पत्र, इस बहस के बीच जानते हैं कि आखिर मुगल काल में हिन्दुस्तानी नागरिकता का प्रमाण क्या होता था? उस जमाने में इस मसले को हल करने को क्या कोई व्यवस्था थी?मुग़ल काल में आज की तरह नागरिकता का विचार नहीं था. नागरिकता शब्द आधुनिक है. मुग़ल काल में में लोग राजा के अधीन रहते थे.

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जो बादशाह कह दें, वही सही मान लिया जाता था. धर्म, जाति और पेशा पहचान तय करते थे. राज्य कर व्यवस्था में योगदान करने वाले, राज व्यवस्था में भरोसा करने वाले लोगों पर राज तंत्र भी भरोसा करता था. परिवार और कबीला पहचान के पारंपरिक साधन थे. रिश्तेदार और जमीन से पहचान जुड़ी रहती थी. गांव या मोहल्ला भी पहचान का बड़ा आधार था. स्थानीय मुखिया या पटवार यानी अधिकारी अक्सर जरूरत पड़ने पर पहचान सिद्ध करते थे.मुगल काल में भले ही आज की तरह व्यवस्था नहीं थी, न ही नागरिकता जैसे टर्म का इस्तेमाल होता था लेकिन कुछ प्रचलित कागजातों के जरिए व्यक्ति की शिनाख्त आसानी से हो जाती थी. ये सारे दस्तावेज बादशाह, दरबार या सरकारी कारिंदे जारी करते थे. इनमें से कुछ निम्नवत हैं. शाही आदेश या शासक का लिखित आदेश. क़ानून, कर-माफी, ज़मीन देने या किसी विशेष अधिकार की पुष्टि इसी शाही फरमान से होती थी. यह फ़ारसी में लिखा होता था. शाही मुहर और दरबारी हस्ताक्षर इसे पुख्ता बनाते थे. यह अधिकार का लेखा-जोखा को प्रमाणित करता था. यह किसी हक़ या इजाज़त का लिखित प्रमाण होता था. ज़मीन का पट्टा, जागीर का दस्तावेज़, सौदों की पुष्टि भी इसी दस्तावेज से होती थी. इसे प्रायः दरबार या स्थानीय अमानतख़ाने जारी करते थे. कई बार यह कागज़ पर लिखा हुआ या ताम्रपत्र पर उकेरा हुआ होता था. किसी तरह के विवाद में प्राथमिक प्रमाण यही माना जाता था. यात्रा या व्यापार की अनुमति में परवाना की भूमिका महत्वपूर्ण थी. सहूलियत या छूट देने वाला कागज़ भी यही था. इसका इस्तेमाल कर छूट, सीमा पार यात्रा, व्यापार की स्वतंत्रता आदि में होता था. इसे भी शाही दरबार या जिला अधिकारी जारी करते थे.पट्टा: ज़मीन और राजस्व का रेकॉर्ड, जमीन के मालिक या उपयोगकर्ता का प्रमाण. कर जानने और जमीन के हक़ को दिखाने के लिए इसका उपयोग किया जाता था. स्थानीय पटवारी, अमिल या गांव की चौपाल में रखने की व्यवस्था थी. यह लिखित रजिस्टर या व्यक्तिगत पत्र के रूप में होता था. किसानों के लिए जीवन भर का प्रमाण यही था.मुगल काल में कई बार बादशाह ताम्र-पत्र के जरिए अपने आदेश जारी करता. इसका उपयोग मंदिरों या जानदार परिवारों को दिए गए उपहारों के हिसाब के रूप में होता था. यह लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे.यह दस्तावेज शादी, वक्फ़ या धार्मिक दान के कागज़ को पुख्ता करता था. यह दस्तावेज काज़ी या धर्माधिकारी बनाते थे. पारिवारिक हक़ और धार्मिक संपत्तियों के प्रमाण के लिए इसका इस्तेमाल होता था.वंशावली और शजरा नसब: खासतौर पर कुलीन घराने अपनी वंशावली लिखवाते थे. इससे वंश और सामाजिक दर्जा सिद्ध होता था.मुहर, तख्ती और दृश्य चिह्न: राजकीय मुहर सबसे बड़ा प्रमाण होती थी. बहुतेरे आदेश इसी से मान्य होते थे. नौकरशाही में भी छोटे अफ़सरों की मुहरें होती थीं. कई बार व्यक्ति के पास अपना सिग्नेचर या चिन्ह होता था. व्यापारी भी अपनी सील या छाप रखते थे.मानसब और दरबारी नियुक्ति-पत्र: यह दस्तावेज अधिकारी या फौजी पदों की नियुक्ति का प्रमाण होता था. प्रायः इसे बादशाह की ओर से देने की व्यवस्था थी. इसका उपयोग पद, सैनिक रैंक और तनख़्वाह तय करने के लिए किया जाता था.किसी भी तरह के विवाद में गवाहों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती थी. किसी भी दस्तावेज़ का सत्यापन मुहर और गवाहों के जरिए होता था. करप्शन उस जमाने में भी हुआ करता था. दफ्तर से कभी कागज़ गायब हो जाते थे. कभी नकल या फ़र्ज़ी कागज़ भी बनाए जाते थे. ऐसे में मुहर, गवाहों के जरिए मसले को निपटाया जाता था.कोतवाल, अमिल या राजस्व अधिकारी और कुआंगो जैसे लोगों की बड़ी भूमिका थी. ये लोग स्थानीय पहचान और रक़बों का नाप-जोख करते थे. गाँव के बुज़ुर्ग और पंडित भी प्रमाण दे सकते थे. किसी विवाद में गवाहों की गवाही महत्व रखती थी. कुआंगो शाही आदेश से तैनात किया जाने वाला गैर सरकारी व्यक्ति होता था. जिसे अनेक अधिकार मिले हुए थे.मुगल काल में आधुनिक पासपोर्ट जैसी व्यवस्था नहीं थी. अंदरूनी यात्रा में आम तौर पर रोक नहीं थी. लम्बी दूरी के लिए परवाना चाहिए होता था. इसके बिना कुछ इलाकों में समस्याएं आ सकती थीं. राजनीतिक संकट या युद्ध के समय कागज़ात मांगे जाते थे. शाही दरबार की ओर से जारी दस्तावेजों के दिखाने पर काम चल जाता था. गरीब और निर्जन लोगों के पास लिखित प्रमाण कम होते थे. मौखिक परंपरा और गवाहों के जरिए काम चलता था.

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